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खेतों के जरिए भारतीय आर्थिक तंगी से निकलने की पूरी तैयारी हो

खेतों में फसल उगाने का समय करीब आ रहा है। यूं तो आज कल उन्नत खेती की वजह से

सालों भर किसान, पानी की उपलब्धता के आधार पर अपने खेतों का लगातार इस्तेमाल

करते हैं। लेकिन जहां तक मुख्य तौर पर भारतीय कृषि का सवाल है तो यह नि›श्चित तौर

पर वर्षा आधारित ही है। लगातार पैसा खर्च करने के बाद भी हम अतिरिक्त सिंचाई

संसाधनों को उतना बेहतर नहीं बना पाये हैं, जिससे देश को औसतन दो फसलों का लाभ

मिल सके। कोरोना के वैश्विक संकट के दौर में जब भारत पर भयानक किस्म की आर्थिक

मंदी छायी है तो उससे उबरने में इन खेतों को ही खदान समझकर उनसे सोना रुपी फसल

उगाने पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। यह ध्यान इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश का

ध्यान इस तरफ नहीं होने के बाद भी अनेक भागों में टिड्डी फैले हुए हैं। इन्हें देखकर खतरे

का अंदेशा उनलोगों को हो सकता है, जो इनके बारे में ज्यादा जानकारी रखते हों। एक

टिड्डी एक दिन में अपने वजन के बराबर का फसल चट कर जाता है। इस एक टिड्डी का

वजन ज्यादा नहीं होता लेकिन जब करोड़ों और अरबों की संख्या में टिड्डी हो तो किसी

एक इलाके की पूरी हरियाली को समाप्त करने में उसे एक दिन भी नहीं लगता। साथ ही

यह भी जान लेना जरूरी है कि एक इलाके के सफाचट करने के बाद यही टिड्डी एक बार में

अस्सी किलोमीटर तक उड़ सकते हैं। साथ ही इस दौरान टिड्डी के भारतीय भूभाग में होने

की वजह से अगले छह माह के बाद इनकी संख्या बीस गुणी अधिक हो जाएगा। वह समय

ऐसा होगा जब फसल काटकर रखे गये होंगे।

खेतों में फसल के साथ साथ टिड्डी से बचाव का प्रबंध हो

इसलिए खेतों के जरिए हम देश में आर्थिक प्रवाह को जब तेज करने की बात करते हैं तो

हमें ध्यान रखना होगा कि फसल बेहतर तरीके से उगने के साथ साथ टिड्डी से उनके

बचाव का भी पूरा प्रबंध हो। देश के भीतर नकदी के प्रवाह को तेज करने के बाद ही आर्थिक

गतिविधियों के उस चक्र की गति तेज हो सकती है, जिसकी फिलहाल कमी महसूस की जा

रही है। कोरोना की वजह से लगे लॉक डाउन से लोगों की जमा पूंजी भी खर्च हो चुकी है।

कई किस्म के रियायतों की घोषणा के बाद भी अब तक उनका प्रत्यक्ष लाभ जमीन पर

दिखना प्रारंभ नहीं हुआ है। जो लोग भी अपने अस्तव्यस्त हो चुके कारोबार को फिर से

संभालने की कोशिश कर रहे हैं, वे भी मानते हैं कि अभी बाजार में पहले के जैसा पैसा भी

नहीं है। इसलिए इसे सामान्य स्थिति में आने में कमसे कम छह महीने का वक्त लग

सकता है। इन छह महीनों में जहां उत्पादन बढ़ाने का काम सबसे अधिक तेज हो सकता है

वह खेतों के जरिए ही संभव है। किसानों को हर किस्म की सुविधा देने का जो एलान बीस

लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज में हो चुका है, उसे प्राथमिकता के आधार पर लागू करना भी

अब सरकार की जिम्मेदारी है। दूसरी तरफ यह स्थिति भी स्पष्ट होती जा रही है कि

कोरोना का संकट जिस गति से भारत में बढ़ रहा है, उसमें फिर से लॉक डाउन करने की भी

नौबत आ सकती है। नये नये इलाकों में संक्रमण फैलने की वजह से हमारे चिकित्सा

संसाधन भी अब सिकुड़ने लगे हैं। ऐसे में खेतों में उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ अस्पतालों

में कोरोना के ईलाज के लिए अतिरिक्त इंतजाम करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

रोजगार सृजन का सबसे कारगर हथियार है कृषि

रोजगार सृजन के लिए अधिकांश राज्यों ने फिर से मनरेगा के तहत लोगों को रोजगार

देना प्रारंभ कर दिया है। झारखंड सरकार का यह फैसला भी सही है कि इस मनरेग के

जरिए झारखंड के सभी इलाकों में अधिकाधिक जल भंडारण पर काम किया जाए। जहां

कहीं भी सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल का प्रबंध होगा, वहां इन खेतों में धान की फसल

के साथ साथ या धान की फसल होने के बाद भी कुछ न कुछ कृषि कार्य चलता रहेगा। धान

की फसल बाजार में आने अथवा उस फसल को बेहतर बनाने के लिए होने वाली खरीददारी

से भी बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा। इसके लिए भी खेतों में काम करने वाले किसानों

तक पैसा जल्दी पहुंचाना जरूरी है। किसान के माध्यम से पास के कस्बों और वहां से शहर

होते हुए महानगरों तक पैसे का यह प्रवाह उस आर्थिक गतिविधियों को तेज कर पायेगा,

जो अभी सुस्त पड़ी नजर आ रही है। इसलिए खेतों के जरिए ही देश की बिगड़ चुकी

आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, वह किया

जाना चाहिए। इससे पूरे देश में क्रमवार तरीके से फिर से आर्थिक गतिविधियों को बल

मिलेगा और यह समय की मांग भी है।


 

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3 Comments

  1. […] खेतों के जरिए भारतीय आर्थिक तंगी से नि… खेतों में फसल उगाने का समय करीब आ रहा है। यूं तो आज कल उन्नत … […]

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