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क्लीनिकल ट्रायल की सफलता पर ही निर्भर है कोविड वैक्सिन का वैश्विक समाधान

  • इसी माह आ सकती है बेहतर सूचनाएं

  • चीन के दावों पर दुनिया को भरोसा नहीं

  • क्लीनिकल ट्रायल के बिना अनुमति नहीं

  • कोरोना की वैक्सिन की दौड़ में भारत का नाम भी आगे

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः क्लीनिकल ट्रायल पर कोरोना की रोकथाम का भविष्य निर्भर कर रहा है।

 कोरोना की वैक्सिन बनाने की दौड़ में भारत का नाम भी तेजी से ऊपर आ रहा है। यूं तो

दुनिया के अनेक प्रयोगशालाओं में कोरोना की वैक्सिन के साथ साथ इसके ईलाज की दवा

बनाने का काम चल रहा है। इसके बीच ही जहां तेजी से प्रगति हो रही है, उन संस्थानों की

गतिविधियों पर पर दुनिया का ध्यान केंद्रित हो गया है। इसी के बीच से जो छनकर

सूचनाएं बाहर आयी हैं, उसके मुताबिक दुनिया भर में डेढ़ सौ से अधिक संस्थानों में इस

पर युद्धस्तर पर काम चल रहा है। इसमें से 130 तो क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ करने की

तैयारियों में जुटे हैं। 13 कंपनियों का क्लीनिकल ट्रायल का पहला चरण चल रहा है जबकि

नौ कंपनियां ट्रायल के दूसरे और मात्र तीन कंपनियां ट्रायल के तीसरे दौर में हैं।

अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर, यूरोपीय कंपनी बॉयोएनटेक ने इस काम के लिए आपस में

हाथ मिलाया है।

भारत में भी कोवाक्सीन बनाने में गाड़ी आगे बढ़ी है

कोरोना की वैक्सिन बनाने में भारतीय कोवाक्सीन पर भी काफी प्रगति हुई है। लेकिन

आम जनता के लिए इसकी वैज्ञानिक जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गयी है

क्योंकि अनुसंधान की सफलता के बाद ही जनता को इस बारे में बताया जाता है। हैदराबाद

स्थित भारत बॉयोटेक से ही अधिक तरक्की होने की सूचना आयी है। इस कंपनी को

क्लीनिकल ट्रायल का फेज 1 और फेज 2 प्रारंभ करने की अनुमति मिली है। भारतीय

औषधि नियंत्रक ने उसे यह अनुमति प्रदान की है। साथ ही आइसीएमआर ने भी इसे

स्वीकृति दी है। इस प्रयोग में नेशनल इंस्टिटियूट ऑफ वाइरोलॉजी भी जुड़ा हुआ है।

अंदरखाने से आयी सूचनाओं के मुताबिक इसमें क्लीनिकल ट्रायल के पहले तक के सारे

निष्कर्ष सही पाये गये हैं। यानी शोध फिलहाल सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्लीनिकल ट्रायल से पहले कई केंद्रों में वायरस अलग किया गया

असम के डिब्रूगढ़ स्थित रिजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने सार्स कोव 2

वायरस को अलग करने में भी सफलता पायी है। इसे अलग किये जाने की वजह से

वायरस का निदान खोज पाना और आसान हो गया है। इसके पहले नेशनल इंस्टिटियूट

ऑफ वाइरोलॉजी पुणे और सीसीएमबी हैदराबाद में भी यही काम हो चुका है। वैसे दुनिया

भर के वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कोरोना की

वैक्सिन बनाने के काम में ऑक्सफोर्ड विद्यालय का अनुसंधान सबसे आगे है। वहां

कोविड 10 वैक्सिन बनाने के लिए आगे आने वाले स्वयंसेवकों को जो दवा दी गयी थी,

उससे फायदा हुआ है और उसे अभी परिष्कृत करने का काम भी आगे बढ़ चुका है। इस

विश्वविद्यालय के एक प्रोफसर के मुताबिक अब तक फेज तीन के ट्रायल के लिए आठ

हजार स्वयंसेवक आगे आये हैं। वहां एजेडडी1222 वैक्सिन पर क्लीनिकल ट्रायल का

दूसरा चरण अभी चल रहा है। इस दवा के सफल होने के बाद उसे तैयार करने की

व्यापारिक जिम्मेदारी एस्ट्राजेनेका नामक कंपनी को सौंपी गयी है। तीसरे चरण की

तैयारियों में जुटे वैज्ञानिकों ने कहा कि इसमें 18 साल से अधिक आयु के लोगों को दवा की

डोज देकर यह जांचा जायेगा कि क्या यह दवा कोरोना संक्रमण को रोक पाने में सफल

होती है अथवा नहीं।

मार्डना का दावा जुलाई में ही व्यापक ट्रायल होगा

अमेरिकी कंपनी मार्डना का दावा है कि इसी जुलाई महीने में उसके द्वारा तैयार की जा

रही कोरोना की वैक्सिन का व्यापक ट्रायल प्रारंभ होगा। यूं तो इस बारे में चीन ने भी

सफलता का दावा सबसे पहले किया था लेकिन अब पूरी दुनिया का चीन पर से भरोसा उठ

चुका है। इसके अलावा थाईलैंड में भी वहां के चूलालोगकोर्न विश्वविद्यालय में वैक्सिन

तैयार करने का काम चल रहा है, जहां पशुओं पर किया गया प्रयोग सफल होने की

जानकारी दी गयी है।

दुनिया भर में चल रहे कोरोना की वैक्सिन के अनुसंधान के विभिन्न चरणों में होने की

वजह से ऐसा माना जा रहा है कि इस महीने तक वैक्सिन बनाने के काम में प्रगति से

संबंधित ढेर सारी सूचनाएं आ सकती हैं। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर यह पता चल

पायेगा कि दरअसल वैक्सिन की सफलता के लिए और क्या कुछ किया जाना शेष है

क्योंकि पूर्ण परीक्षण की प्रक्रिया से गुजरे बिना किसी भी दवा अथवा वैक्सिन को

सार्वजनिक उपयोग की अनुमति नहीं दी जाती है।


 

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