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चीन तीव्र गति से अरुणाचल के प्रदेश के बगल तक रेल लाइन ले आया

  • साढ़े ग्यारह किलोमीटर लंबी मैनलिंग सुरंग भी पूरा
  • भारतीय सीमा के तीस किलोमीटर तक रेलवे परिवहन
  • अरुणाचल प्रदेश के समानांतर बनी है यह रेल लाइन
  • औद्योगिक निवेश के लिए भी सरकारी प्रोत्साहन जारी
भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी: चीन तीव्र गति से बुनियादी ढाँचे तिब्बत से आगे निर्माण कर रहा है। अरुणाचल

प्रदेश के साथ तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निवेश करने के लिए भी वह अपने

लोगों को प्रोत्साहित कर रहा है। स्थानीय लोगों ने आज कहा कि, राज्य के स्वामित्व वाली

कंपनियों ने यारलुंग त्सांगपो पर एक महत्वपूर्ण रेलवे पुल का हिस्सा पूरा किया। जो

भारत में सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र नदी के रूप में बहती है। यह जो अरुणाचल प्रदेश की

सीमा से मुश्किल से 30 किमी दूर है। यह दक्षिण-पश्चिम चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र

(टीएआर) में ल्हासा और निंगची को जोड़ने वाली 435 किलोमीटर की रेलवे परियोजना का

हिस्सा है, जिसे लिनझी के नाम से भी जाना जाता है। चीन ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर

जो ब्रिज पूरा कर लिया है, वह असल में 435 किलोमीटर लंबी ल्हासा-नियिंगची (लिंझी)

रेलवे प्रोजेक्ट का ही हिस्सा है, जो दक्षिण पश्चिम चीन के तिब्बत क्षेत्र ,तिब्बत स्वायत्त

क्षेत्र में बनाया जा रहा है।

विशेषज्ञों के हवाले से खबरें हैं कि एक बार यह निर्माण पूरा हो गया तो इसका इस्तेमाल

नागरिकों के साथ ही सेना की आवाजाही के लिए भी होगा। यह रेल लाइन और ब्रिज

अरुणाचल की सीमा के बेहद करीब और समानांतर है क्योंकि चीन अरुणाचल को तिब्बत

का ही दक्षिण हिस्सा मानकर उस पर दावा करता है।अरुणाचल के उत्तरी हिस्से को छूते

हुए गुज़रने वाले इस प्रोजेक्ट की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। सामरिक रूप से

अहम होने के साथ ही कहा जा रहा है कि यहां रेल नेटवर्क चीन के निर्माण के लिए सबसे

मुश्किल प्रोजेक्ट रहा है। ब्रिज से पहले जून के अंतिम सप्ताह में 11.5 किमी लंबी मैनलिंग

सुरंग का निर्माण पूरा हो चुका है।

चीन तीव्र गति से काम के लिए लगाये दो हजार मजदूर

ल्हासा-लिंझी रेल प्रोजेक्ट में चीन ने पिछले कुछ महीनों से करीब 2000 कामगारों को

झोंक रखा है। ल्हासा-नियिंगची रेल लाइन के ऑपरेशनल होने के बाद चीन इसे सिचुआन

और यूनान क्षेत्रों तक विस्तार देने की रणनीति पर भी सोच रहा है। ऐसा होने से चीन की

पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के युनान के 14 ग्रुप आर्मी और सिचुआन के 13 ग्रुप आर्मी के

भारी भरकम दलों को बॉर्डर तक मूवमेंट में बहुत आसानी हो जाएगी।

इसके अलावा, सिचुआन से तिब्बत तक एक अन्य रेलवे लाइन के लिए भी चीन योजना

बना रहा है, जो 1700 किलोमीटर लंबी हो सकती है और अरुणाचल प्रदेश के बॉर्डर को छू

सकती है। ओआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक इसके पूरे होने की समय सीमा 2026 बताई

गई है। इस बीच, भारतीय रेलवे के उच्च अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल सीमा

पर निर्माण के मामले में भारत स्पष्ट रूप से पिछड़ा हुआ है। असम में मुरकोंगसेलेक और

अरुणाचल के पासीघाट के बीच लगभग 26 किलोमीटर की एक रेलवे परियोजना वर्षों से

लटकी हुई है। 2012 में स्वीकृत, भूमि अधिग्रहण नहीं होने के कारण 2017 तक परियोजना

में देरी हुई। फिर किसी तरह से लगभग 9 किमी का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन तब

से काम फिर से अटक गया है।अगर यह प्रोजेक्ट पूरा हो भी गया तो भी अरुणाचल तक

भारतीय रेल लाइन पहुंचेगी लेकिन पासीघाट की लोकेशन अरुणाचल से लगने वाले चीन

बॉर्डर से करीब 300 किमी से ज़्यादा है।

गलवान की घटना के बाद दोनों देश सैन्य सतर्कता में

दोनों ही देश सीमाओं पर अपनी ताकत मज़बूत करने में जुटे हैं इसलिए ऐसे में अरुणाचल

बॉर्डर तक पहुंच रही चीन की रेलवे लाइन भारत की चिंता बढ़ाने का कारण बनती है।

इसका उल्लेख करें ,गरीबी उन्मूलन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अरुणाचल प्रदेश सीमा के

करीब सुदूर स्थानों में बसने के लिए तिब्बती चरवाहों को प्रोत्साहित करने की योजना का

हिस्सा है। शी ने सीमावर्ती क्षेत्र (तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) में जड़ें जमाने, चीनी क्षेत्र की सुरक्षा

करने और अपने गृहनगर को विकसित करने के लिए दक्षिण-पश्चिम चीन के तिब्बत

स्वायत्त क्षेत्र, टीएआर में लुन्ज काउंटी के एक अग्रणी परिवार को पत्र लिखा था।


 

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