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केंद्र सरकार की दूसरी बड़ी गलती दिल्ली का फैसला

केंद्र सरकार ने आनन फानन में एक कानून की मदद से दिल्ली की चुनी हुई सरकार पर

लगाम रखने के लिए उप राज्यपाल को अधिक अधिकार दिये हैं। इस प्रस्ताव को उतनी ही

जल्दबाजी में राष्ट्रपति ने भी अपनी मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति के यहां से इसी तरीके से

किसान कानूनों को भी स्वीकृति मिली थी। लेकिन किसान कानूनों के पास कराने के जैसा

ही यह केंद्र सरकार की दूसरी बड़ी गलती नजर आ रही है। जिस मकसद से भाजपा की केंद्र

सरकार ने यह फैसला किया था, उसमें वह भले ही कामयाब हो जाए लेकिन शिक्षित और

लोकतंत्र प्रेमी भारतीय जनता की नजर में इस फैसले से भी उसकी विश्वसनीयता घट रही

है, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। दिल्ली में भी आम जनता के बीच हुए त्वरित

सर्वेक्षणों का नतीजा यही निकलकर सामने आ रहा है कि वहां के मतदाताओं ने केंद्र

सरकार के इस फैसले को सही नहीं माना है। जिस तरीके से किसी राज्य में अचानक से

राष्ट्रपति शासन के रास्ते केंद्र सरकार की दखलअंदाजी का विरोध होता आया है, ठीक

उसी तरीके से इस बार भी भाजपा का यह फैसला नई पार्टी यानी आम आदमी पार्टी को

अपना दायरा और बढ़ाने का अवसर प्रदान करने वाली साबित होने जा रही है। इससे पूर्व

गुजरात में भी इस पार्टी ने पहली बार अपना कदम रखने में कामयाबी हासिल कर ली है।

पंजाब में वह धीरे धीरे आगे बढ़ती हुई नजर आने लगी है। अब उत्तर प्रदेश के पंचायत

चुनाव में भी आम आदमी पार्टी का चुनाव लड़ने का एलान भाजपा के लिए निश्चित तौर

पर एक नई चुनौती बनने वाली है।

केंद्र सरकार ने किसानों को नाराज कर भी गलती की है

यह चुनौती इसलिए भी अधिक असरदार हो सकती है क्योंकि किसान आंदोलन की वजह

से कई राज्यों में भाजपा और केंद्र सरकर की हरकतों से जो नाराजगी उपजी है, उसमें

राजनीतिक शून्य को भरने का आसान विकल्प बनकर यह नई पार्टी सामने आ रही है।

आम आदमी पार्टी ने भी केंद्र सरकार की इस गलती का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल

करना प्रारंभ कर दिया है। दरअसल कई योजनाओं की वजह से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री

अरविंद केजरीवाल राजनीतिक तौर पर पूरे देश में एक बड़ी लकीर खींचने में कामयाब हो

चुके हैं। दिल्ली की शिक्षा और स्वास्थ्य का मॉडल अब देश की नहीं विदेशों में भी चर्चा का

विषय है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलानिया ने भी दिल्ली के इसी

शिक्षा के मॉडल को देखा था। उस वक्त भी केंद्र सरकार ने भयभीत होते हुए दिल्ली

सरकार के किसी मंत्री को उनके साथ होने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उस वक्त

भी दिल्ली की जनता को यह फैसला पसंद नहीं आया था। नाराजगी दर नाराजगी का यह

आलम कृषि कानूनों को लेकर किसानों के साथ हुए टकराव को लेकर है। किसान अब भी

दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। केंद्र सरकार की सोच थी कि समय के साथ ही किसान

अपने अपने कारणों से इस आंदोलन को छोड़कर लौट जाएंगे। लेकिन इस बार किसानों की

तैयारी और रणनीति की वजह से केंद्र सरकार की चालें नाकामयाब होती दिख रही हैं।

किसानों ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए पारी पारी से धरना देने और अपने खेत में काम

करने की योजना को अमल में लाने के अलावा पूरे देश में चुनावी माहौल में भाजपा के

खिलाफ प्रचार करने में पूरी ताकत झोंक दी है।

हर जगह भाजपा के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं किसान

किसानों के आंदोलन से उपजी नाराजगी का ही आलम है कि पंजाब के भाजपा विधायक

अरुण नारंग इस गुस्से का शिकार बने हैं। नारंग शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल

होने पहुंचे थे जो पंजाब सरकार के खिलाफ थी। जैसे ही वह वहां पहुंचे तो किसानों ने उन्हें

घेर लिया और स्याही फेंक दी तथा लात घूसों से पिटाई करने लगे। जैसे- तैसे

सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें बाहर निकाला। इससे फिर से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जमीनी

स्तर पर फिलहाल भाजपा नेता किस किस्म की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भाजपा

के केंद्रीय मंत्री संजीव वालियान भी एक बार के प्रयास के बाद चुपचाप बैठ गये हैं क्योंकि

उन्हें माहौल का सीधा अनुभव हो चुका है। किसान नेता राकेश टिकैत के बारे में लगातार

बयान देने के वाले विधायक गुर्जर भी अब चुप हैं। केंद्र सरकार की जल्दबाजी के बीच ही

पश्चिम बंगाल और असम का चुनाव भी भाजपा के लिए अतिरिक्त बोझ है। एक राज्य में

उसे ममता बनर्जी से सत्ता छीनने की जल्दबाजी है तो दूसरे राज्य में अपनी सत्ता और

साख बनाये रखने की चुनौती है। इन तमाम परिस्थितियों में घिरी केंद्र सरकार की

जल्दबाजी दरअसल अब खुद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को दांव पर लगाने के फैसले हैं

जो अंततः नुकसानदायक साबित होंगे। ऐसे में दिल्ली की चुनी हुई सरकार के खिलाफ यह

फैसला आग में घी डालने के अलावा कुछ और नहीं है।

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