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न्याय और हिंसा पर मुख्य न्यायाधीश की सही चेतावनी

न्याय कई बार ऐसी परिस्थितियों में घटित होती है, जहां इंसान अपनी सामान्य

समझ को छोड़कर भावना में बह जाता है। लेकिन बाद में उसे ठंडे दिमाग से सोचने

पर उसके नुकसान का पता चल पाता है। हैदराबाद में दुष्कर्म के आरोपियों के पुलिस

मुठभेड़ में मारे जाने के बाद कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया सामने आयी है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े के अलावा भी

कई लोगों ने इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दरअसल हैदराबाद और उन्नाव

की दो अलग अलग घटनाओं की वजह से देश इतना अधिक आंदोलित था कि ऐसी

प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने बिल्कुल सही बात कही है कि

न्यायिक प्रक्रिया में इस किस्म की प्रतिहिंसा को स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।

कई बार हम आवेश में भीड़ की हिंसा को भी जायज ठहरा देते हैं। लेकिन इसका

नुकसान क्या होता है, इसे हम अच्छी तरह देख समझ रहे हैं। भीड़ की हिंसा यानी

मॉब लिंचिंग के अनेक उदाहरण इस देश में हाल के दिनों में सामने आये हैं। यह बड़ी

दुर्भाग्यजनक स्थिति यह है कि इस किस्म की हिंसक घटनाओं को बढ़ावा देने में देश

के राजनीतिज्ञ भी बड़ी भूमिका निभाते पाये गये हैं।

न्याय और हिंसा को बढ़ावा देने के लिए राजनीति की भी भूमिका

दरअसल यह नेताओं की वोट की राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन इससे

समाज को क्या कुछ नुकसान हो रहा है, उसे महसूस करने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति बोबड़े ने सही मुद्दे को बिल्कुल सही तरीके से परिभाषित करते हुए सही

चेतावनी दी है। इस बात को बड़ी गंभीरता से समझना होगा कि अगर हम इस किस्म

की त्वरित प्रतिक्रिया को सही और वीरोचित कार्रवाई ठहराने की दिशा में पहल करते

रहेंगे तो तय है कि आने वाले दिनों में कभी न कभी अपना हाथ भी इसमें जल जायेगा।

उस वक्त हम खुद भी इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की स्थिति में नहीं

होंगे क्योंकि हम ऐसी गलत परंपरा की नींव डालने वालों में शामिल होंगे। लेकिन

मुख्य न्यायाधीश ने इसी क्रम में इस किस्म के गंभीर अपराधों की त्वरित सुनवाई

की भी बात कही है। दरअसल हम आज दुष्कर्म के मामलों में जो आक्रोश पूरे देश में

देख समझ रहे हैं, उसके पीछे न्यायिक प्रक्रिया के विलंब भी एक कारण है।

इसे सही तरीके से समझते हुए सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने दोषियों को सजा

दिलाने के लिए न्यायिक सक्रियतावाद को बढ़ावा देने की बात कही है। यह सही बात

है कि अगर इस किस्म के गंभीर अपराध के दोषियों को जल्द सजा मिलने की प्रक्रिया

लागू होगी तो कमसे कम दोषियों को उन्नाव जैसी घटना को अंजाम देने का साहस

तो नहीं मिलेगा। लेकिन इन तमाम घटनाओं के साथ-साथ पुलिस की भूमिका क्या

हो, इस पर भी सामाजिक मूल्यांकन की आवश्यकता है। हैदराबाद में पुलिस ने मुठभेड़

में चारों अपराधियों को मार गिराया, इसकी प्रशंसा हो रही है।

हैदराबाद और उन्नाव की घटनाओं के दूरगामी प्रभाव को समझना होगा

वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के उन्नाव की घटना में पुलिस पर बार बार यह आरोप

लग रहा है कि विभागीय अधिकारी अभियुक्तों के साथ मिले हुए थे। इसी वजह से

पीड़िता के खिलाफ दूसरी  बार जानलेवा हमला करने का साहस दोषियों को मिला। हाल

के दिनों में भीड़ की हिंसा को जायज ठहराने का एक अदृश्य अभियान भी चल पड़ा है,

जो देश की न्यायिक प्रक्रिया के लिए घातक है। इसके पीछे कौन लोग हैं और

उनका असली मकसद क्या है, इसे समझना बहुत कठिन बात नहीं है। यह भारतीय

राजनीति का आजमाया  हुआ नुस्खा है कि जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का

आसान तरीका कोई और  मुद्दा प्रस्तुत कर देना है। लेकिन यह नुस्खा उस वक्त ज्यादा

कारगर था जब देश में सोशल मीडिया का इतना विस्तार नहीं हुआ था। अब भी नुस्खा

काम तो करता है लेकिन उसका प्रभाव जल्द ही समाप्त हो जाता है क्योंकि कुछ लोग

अब भी मुद्दों की  बात पकड़कर ही आगे बढ़ते हैं।

प्याज और पाकिस्तान से अलग भी देश के अपने मुद्दे हैं

अब देश में प्याज और पाकिस्तान के बीच किसी एक को चुनना हो तो देश का जनमत

बंटा हुआ नजर आयेगा। लेकिन अगर यही प्याज वाकई एक वर्ष तक एक सौ रुपये

प्रति किलो के भाव से ऊंचा रहे तो तय है कि बहुमत प्याज के मुद्दे पर सरकार से ही

उत्तर मांगेगी। न्याय और हिंसा के बीच इस संतुलन को समझने की इसलिए भी

जरूरत है क्योंकि हम इस किस्म का तात्कालिक भावना में बहते हुए समाज को

किसी अन्य हिंसक परिस्थिति की तरफ जाने से रोक सकें।

कई बार इस तरीके से भीड़ को न्याय और हिंसा के बीच फर्क करने से रोका जाना भी

किसी अत्यंत खतरनाक परिस्थिति को जन्म देने वाला साबित हो सकता है। यह देश

ऐसे हालत पहले भी अनेकों बार देख और झेल चुका है। इसलिए देश की जनता को

भी न्याय और हिंसा के बीच के इस फर्क को समझना चाहिए।

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