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कोलेकांथ मछली पांच साल तो मां के गर्भ में पलती है

कोलेकांथ मछली पांच साल तो मां के गर्भ में पलती है

यह मछली एक सौ साल तक जीवित रहती है
पहले माना गया था कि उम्र बीस साल है
पचास साल की उम्र में यह जवान होता है
प्राचीन पृथ्वी के काल से मौजूद है प्रजाति

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कोलेकांथ मछली के बारे में जो पूर्वानुमान था वह नये शोध में गलत साबित हुआ है।

पहले वैज्ञानिकों का एक आकलन था कि यह मछली भी औसतन बीस साल तक जीवित

रहती है। अब नये अनुसंधान में यह अनुमान गलत साबित हुआ है। पहली बार पाया गया

है कि यह मछली एक सौ वर्षों तक जीवित रह सकती है। मजेदार बात यह है कि पचास

साल की उम्र में यह जवान होती है। समुद्र की इस मछली को लोग भूतहा मछली भी कहते

हैं क्योंकि यह घने समुद्र के अंधेरी गहराई में ही रहता है। इस मछली का नाम कोलेकांथ है,

जो एक प्राचीन काल की मछली है और अब उसके सीमित संख्या में होने की वजह से

उसके संरक्षण का अभियान भी चल रहा है। फ्रांस के एक शोध दल ने इन कोलेकांथ

मछलियों पर अपने निरंतर शोध के बाद उनकी उम्र के बारे में यह नया निष्कर्ष निकाला

है। इस मछली के शरीर पर मौजूद पर्तों के अध्ययन ने उनकी उम्र का अंदाजा लगाया गया

है। इसलिए अब यह भी माना जा रहा है कि शायद यह प्राचीन मछली एक सौ वर्षों से

अधिक समय तक भी जीवित रह सकती है। मजेदार स्थिति का आकलन उसके जवान

होने का है। उसके जवान होने की उम्र ही 45 से 50 वर्ष की होती है। इसी दौरान शोधकर्ताओं

ने यह भी पाया है कि यह मछली अपनी मां के गर्भ में भी वर्षों तक रहने के बाद अंडे के तौर

पर बाहर आती है। इसी अंडे से छोटे बच्चे निकलते हैं। जब पहली बार इसके अवशेष पाये

गये थे तो उनके अध्ययन से यह समझा गया था कि यह एक और विलुप्त हो चुकी मछली

की प्रजाति है। काफी दिनों के बाद गहरे समुद्र में उनके मौजूद होने का पता चल पाया।

कोलेकांथ मछली को विलुप्त प्रजाति मान लिया गया था

समुद्र की गहराई और अंधेरे में रहने की वजह से इन मछलियों को गहराई में जाने के बाद

ही देखा जा सकता है। इससे पहल जो फॉसिल वैज्ञानिकों को मिले थे, उसकी जांच से

उसके करीब 66 मिलियन वर्ष पूर्व होने का निष्कर्ष निकाला गया था। यह माना गया था

कि यह प्राचीन मछली अब इस दुनिया में नहीं है। वर्ष 1938 में दक्षिण अफ्रीका के एक

मछुआरे की जाल में अचानक इस मछली के फंसने के बाद पूर्व का अनुमान गलत साबित

हुआ। यह माना गया कि जिस मछली को वैज्ञानिक विलुप्त मान रहे थे, वह समुद्र की

गहराइयों में मौजूद है। लेकिन उस वक्त समुद्र की अधिक गहराई में देखने की तकनीक

उपलब्ध नहीं थी। इसके हल्के नीले और मोतियों जैसे शरीर के ऊपर के कवच का परीक्षण

से उम्र का पता लगाया गया। अब कोरोना महामारी के दौरान इस शोध को वैज्ञानिकों ने

काफी आगे बढ़ाया है और इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उस प्रजाति की मछली की उम्र के बारे

में पूर्व में किया गया आकलन गलत था। इस बारे में अब एक शोध प्रबंध भी प्रकाशित

किया गया है। इस शोध प्रबंध के सह लेखक ब्रूनो एरनांदे कहते हैं कि नया साक्ष्य मिलने

के बाद उसे स्वीकार करने में वक्त लगता है। समुद्र वैज्ञानिकों के साथ भी कोलेकांथ के

संबंध में कुछ ऐसा ही हुआ है। एरनांदे खुद फ्रांस के यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटपेलायर के

पर्यावरण वैज्ञानिक हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब सब कुछ बंद था तो शोध दल ने

उपलब्ध आंकड़ों का विस्तार से विश्लेषण किया और आपस में ईमेल के जरिए एक दूसरे

को शोध के प्रगति की जानकारी दी।

कोरोना काल में ईमेल के जरिए संपर्क में थे वैज्ञानिक

इसी वजह से यह काम अब इतना आगे बढ़ पाया है। इस मछली की उम्र की गणना के लिए

उसके कवच और पंख (फिन) पर पड़ने वाले रोशनी के प्रभाव से उसकी उम्र की गणना की

गयी है। ध्रुवीकृत रोशनी का एक गोल घेरा उनके शरीर पर पड़ता जाता है, जिसे

माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है। इसी जांच से यह पाया गया कि पहले जो उम्र की

गणना की गयी थी, वह दरअसल उससे पांच गुणा अधिक है। यानी बीस वर्ष के बदले इस

मछली की उम्र एक सौ वर्ष हो सकती है। शोध दल ने इसी क्रम में पाया कि मां के गर्भ में

यह शिशु करीब पांच वर्षों तक रहने के बाद ही बाहर आता है। किसी भी जीव में गर्भ में

होने की यह सबसे लंबी अवधि है। इसके पूर्व भारतीय प्रजाति के हाथियों के गर्भ मे शिशु

के होने की सबसे अधिक समय माना गया था। भारतीय हाथी का बच्चा अपनी मां के गर्भ

में 22 महीनों तक रहता है। आम तौर पर समुद्र की गहराई में काफी धीमी गति से तैरते

नजर आने वाले इस प्रजाति के पास बहुत तेज तैरने के लिए अतिरिक्त पंख हैं, जिनका

इस्तेमाल वह किसी खतरे का एहसास होने के वक्त करती है। अब तक इसकी तीस

प्रजातियों का पता लगाया गया है। यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के जीव विज्ञानी कैलम

रॉबर्ट्स कहते हैं कि विलुप्त होने की कगार पर खड़ी मछली की इस प्रजाति के बारे में नई

जानकारी उत्साहवर्धक है। हर चीज को नष्ट करने का अभ्यस्त हो चुके इंसान को ऐसी

प्रजातियों के संरक्षण की दिशा में अब गंभीर प्रयास करना चाहिए।

 



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