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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर आखिर चाहते क्या हैं




केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने चौबीस घंटे के भीतर ही अपना बयान बदल दिया। वैसे इस बीच किसानो के अंदर जो आग लगनी थी, वह लग चुकी थी। इसलिए चुनावी माहौल में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर श्री तोमर ने पहला बयान क्यों दिया और दिया तो अगले ही दिन उससे पलट क्यों गये।




इस बात की गंभीरता को उत्तरप्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में विचारा जाना चाहिए। आखिर एक केंद्रीय मंत्री अचानक से यह बयान देता है कि तीनों कृषि कानून फिर से लाये जा सकते हैं। उनका यह बयान इसलिए भी चुनावी राजनीति के तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भाजपा इस बार सिर्फ किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी की घटना की वजह से बैकफुट पर है।

दोनों ही मामलों की वजह से उसके वोट बैंक पर सेंध नही डाका पड़ा हुआ है। भाजपा की तरफ से खुद नरेंद्र मोदी को इस बार के चुनाव में आगे आना पड़ा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में पार्टी के चाणक्य समझे जाने वाले अमित शाह फेल हो चुके हैं। उन्हें सिर्फ एक इलाके की जिम्मेदारी दी गयी है। अब जबकि खुद नरेंद्र मोदी ने माफी मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों की वापसी का एलान किया।

बाद में संसद से उसे वापस भी ले लिया गया तो एक केंद्रीय कृषि मंत्री नाहक ही या बिना सोचे समझे फिर से कृषि कानूनों को दोबारा लाने की बात कह गया, यह बात गले से नहीं उतरती। वैसे भी केंद्रीय कृषि मंत्री का ऐसा बयान आना था और किसान संगठन फिर से भाजपा के खिलाफ आवाज उठाने लगे। उनके बयान से पहले ही कई किसान संगठनों ने मिलकर पंजाब में चुनाव लड़ने का एलान कर दिया था।

केंद्रीय कृषि मंत्री का बयान अनर्गल तो नहीं होता

केंद्र की राजनीति का कोई भी अनुभवी नेता इस तरीके से हल्के में कोई बयान नहीं देता, यह सर्वविदित बात है। वर्तमान समीकरणों के बीच श्री मोदी की माफी के बाद भी तोमर के इस बयान को भाजपा के अंदर चल रही उथल पुथल से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए क्योंकि केंद्रीय मंत्री इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते होंगे कि उनके बयान के बाद उसके क्या कुछ परिणाम होंगे।

श्री तोमर का बयान आया तो अगले ही दिन वह अपनी बयान से पलट गये। दूसरी तरफ दोबारा कृषि कानूनों को लाने की बात के साथ साथ किसान नेता राकेश टिकैत ने राजस्थान में ही यह एलान कर दिया कि अब देश में किसानों की मरजी के बगैर कोई ऐसा फैसला कोई दल नहीं ले सकता है क्योंकि देश का किसान और नौजवान अब जाग चुका है।




इसलिए यह भी माना जा सकता है कि केंद्रीय मंत्री ने नरेंद्र मोदी के एलान के बाद जानबूझकर किसानों को भड़काने का काम किया और अपना काम पूरा होने के बाद अपने बयान से पलट गये। इससे उत्तरप्रदेश और पंजाब में भाजपा की राजनीति का वह दृश्य भी सामने आता नजर आ रहा है, जो दरअसल पर्दे के पीछे से चल रहा है।

जैसे जैसे चुनाव के दिन करीब आ रहे हैं, यह गतिविधियां भी धीरे धीरे पर्दे के सामने आती जा रही हैं। दरअसल किसानों को नये सिरे से भड़काने का जो काम उन्होंने किया है वह दरअसल किसान आंदोलन के दौरान किसानों के मिले घावों को कुरेदना ही था। नरेंद्र मोदी ने बिना सोचे समझे ऐसा नहीं कहा होगा, यह तय है क्योंकि आज के दौर में नरेंद्र मोदी के ऊपर कोई बात कहने की हिम्मत कोई नहीं करता।

अंदर की गड़बड़ी धीरे धीरे आ रही है सामने

इस परिस्थिति के बाद भी अगर कोई बयान जारी हुआ तो उसके राजनीतिक मायने ही हैं। उसका नतीजा भी सबके सामने हैं। किसानो ने नाराजगी जाहिर कर दी है और फिर से आंदोलन करने तक की चेतावनी दे दी है। दूसरी तरफ इसके साथ ही नये सिरे से लखीमपुर खीरी की घटना के लिए जिम्मेदार माने गये केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त करने की मांग दोहरायी जाने लगी है।

उत्तरप्रदेश में किसानों को मनाने के साथ साथ महिलाओं को अपने पाले में रखने में जुटे श्री मोदी की मुहिम को इससे धक्का लगा है। अब यह धक्का पार्टी के अंदर से ही क्यों दिया जा रहा है, यह समझने वाली बात है। राजनीति में कोई भी बात यूं ही नहीं कही जाती है। खास तौर पर चुनावी माहौल में हर बात का अपना अलग महत्व होता है।

अब केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर का यह बयान क्यों आया और अगले ही दिन उन्होंने अपने ही बयान का खंडन क्यों कर दिया, इस बात को समझने के लिए चुनावी गतिविधियों में भाजपा के अंदर बदलते समीकरणों पर भी हमें ध्यान देना पड़ेगा।



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