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जीएसटी के मुद्दे पर अपनी बात से पीछे हटी केंद्र सरकार

जीएसटी के मुद्दे पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चंद दिनों पूर्व ही साफ साफ

कह दिचया था कि अभी राज्यों को उनके हिस्से के कर की अदायगी नहीं की जा सकती है।

दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्यों में विशेष पैकेज का एलान कर गैर भाजपा शासित

राज्यो को केंद्र सरकार ने अच्छा खासा नाराज कर लिया था। अब बदली हुई परिस्थितियों

में केंद्र सरकार अपने पहले की बात से पीछे हटी है। केंद्र ने सोमवार को कहा कि वह

जीएसटी क्षतिपूर्ति के बकाया के मद में सोमवार रात राज्यों को 20,000 करोड़ रुपये जारी

करेगा। जीएसटी परिषद की 42वीं बैठक के बाद संवाददाताओं को जानकारी देते हुए वित्त

मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि जिन राज्यों को एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) के

हिस्से में 2017-18 के लिए कम प्राप्त हुआ, केंद्र उनके लिये अगले सप्ताह संचयी रूप से

24,000 करोड़ रुपये जारी करेगा। राज्यों को क्षतिपूर्ति जारी करने के मुद्दे पर उन्होंने कहा

कि ‘इस साल हमने अब तक जो भी संग्रह किया है, 20,000 करोड़ रुपये का वितरण

सोमवार रात राज्यों को किया जाएगा।’ राज्यों को अप्रैल-जुलाई के लिए 1.51 लाख करोड़

रुपये की क्षतिपूर्ति की जरूरत है। आईजीएसटी के मुद्दे पर सीतारमण ने कहा कि कुछ

राज्यों को अधिक आईजीएसटी का वितरण हुआ है, उसे वापस लिया जाएगा। हालांकि

उन्होंने यह नहीं बताया कि यह राशि कितनी है। इस आंकड़े को स्पष्ट नहीं करने के मुद्दे

पर अगले बैठक में गैर भाजपा शासित राज्य निश्चित तौर पर फिर से केंद्र सरकार के

खिलाफ हमलावर रुख अख्तियार करेंगे।

जीएसटी के मुद्दे पर केंद्र सरकार को पहले ही स्पष्ट करना था

सीतारमण ने कहा कि अगले सप्ताह के मध्य में  उन राज्यों को 24,000 करोड़ रुपये जारी

किया जाएगा, जिन्हें आईजीएसटअी के हिस्से में वास्तविक बकाया के मुकाबले कम

प्राप्त हुआ है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जीएसटी परिषद ने जून 2022 के बाद भी जीएसटी

उपकर जारी रखने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। पहले जीएसटी उपकर लगाए जाने की

समय सीमा जून 2022 थी। उन्होंने कहा कि क्षतिपूर्ति उपकर पांच साल के बाद भी यानी

जून 2022 के बाद भी लगाए जाने का निर्णय किया गया है। यह उतनी अवधि के लिए

लगाया जाएगा, जो राजस्व अंतर को पूरा करने के लिए जरूरी होगा। गौरतलब है कि

जीएसटी ढांचे के तहत कर 5, 12, 18, और 28 प्रतिशत के स्लैब में लगाए जाते हैं। उच्च

दर से कर के अलावा आरामदायक तथा समाज के नजरिए से अहितकर वस्तुओं पर

उपकर लगाया जाता है। उपकर से प्राप्त राशि का उपयोग राज्यों के राजस्व में कमी की

भरपाई के लिए किया जाता है। इन तमाम उपायों के बीच कर का भुगतान हो जाने के बाद

अचानक से देश पर कोरोना का संकट आने की वजह से क्या देश और क्या आम आदमी,

सबका बजट एकदम से बिगड़ गया है। लेकिन इस जीएसटी में से राज्यों को उनका हिस्सा

देने के मुद्दे पर विवाद धीरे धीरे तीखी होती जा रही थी।

कर संग्रह में राज्यांश के मुद्दे पर फालतू का तनाव भी फायदेमंद नहीं

राज्यों की यह दलील सही है कि जो पैसा केंद्र सरकार के खाते में आ चुका है, उसमें से

राज्य का हिस्सा क्यों नहीं दिया जा सकता। यह भी तब जब केंद्र सरकार अपनी मर्जी से

उन्हीं राज्यों को पैसा दे रही है, जहां उनकी अपनी सरकार है। वित्त मंत्री की अध्यक्षता में

जीएसटी परिषद की 42वीं बैठक में पांच करोड़ रुपये से कम के सालाना कारोबार वाले छोटे

करदाताओं के लिए अनुपालन बोझ को कम किया गया है। इसके तहत उन्हें एक जनवरी,

2021 से मासिक कर भुगतान के साथ तिमाही आधार पर जीएसटी रिटर्न भरने की

अनुमति दी गई है। कुल मिलाकर केंद्र सरकार के सारे फैसले फिलहाल तो राज्य सरकारों

अथवा आम आदमी को राहत पहुंचाने की दिशा में मददगार बनते नजर नहीं आ रहे हैं।

कागजी स्तर पर कई मुद्दों पर बड़ी चर्चा होने के बाद भी सच तो यह है कि आम आदमी को

अब तक कोरोना संकट से बिगड़ी अर्थव्यवस्था के सुधरने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

तय मानिये कि जब तक देश में नई फसल मंडियों तक नहीं पहुंचेगी, इस गाड़ी को गति

नहीं मिलने जा रही है। केंद्र सरकार ने तो शायद इस पूरे दौर में जीएसटी के मुद्दे पर  पूरी

तरह से हाथ खड़े कर लिये हैं और वह सिर्फ अपनी तमाम जिम्मेदारियां राज्य सरकारों के

मत्थे मढ़कर निश्चिंत हो जाना चाहती हैं। लेकिन इस बात को समझना होगा कि जिन

शर्तों और दावों के आधार पर इस जीएसटी व्यवस्था को लागू किया गया है, उसकी शर्तों

का पालन करना भी केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी है। इससे पीछे हटने का नतीजा यह

होगा राज्य फिर से अपने इलाके में कर संग्रह की कोई नई व्यवस्था लागू करेंगे और केंद्र

सरकार का हाथ फिर से खाली होने लगेगा।


 

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