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कोरोना प्रबंधन में केंद्र सरकार अपनी गलती स्वीकारना नहीं चाहती है

कोरोना प्रबंधन पर केंद्र सरकार हमेशा गोलमटोल बात करने लगी है। दरअसल

वास्तविकता से सीधे संपर्क में आने के बाद देश में जो कुछ हुआ है, उसकी वजह से

विशेषज्ञ अब खुलकर केंद्र सरकार के पक्ष में नहीं बोल पा रहे हैं। अलबत्ता नेताओं की

भाषणबाजी जारी है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कोविड महामारी की

दूसरी लहर एकदम विनाशकारी साबित हुई है। भले ही इसकी चपेट में आने वाले संक्रमितों

एवं मृतकों की संख्या में अब कमी आने लगी है लेकिन मौजूदा स्तर भी खासा अधिक है।

अधिकांश राज्यों ने कोरोना वायरस के प्रसार पर लगाम लगाने के लिए लॉकडाउन जैसी

बंदिशें लगाई हुई हैं जिससे आर्थिक क्रियाकलापों पर प्रतिकूल असर देखने को मिल रहा है।

लेकिन हर समझदार यह जानता है कि एक भी संक्रमण फिर से देश में संक्रमण फैला

सकता है। इसलिए नियमित जांच की प्रक्रिया को जारी रखना समय की मांग है। केंद्र

सरकार कोरोना प्रबंधन में कैसे चूक गयी है, उसे समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के

पूर्व के वक्तव्य को याद करना होगा। इसमें उन्होंने राजनीतिक लोकप्रियता हासिल कर

अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए यह कहा था कि दुनिया में अनेक लोग यह कहते फिर

रहे थे कि भारत में कोरोना का सबसे अधिक असर होगा, जो गलत साबित हुआ है।

दरअसल इस भाषण के बाद चुनाव प्रचार में अत्यधिक व्यस्त और पूरा ध्यान पश्चिम

बंगाल का चुनाव जीतने पर लगाने की वजह से उन्होंने कोरोना के हालात पर ध्यान ही

नहीं दिया था। नतीजा क्या था, यह हमारे सामने है। हर दिन चार लाख से अधिक संक्रमण

के साथ हम दुनिया में कोरोना संक्रमण के मामले में नंबर एक देश बन गये।

कोरोना प्रबंधन की लापरवाही की वजह से दोबारा संक्रमण फैला

केंद्र सरकार कोरोना प्रबंधन में पिछड़ी तो चार लाख से अधिक का आंकड़ा पहुंचा

हो सकता है कि वास्तविक मौत का आंकड़ा इससे भी अधिक हो क्योंकि गंगा और यमुना

के साथ साथ अन्य नदियों में जो लावारिश लाशें पायी गयी हैं, उनकी गिनती इसमें

शामिल नहीं है। इतना कुछ होने के बाद भी अब तक केंद्र सरकार कोरोना प्रबंधन के

मामले में अपनी खामियों को खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पायी है। महामारी से निपटने

के संदर्भ में देखें तो वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता से कहीं अधिक संस्थागत एवं इलाज

की समुचित क्षमता के अभाव ने भारत की जंग को कमजोर किया है। मसलन, दिल्ली एवं

अन्य शहरों को फंड की कमी के नाते मेडिकल ऑक्सीजन की कमी से नहीं जूझना पड़ा।

पैसे से भले ही आप शायद अधिक जांच किट एवं वेंटिलेटर खरीद सकते है लेकिन पैसे से

आप इनका सदुपयोग सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। तमाम ऐसी रिपोर्ट आई हैं कि कई

राज्यों में, खासकर ग्रामीण इलाकों में संक्रमण की जांच क्षमता बहुत ही कम है। कई जगह

ऐसा कोई नहीं है जो पहले से मौजूद वेंटिलेटरों को चला पाए। भारत की खराब संस्थागत

क्षमता का एक और उदाहरण है, महामारी के बीच में भी वह पहले से स्वीकृत ऑक्सीजन

संयंत्र नहीं लगा पाया। यह कहने का मतलब यह नहीं है कि सरकार को चिकित्सकीय

ढांचा बनाने पर खर्च नहीं करना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि अकेले पैसे

से भारत की चिकित्सकीय क्षमता को रातोरात अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचाया जा

सकता है।

टीकाकरण में भी कोई स्पष्ट नीति के अभाव में वैक्सीन की कमी

कोविड-रोधी टीका लगाने की रफ्तार बेहद निराशाजनक रही है। आबादी के एक बड़े हिस्से

को कम वक्त में टीके लगाना भारत के लिए मुमकिन काम था। लेकिन सरकार ने न

केवल टीका निर्माता विदेशी कंपनियों से बात करने से परहेज किया बल्कि उसने घरेलू

विनिर्माताओं को भी पर्याप्त संख्या में ऑर्डर नहीं दिए। यह शायद इस दौर की सबसे बड़ी

नीतिगत खामी है। केंद्र सरकार ने इस बार राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन न लागू कर अच्छा

ही किया है। ऐसे फैसलों के लिए राज्य सरकारें कहीं बेहतर स्थिति में होती हैं। राज्यों में

संक्रमण के मामलों को देखते हुए सरकारों को अलग ढंग से प्रतिक्रिया देनी होगी। फिर भी

हरेक अहम फैसले को राज्यों पर छोडऩा कोई समझदार रणनीति नहीं है। केंद्र सरकार को

राज्यों के साथ अधिक सक्रियता दिखाते हुए सामंजस्य बिठाना चाहिए। ऐसा होने पर

अलग-अलग राज्यों में कारगर तरीके अधिक तेजी से अपनाए जा सकेंगे। केंद्र ने टीके की

खरीद का जिम्मा राज्यों पर ही डाल दिया है। टीकाकरण कार्यक्रम को निजी क्षेत्र के लिए

खोलना अलग बात है और इसके ठोस कारण भी हैं। लेकिन विदेशी फर्मों एवं घरेलू

विनिर्माताओं से टीका खरीद का जिम्मा राज्यों पर ही डाल देने में कोई तुक नहीं है। केंद्र

सरकार कोरोना प्रबंधन को छोड़ लोकप्रियता के झांसे में अधिक रही है। इसी वजह से अब

कोरोना के आंकड़े ही सरकार से जुड़े विशेषज्ञों को सरकार के पक्ष मे खुलकर बोलने की

इजाजत नहीं दे रहे हैं। ऊपर से टीकाकरण के बजट की घोषणा के बाद यह कमी केंद्र

सरकार कोरोना प्रबंधन में अपनी गलती स्वीकार ले यही समझदारी होगी।

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