fbpx Press "Enter" to skip to content

क्रोनोलॉजी नहीं दिल्ली हिंसा की असली जिओलॉजी समझ लीजिए

  • भाजपा की जीत वाले इलाकों में ही हिंसा क्यों

  • तीन दिनों से पुलिस इतनी निष्क्रिय क्यों रही

  • केजरीवाल ने कर दी है सेना बुलाने की मांग

  • दिल्ली के अन्य इलाकों में नहीं भड़की आग

विशेष प्रतिनिधि

नईदिल्लीः क्रोनोलॉजी शब्द अचानक इनदिनों प्रचलन में जरूरत से ज्यादा है। दिल्ली

हिंसा ने अब तक बीस लोगों की मार डाला है। पिछले तीन दिनों में लगातार हो रही हिंसा

के बीच जो कुछ तथ्य उभरकर आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि हिंदू और मुसलमान के बीच

तनाव उत्पन्न होने की वजह से ही दिल्ली हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। इसके

बीच अनेक फर्जी वीडियो और संदेश भी लोगों के बीच सोशल मीडिया में प्रसारित कर

लोगों को इसके दायरे में लाने की भरपूर कोशिश हुई है। कई तथाकथित विशेषज्ञ इसके

लिए पूरे घटनाक्रम की क्रोनोलॉजी भी समझाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अब

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सेना की तैनाती की मांग कर दी है। इसे नजरअंदाज तभी

किया जा सकता है जबकि स्थिति नियंत्रण में हो। दूसरी तरफ अगर सेना तैनात करने की

आवश्यकता आ पड़ी तो जाहिर है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत दिल्ली पुलिस

एक बार फिर विवादों में घिर जाएगी।

इस पूरे विवाद को राजनीतिक तौर पर समझने के किसी क्रोनोलॉजी नहीं सामान्य

राजनीतिक भूगोल के ज्ञान की जरूरत है। (देखे मानचित्र)

जिन इलाकों में हिंसा हुई है वे उत्तरी दिल्ली के इलाके है। सामान्य समझ के मुताबिक

इस बात को समझा जाना चाहिए कि इन इलाकों में पिछले विधानसभा चुनाव में किसे

क्या कुछ समर्थन हासिल हुआ है। चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि जिन इलाकों में हिंसा की

अधिक घटनाएं हुई हैं, वहां भाजपा को जीत मिली थी।इस रिपोर्ट के साथ दिये गये

मानचित्र से ही स्पष्ट है कि क्या कुछ चल रहा है।

क्रोनोलॉजी की बात कर मुद्दे को भटकाया जा रहा है

इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस के ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। जिन इलाकों में

भाजपा को चुनावी जीत मिली है, उन इलाकों में ही हिंसा का भड़कना अपने आप में अनेक

सवालों का उत्तर दे देता है। क्योंकि अगर सिर्फ सीएए के विरोध और समर्थन की बात

होती तो दिल्ली के अन्य इलाकों में भी इसी किस्म का रोष प्रदर्शन होना चाहिए था।

लेकिन लगातार उकसाये जाने के बाद भी दिल्ली की मुफ्तखोर जनता इस झांसे में नहीं

आयी है। सोशल मीडिया के विस्तार और हर सूचना को नई कसौटी पर परखने की तेजी से

लोकप्रिय होती आदत की वजह से भी स्पष्ट है कि कौन किसे भड़का रहा है। इसे दिल्ली के

अधिकांश लोग अच्छी तरह समझ रहे हैं। लेकिन पहले जेएनयू फिर जामिया और अब

उत्तरी दिल्ली की घटनाओं की वजह से दिल्ली पुलिस जिस तेजी से अपनी विश्वसनीयता

खो रही है, उसे दोबारा वापस पाने में दिल्ली पुलिस को अनेक वर्ष लग जाएंगे। पुलिस का

भरोसा जनता के बीच कम होना अपने आप में एक राष्ट्रीय नुकसान है, इस नुकसान की

भरपाई कौन करेगा, यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो चुका है।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

6 Comments

Leave a Reply

Open chat
Powered by