उत्तर पूर्व पर अधिक ध्यान से चीन चिंतित

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उत्तर पूर्व के राज्यों पर केंद्र सरकार का अधिक ध्यान दिया जाना कई मायने में फायदेमंद है।

प्रधानमंत्री बार बार इस क्षेत्र के लिए नई नई परियोजनाओं की शुरुआत कर रहे हैं।

इससे उत्तर पूर्व के इस दुर्गम इलाके से जुड़े पड़ोसी देशों तक इसका सकारात्मक प्रभाव जा रहा है।

वैसे अरुणाचल प्रदेश में भारतीय प्रधानमंत्री का बार बार जाना चीन को नागवार गुजर रहा है।

शायद चीन को पहली बार इस बात का एहसास हो रहा है कि भारत अब उसके धौंस में नहीं आ रहा है।

वरना वह काफी समय से अरुणाचल प्रदेश को अपना इलाका बताकर भारत के दावों को नकारता रहा है।

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है।

चीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अरुणाचल प्रदेश दौरे पर कड़ा विरोध जताया है।

कहा है कि संवेदनशील सीमावर्ती प्रदेश का भारतीय नेताओं का इस तरह का दौरा दोनों देश के बीच सीमा विवाद को और ज्यादा उलझा देगा।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनिइंग ने कहा, भारत-चीन सीमा को लेकर चीन का रुख बिल्कुल स्पष्ट है।

चीन सरकार ने कभी भी अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी और वहां जब-जब भारतीय नेता गए तब-तब उस पर कड़ा विरोध जताया।

इस मसले पर चीन का अनुरोध है कि भारतीय नेता चीनी चिंताओं को समझें।

दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते फायदे और चिंता का सम्मान करें।

ऐसे समय में जबकि दोनों देशों के रिश्तों में बेहतरी की गति बनी हुई है, ऐसे में सीमा पर विवाद बढ़ाने वाला कोई कार्य नहीं होना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि चीन अरुणाचल प्रदेश के दक्षिण तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता है।

करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर सीमा का विवाद खत्म करने के लिए दोनों देश वार्ता के 21 चक्र पूरे कर चुके हैं।

बता दें कि चीन उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है।

सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच अब तक 21 दौर की वार्ता हो चुकी है।

भारत-चीन सीमा विवाद में 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा शामिल है।

इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने जवाब में कहा, अरुणाचल प्रदेश राज्य भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य अंग है।

भारतीय नेता समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश का दौरा करते हैं, क्योंकि वे भारत के अन्य हिस्सों में भी जाते हैं।

यह बात कई अवसरों पर चीनी पक्ष को बताई जा चुकी है।

डोकलाम गतिरोध के बाद से ही भारत ने चीन बॉर्डर पर अपनी रक्षा तैयारियों को बेहद पुख्ता बनाने पर फोकस किया है।

इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को तवांग से अरुणाचल प्रदेश के बाकी हिस्से को जोड़ने वाली सी ला सुरंग का शिलान्यास किया।

दरअसल, सी ला एक पर्वत दर्रा है, जिससे होकर सुरंग निकलेगी।

सीमा के बेहद करीब इस सुरंग के बनने से सैनिकों का कम समय में बॉर्डर पर पहुंचना आसान हो जाएगा।

इसके साथ ही तनाव के समय की तैयारियों को लेकर सुरक्षाबलों का भरोसा भी बढ़ेगा।

इस सुरंग का काम पूरा करने में बीआरओ को करीब तीन साल लगेंगे।

प्रॉजेक्ट की लागत 687 करोड़ रुपये तय की गई है।

इस प्रॉजेक्ट के तहत 12।04 किलोमीटर का इलाका आएगा। इसमें 1,790 मीटर और 475 मीटर की दो सुरंगें शामिल हैं।

एक बार काम होने के बाद इन सुरंगों से किसी भी मौसम में आना-जाना आसान होगा।

इससे तेजपुर से तवांग जाने का समय बहुत कम हो जाएगा।

लोगों को सी ला चोटी के बर्फीले रास्ते से नहीं जाना पड़ेगा जो 13,700 फुट की ऊंचाई पर है।’

सी ला की चोटी पर तैनात रह चुके सेना के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, ‘तेंगा से तवांग तक जाने का रास्ता बहुत दुर्गम है।

यहां हमेशा भूस्खलन होता रहता है।’

उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल से यहां कोई बदलाव नहीं आया है।

यहां हर मौसम में पहुंचने के लिए आसान रास्ते की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि सेना को इस प्रॉजेक्ट का लंबे समय से इंतजार था।

इसमें काफी देरी हुई है।

लगभग दो दशक पहले ही एलएसी पर 73 ऑल वेदर रोड बनाने के प्रॉजेक्ट पर विचार किया गया था।

इनमें से 61 सड़कें बीआरओ को बनानी थीं।

अभी तक 34 सड़कों का काम ही पूरा हो पाया है।

चीन ने तिब्बत के क्षेत्र में 14 एयरबेस बनाए हैं और 58,000 किलोमीटर की सड़कों का जाल बिछाया है।

पीपल्स लिबरेशन आर्मी के 30 से 32 डिविजन यहां आसानी से पहुंच सकते हैं और उनकी रसद का इंतजाम किया जा सकता है।

चीन अब यहां कुछ अंडरग्राउंड हैंगर और पार्किंग भी बना रहा है।

ऐसे में इस इलाके में भारतीय सक्रियता से चीन को क्या वास्तविक परेशानी से इसे आसानी से समझा जा सकता है।

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