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कांग्रेस फिर से पुरानी लीक पर सोनिया गांधी के सहारे







कांग्रेस फिर से उसी लीक पर चल पड़ी है, जिस पर राहुल गांधी के बाद चलना बंद किया गया था।

अब कांग्रेस फिर से इस रास्ते चल पड़ी तो उसके बारे में अब यह कहा जा सकता है कि ढाक के तीन पात।

इतना कुछ करने के बाद भी अंततः कांग्रेस अपनी पुरानी बीमारी को अब भी नहीं त्याग पायी,

जिसकी बदौलत उसे निरंतर नुकसान उठाना पड़ता है।

पिछले बीस महीनों में राहुल गांधी के असफल होने के बाद भी इस सबसे पुरानी पार्टी को फिर से घूमकर

श्रीमती सोनिया गांधी की शरण में इसलिए जाना पड़ा

क्योंकि पार्टी के बड़े नेता अध्यक्ष चुनने के सवाल पर एकमत नहीं हो पाये।

यानी कांग्रेस की असली धुरी फिर से गांधी परिवार के ईर्द गिर्द आकर टिक गयी।

कांग्रेस फिर से श्रीमती सोनिया गांधी के सहारे फिर से आगे बढ़ने की कोशिश में

जाहिर सी बात है कि आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर प्रियंका गांधी भी नेतृत्व के मामले में आगे आयेंगी।

लेकिन इस मामले में पार्टी की बौद्धिक कमजोरी साफ साफ झलक जाती है।

इस पूरे घटनाक्रम से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि अब तक कांग्रेस के अंदर वैचारिक तौर पर

न्यूनतम एकता आज भी कायम नहीं है।

क्षेत्रीय क्षत्रप अपने अपने इलाके में खुद को ही पार्टी ता सबसे ताकतवर नेता मानते हैं।

ऐसे तमाम क्षत्रपों को एकजुट रखने का एक ही ईलाज है।

वह ईलाज है गांधी परिवार के नाम पर सभी एकजुट रहते हैं।

सिर्फ इसी एक मुद्दे पर कांग्रेस अपने प्रवल विरोधी भाजपा के मुकाबले अत्यंत ही कमजोर नजर आती है।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में गांधी परिवार के बाहर के अध्यक्ष नहीं हुए हैं।

लेकिन उससे जुड़े अन्य घटनाक्रम कोई सुखद अनुभूति नहीं दिलाते।

यह स्थिति जनता के दिल में शंका पैदा करने वाली है

इस वजह से कांग्रेस और गांधी परिवार का यह रिश्ता जनता के दिलों में हमेशा ही शंका का भाव पैदा करता है।

भाजपा ने भी इस कमजोरी का जोरदार तरीके से फायदा उठाया है।

लोकतांत्रिक देश में एक पार्टी का नियंत्रण एक ही परिवार के हाथ में रहे,

इसके प्रचार से जनता भी यह मानती है कि पार्टी के अंदर आंतरिक लोकतंत्र की जबर्दस्त कमी है।

ऐसे में पार्टी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का बेहतर विकल्प नहीं हो सकती।

कांग्रेस ने खुद को अपनी करनी से ही कमजोर किया है।

आज की स्थिति यह है कि किसी भी राज्य में पार्टी के बड़े कद के अनेक नेताओं के बीच कोई ताल-मेल ही नहीं है।

जब कभी भी पार्टी के अंदर कोई क्षेत्रीय नेता मजबूती के साथ उभरा है तो उसे दबाने की पुरजोर कोशिश की गयी है।

जिसका नतीजा यह हुआ है कि या तो सामने वाला नेता पार्टी में रहते हुए अपनी ताकत खो बैठा है

अथवा उसने पार्टी छोड़कर अपने जनाधार को और मजबूत बनाने का काम किया है।

उदाहरण के तौर पर हम आंध्रप्रदेश में जगन रेड्डी को ले सकते हैं।

जाहिर सी बात है कि क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी को निरंतर कमजोर कर केंद्र को मजबूत किये जाने

की कोशिशों के बीच अन्य दलों ने अपने क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत किया है।

राजनीतिक तौर पर इसके नतीजे भी साफ साफ नजर आते हैं।

कांग्रेस फिर से पुरानी गलतियों को दोहरा रही है

खुद को राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस को अब अनेक राज्यों के क्षेत्रीय दल भी गंभीरता से नहीं लेते।

इसकी खास वजह है कि उन राज्यों में कांग्रेस का संगठन ही कमजोर हो चुका है।

बिना जनाधार के किसी करिश्मे की मदद से सत्ता पाने के बाद भी जनाधार नहीं होने की वजह से

वह खुद को मजबूती के साथ खड़ा तक नहीं कर पा रही है।

श्रीमती सोनिया गांधी ने निजी कारणों से पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा था। यह जगजाहिर है।

लेकिन यह साबित हो गया कि उनके पुत्रमोह का फैसला पार्टी के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ है।

दरअसल काफी पहले से ही राजनीतिक प्रेक्षक यह मान चुके हैं कि दरअसल राहुल गांधी एक पार्टी टाइम राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।

वह चौबीसों घंटे राजनीति में सक्रिय रहना पसंद भी नहीं करते।

उनका अपना निजी जीवन राजनीति से अलग रहता है।

इस वजह से कांग्रेस जैसे विशाल संगठन को अपने कंधे पर ढोना उसके बूते की बात नहीं थी।

लेकिन अब सोनिया गांधी को भी अंतरिक्ष अध्यक्ष बनाये जाने के बाद अगले अध्यक्ष

की चर्चा के बीच कांग्रेस ने खुद नया सवाल खड़ा कर दिया है।

अगले महाधिवेशन में नये अध्यक्ष का चुनाव होने के बीच पार्टी क्या कुछ कर पायेगी, यह भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण सवाल है।

अगला अध्यक्ष भी गांधी परिवार को मान्य होना चाहिए

साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या अगले महाधिवेशन में जो नया अध्यक्ष आयेगा,

वह गांधी परिवार के किसी सदस्य की तरह अन्य लोगों को मान्य होगा।

स्पष्ट है कि वर्तमान में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में आने के लिए भाजपा से दो दो हाथ करने हैं।

भाजपा के पास वर्तमान में नरेंद्र मोदी के कद का नेता है।

जिनकी व्यक्तिगत छवि के मुकाबले कांग्रेस का कोई भी नेता नहीं टिक पाता।



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