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आइये मेहरबां,बैठिये जाने-जाँ शौक़ से लीजिये जी इश्क के इम्तहां

आइये आपका ही इंतजार था। मैं यह सबसे पहले माता रानी को संबोधित करता हूं।

नवरात्र प्रारंभ होने के मौके पर यह परंपरा है कि दिन और हर काम की शुरुआत भी जय

माता दी से प्रारंभ किया जाता है। इसबार की परिस्थितियां कुछ बिल्कुल ही भिन्न हैं। ऐसे

में माता जगदम्बा की याद शायद उनलोगों को भी आती होगी जो आम तौर पर अधिक

धार्मिक आस्था नहीं रखते हैं।

वइसे इस बार मां का आना थोड़ा नहीं बिल्कुल ही अजीब हालत में है। कोरोना का अनुभव

हमलोगों को नहीं था। ऊपर से डरे हुए लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा है कि क्या करें

और क्या नहीं करें। हुजूर लोगों ने पूजा पर भी पाबंदी लगा दी है। मूर्ति छोटी रहेगी, कोई

प्रसाद नहीं मिलेगा, माइक नहीं बजेगा। इतना कुछ झंझट करने से बेहतर होता कि कह

देते कि इस बार पूजा ही नहीं करना है। अब बताइये कि माइक बजाने से कैसे कोरोना

फैलता है, लेकिन जिनको इस बारे में बोलना चाहिए वे तो चुप्पी साधे हुए हैं। पता नहीं

कल को पब्लिक नाराज हो गयी तो क्या कुछ होगा। किसी नेता की धुलाई हो गयी बीच

में तो मुझे कुछ ना कहना।

 मॉनसून के खत्म होने में बिहार की पॉलिटिकल गर्मी

ऊपर से मॉनसून निपटने के अंतिम पड़ाव में बिहार की पॉलिटिकल गर्मी महसूस हो रही

है। बिहार का इलेक्शन वइसे भी गर्मी पैदा करने वाला होता है। सिरिफ लालू भइया अंदर हैं

नहीं तो खेल हो चुका होता। फिर भी रही सही कसर अपने चिराग जी पूरी करने में जुटे हुए

हैं। पता नहीं इस चिराग से नीतीश कुमार को कितनी आग लगेगी। यह देखने लायक बात

होगी कि चुनावी दंगल में कौन पहलवान बाजी मार लेता है।

आइये उस फिल्म का गीत सुने जो मेरी पैदाइश के पहले की है

यह मेरी पैदाइश के पहले बनी फिल्म का गीत है। फिल्म वर्ष 1958 में बनी थी। उस फिल्म

का नाम था हावड़ा ब्रिज। इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था

ओपी नैय्यर ने। इसे स्वर दिया था आशा भोंसले ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

आइये मेहरबाँ बैठिये जाने-जाँ शौक़ से लीजिये जी

इश्क के इम्तहाँ आइये मेहरबाँ

बैठिये जाने-जाँ शौक़ से लीजिये जी

इश्क के इम्तहाँ आइये मेहरबाँ

कैसे हो तुम नौजवाँ इतने हसीं मेहमान

कैसे हो तुम नौजवाँ

इतने हसीं मेहमान कैसे करूँ मैं बयाँ

दिल की नहीं है ज़ुबाँ कैसे करूँ मैं बयाँ

दिल की नहीं है ज़ुबाँ आइये मेहरबाँ

बैठिये जाने-जाँ

शौक़ से लीजिये जी इश्क के इम्तहाँ

आइये मेहरबाँ देखा मचल के जिधर बिजली गिरा दी

उधर देखा मचल के जिधर बिजली गिरा दी

उधर किसका जला आशियाँ बिजली को

ये क्या खबर किसका जला आशियाँ

बिजली को ये क्या खबर आइये

मेहरबाँ बैठिये जाने-जाँ

शौक़ से लीजिये जी

इश्क के इम्तहाँ आइये मेहरबाँ

बैठिये जाने-जाँ शौक़ से लीजिये जी

इश्क के इम्तहाँ आइये मेहरबाँ

झारखंड में भी हर कोई उपचुनाव में इंटरेस्ट ले रहा है। दुमका और बेरमो में चुनाव पर भी

बहुत कुछ तय होना है। बाजी किसके हाथ लगेगी, यह तो देखने लायक बात होगी। तब

तक तो दंगल में लगने वाले दांवों का मजा लेना है। अपने हेमंत भइया को भी यह साबित

करना है कि वह वाकई अब एक्सपीरियंस्ड नेता बन चुके हैं। इस चुनाव में उनके चुनाव

कौशल को बहुत लोग नापना चाहते हैं। अगर मैदान मार लिये तो आगे का रास्ता बहुत

आसान हो जाएगा।

इंडियन पॉलिटिक्स में कौन कब लंघी मारेगा पता नहीं

वरना यह इंडियन पॉलिटिक्स है भाई। इसमें यह पता ही नहीं होता कि सटकर चलने वाला

कब आपको लंघी मार कर गिरा देगा। ऊपर से जब कांग्रेस का साथ हो तो यह डाउट हमेशा

बना ही रहता है क्योंकि उसका पुराना इतिहास कुछ अइसा ही रहा है। इधर भाजपा का भी

तेजी से कांग्रेसीकरण हो रहा है, इसमें भी कोई डाउट नहीं है। कई बार तो कंफ्यूजन हो

जाता है कि यह भाजपा ही है या कांग्रेस की बी टीम, जिसमें सारी गुटबाजी जैसी बीमारियां

घर कर गयी हैं। मंच पर एक साथ हाथ मिलाये खड़ा नजर आने वाले लोग अंदरखाने में

एक दूसरे को चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

इसलिए माता का जयकारा लगाकर सब कुछ बड़े आराम से देखते रहिए। हमलोग तो इस

दंगल के तमाशबीन ही हैं। लेकिन तय मानिये कि इंडियन पब्लिक को पॉलिटिकल

पार्टियों ने दरअसर खरबूजा समझ रहा है। यह पुरानी कहावत याद है ना कि छुरा तरबूजा

पर गिरे या तरबूजा छुरा पर कटना तो आखिर तरबूजा को ही है। केंद्र और राज्य दोनों ही

कर्ज ले रहे हैं। लेकिन इंतजाम यह किया जा रहा है कि जनता पर अतिरिक्त सेस का

आर्थिक बोझ लादकर इस घाटा को पूरा किया जाए। अरे भाई इतनी तंगी है तो सारे नेता,

मंत्री, अफसर और हाकिमों का वेतन भी थोड़ा कम कर देते। जब पूरे देश पर आफत आयी

है तो देश के इस नवसामंत वर्ग को छूट क्यों

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