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सामान्य ऑस्टोपोरोसिस की दवा से मजबूत हड्डियों के टूटने का खतरा

  • बाईफोस्फोनेट का इस्तेमाल फेमर की हड्डी तोड़ सकता है

  • पांच साल के निरंतर इस्तेमाल से ज्यादा खतरा

  • अलग अलग परिणाम के कारणों की जांच जारी

  • अन्य हड्डियों को टूटने से बचाती है यह दवा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सामान्य ऑस्टोपोरोसिस आज के दौर में उम्र के साथ आने वाली एक बीमारी

है। आधुनिक जीवन के लाईफ स्टाईल की वजह से हमने अपने शरीर की आंतरिक संरचना

को जो नुकसान पहुंचाया है, उसका यह साइड एफेक्ट है। लेकिन पहली बार चिकित्सा

विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस बीमारी के लिए इस्तेमाल होने

वाली दवा का एक रसायन दरअसल शरीर की सबसे मजबूत हड्डी यानी फेमर को भी

तोड़ने का खतरा बढ़ा देता है। आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह समझा गया है कि

करीब पांच वर्ष के बाद यह खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है।

कई विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ने मिलकर इस पर यह रिसर्च किया है। इस

अनुसंधान में यूनिवर्सिटी ऑफ शैफिल्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और काइजर

परमांटे, दक्षिण कैलिफोर्निया शामिल थे। इस अनुसंधान का ही परिणाम है कि वैज्ञानिक

इस किस्म के मजबूत हड्डी के टूटने के खतरे के लिए ऑस्टोपोरोसिस में इस्तेमाल होने

वाली दवा में शामिल रसायन बाईफोस्फोनेट इसके लिए जिम्मेदार है। यह स्थिति

लगातार पांच वर्षों तक इसके इस्तेमाल की वजह से और अधिक बढ़ जाती है।

इस शोध के निष्कर्षों को न्यू इंग्लैड जर्नल ऑफ मेडिसीन में प्रकाशित भी किया गया है।

इसमें बताया गया है कि एशिया महाद्वीप की महिलाओं के लिए यह खतरा अधिक है।

यूरोप अथवा अन्य पश्चिमी देशों की महिलाओं में यह प्रभाव कम नजर आया है।

सामान्य ऑस्टोपोरोसिस की दवा पर गहन शोध हुआ है

शोध के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस शोध प्रबंध के सह लेखक प्रोफसर रिचर्ड ईस्टैल

कहते हैं कि ब्रिटेन में दस प्रतिशत उम्रदराज महिलाएं एलेनड्रोनिक एसिड का इस्तेमाल

करती हैं। इस वजह से यहां दस हजार में सात महिलाएं फेमर की हड्डी टूटने का खतरा

झेलती हैं। दूसरी तरफ एशिया महाद्वीप की महिलाओं में यह आंकड़ा अधिक है। इसी दवा

के निरंतर इस्तेमाल की वजह से हिप बोन भी टूटता है। जो बड़े संकट का कारण बनता है।

बाईफोस्फोनेट नाम का रसायन वर्ष 1990 से ऑस्टोपोरेसिस के लिए इस्तेमाल किया जा

रहा है। इससे हिप, रीढ़ और अन्य हिस्सों के हड्डी टूटने का खतरा कम होने का दावा

किया गया था। अब पता चल रहा है कि इस दवा के अधिक इस्तेमाल से जांघ की हड्डी को

नुकसान पहुंच रहा है। एक ही दवा के अलग अलग परिणामों की वजह से अब वैज्ञानिक

इसके जेनेटिक रिश्तों की पड़ताल कर रहे हैं। वे यह समझना चाहते हैं कि सफेद चमड़ी के

लोगों पर इसका असर कम और सांवली चमड़ी की महिलाओं पर इसका असर अधिक क्यों

हैं। क्या इसके बीच भी कोई जेनेटिक अंतर काम करता है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध दल ने निकाला निष्कर्ष

इस शोध प्रबंध के मुख्य लेकर और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफसर डेनिस एम

ब्लैक ने कहा कि फेमर बोन के टूटने का खतरा तुलनात्मक तौर पर कम है क्योंकि यह

अन्य हड्डियों को नुकसान से बचाता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है, इसे भी समझने की

आवश्यकता है। इसका इस्तेमाल कुछ दिनों के बाद बंद कर देने से भी यह खतरा तेजी से

कम होता जाता है, इसे भी शोधकर्ताओं ने अपने पास मौजूद आंकड़ों से समझा है।

इसलिए वह मानते हैं कि बाईफोस्फोनेट का इस्तेमाल कितने दिनों तक करना है, इस पर

डाक्टरों को निरंतर ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए मरीज की जिम्मेदारी भी बनती है कि

वह अपने डाक्टर से संपर्क में रहे ताकि उसके शरीर में हो रहे आंतरिक बदलावों को देखा

समझा जा सके।


 

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