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झारखंड चुनाव में कांग्रेस एकदम फिसड्डी दूसरे एजेंडे में बिजी थे नेता

  • अंतिम दौर में प्रियंका ने बढ़ाया मनोबल
  • झारखंड प्रभारी का एजेंडा दूसरे मुद्दे पर रहा
  • अन्य नेताओं को नहीं मिली कोई जिम्मेदारी
  • जो जीतेंगे वे सिर्फ अपने बलबूते पर जीतेंगे
संवाददाता

रांचीः झारखंड चुनाव में सबसे अधिक फिसड्डी सिर्फ कांग्रेस साबित

हुई है। लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस का एक सामूहिक चेहरा नजर

आता था। इस बार वह भी गायब हो गया है। कांग्रेस का झारखंड के इस

चुनाव में सबसे बुरा हाल रहा। अपने पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद के जेल

में होने के बाद भी राष्ट्रीय जनता दल ने अपने सीमित संसाधनों में

विभिन्न इलाकों में न सिर्फ बेहतर प्रचार किया बल्कि महागठबंधन के

अन्य प्रत्याशियों के समर्थन में भी उनकी उपस्थिति बेहतर रही।

कांग्रेस का रांची सहित अन्य तमाम इलाकों में शून्य के बराबर

उपस्थिति रही। प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करने के बाद आम जनता के

बीच सीधा संपर्क करने में इस चुनाव के संचालन की जिम्मेदारी

संभालने वाले कोई असर नहीं छोड़ पाये। रांची सीट पर झामुमो की

महुआ मांझी को प्रत्याशी बनाये जाने के बाद सिर्फ कांग्रेस की तरफ से

उपस्थिति का दिखावा किया गया। यह अलग बात है कि पार्टी के

प्रवक्ता औपचारिकता पूरी करने के लिए सिर्फ प्रेस में बयान जारी

करते रहे। जमीन पर कांग्रेस का काम पार्टी के नेताओं और खास

तौर पर जिनके जिम्मे चुनावी कमान थी, वे नहीं कर पाये।

कांग्रेस का कमान यहां झारखंड के प्रभारी आरपीएन सिंह को सौंपा

गया था। वह तथा दिल्ली से आये उनके सहयोगियों का एजेंडा चुनाव

प्रचार कतई नहीं रहा। श्री सिंह भी मुख्य तौर पर गणेश परिक्रमा कर

पद हथियाने वालों से घिरे रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि जिन

नेताओं के पास जनाधार था, उनलोगों ने चुनाव के दौरान उनसे

किनारा कर लिया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामेश्वर ऊरांव से सभी

गुटों को मिलाने की प्रारंभिक सफलता तो हासिल की थी।

झारखंड चुनाव में प्रभारी गणेश परिक्रमा में मस्त

लेकिन बाद में झारखंड प्रभारी की हरकतों की वजह से यह सारा प्रयास

ही मिट्टी में मिल गया। पार्टी के अंदर ही आरोप है कि वह ऐसे लोगों की

सलाह को अंतिम मानते हैं जो पार्टी की प्रदेश कमेटी में महत्वपूर्ण

पदाधिकारी होने के बाद भी अपने बलबूते पर तीन दर्जन लोगों को भी

एकत्रित नहीं कर सकते। यह सारी चर्चा आज कांग्रेस महासचिव

प्रियंका गांधी के संथाल दौरे के बाद उभरकर सामने आया। वैसे

प्रियंका गांधी के दौरे ने पार्टी की सुस्त पड़ी चाल को दुरुस्त करने में

प्रमुख भूमिका निभायी है। लेकिन अब तक चुनाव के चार चरण

समाप्त हो चुके हैं। जिसमें पार्टी के अपने ही लोगों ने स्वीकार किया

कि सामूहिक तौर पर पार्टी और महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी के

तौर पर कांग्रेस दोनों की भूमिका बनाने में झारखंड कांग्रेस के प्रभारी

आरपीएन सिंह बुरी तरह असफल रहे हैं।

पार्टी की आंतरिक समीकरणों के तहत पार्टी के कई नेता निश्चित तौर

पर चुनाव जीतकर आ रहे हैं। लेकिन इन नेताओं के चुनाव जीतने में

झारखंड प्रभारी अथवा अन्य राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका नगण्य है।

जीत की संभावना वाले तमाम ऐसे नेता अपने जनाधार, प्रभाव और

स्थानीय समीकरणों की वजह से मतदान में आगे निकलते नजर आ

रहे हैं। लिहाजा यह माना जा रहा है कि चुनाव समाप्त होने के बाद

कांग्रेस का पुराना गुटबाजी राग फिर से उभरने वाला है।

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