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आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार को और ध्यान देना होगा







आर्थिक मोर्चे पर यह स्पष्ट हो चुका है कि देश की गाड़ी पटरी से उतर चुकी है।

अब उसे सही तरीके से नहीं संभाला गया तो अंततः गाड़ी गहरी खाई में चली

जाएगा। पड़ोसी देश पाकिस्तान इसी खाई से बाहर आने के लिए संघर्ष कर रहा है।

दूसरी तरफ बांग्लादेश इस खाई में होने के बाद अब तेजी से ऊपर की तरफ आता

हुआ नजर आ रहा है। इससे स्पष्ट है कि सरकारी नीतियों के सफल क्रियान्वयन

पर ही आर्थिक व्यवस्था के अनुशासित होने तथा अर्थव्यवस्था के मजबूत होने

आधार बनते हैं।

इस मामले में वर्तमान भारत सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सही

तरीके अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर पा रही हैं। वह अब भी देश की

बिगड़ती स्थिति के लिए डॉ मनमोहन सिंह और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर

रघुराम राजन को देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कोस रही हैं।

यह ना तो उचित है और न ही वर्तमान सरकार के लिए बिगड़ती अर्थव्यवस्था

के संबंध में कोई भरोसेमंद दलील ही है।

निर्मला सीतारमण अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही हैं

वर्तमान सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री

डॉ मनमोहन सिंह के कुशल अर्थशात्री हैं। नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों

के बाद उन्होंने जिन खतरों की तरफ देश का ध्यान आकृष्ट किया था,

वे सभी सही साबित हुए हैं। इसलिए डॉ सिंह को कोसने के बदले राजकोषीय

घाटा कम करने एवं राजस्व संग्रह बढ़ाने के तौर तरीकों पर केंद्रीय वित्त

मंत्री को अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

याद रहे कि अमेरिका के दौरे पर भी निर्मला सीतारमण ने देश की बिगड़ी

अर्थव्यवस्था के लिए डॉ सिंह और रघुराम राजन को जिम्मेदार ठहराया था।

प्रमुख अर्थशास्त्रियों के बीच भारतीय वित्त मंत्री का यह बयान मजाक का

हिस्सा बनकर रह गया है। अनेक लोगो ने इस बात पर चुटकी ली है कि

शायद श्रीमती सीतारमण को इस बात का एहसास अब तक नहीं हो पाया

है कि उनकी सरकार का यह दूसरा कार्यकाल प्रारंभ हो चुका है।

पिछले पांच वर्षों से जो सरकार सत्ता में है अब सारी स्थितियों और

परिस्थितियों की जिम्मेदारी उसकी बनती है।

आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार को सुधार आजमाना चाहिए

अगर अब भी श्रीमती सीतारमण इसके लिए डॉ सिंह और रघुराम राजन

को जिम्मेदार ठहराती हैं तो यह सवाल उठता है कि फिर पिछले पांच

साल तक उस सरकार ने काम क्या किया है, जिसमें वह खुद रक्षा मंत्री

भी रह चुकी हैं। वैसे श्रीमती सीतारमण के बयान पर पूर्व प्रधानमंत्री

डॉ. मनमोहन सिंह ने जवाब दिया है।

डॉ. सिंह ने कहा कि भाजपा सरकार सिर्फ विपक्ष पर दोष मढ़ने में जुटी है,

वह समाधान तलाशने का प्रयास भी नहीं कर रही। मनमोहन सिंह ने

कहा कि आर्थिक सुस्ती, सरकार की उदासीनता से भारतीयों के भविष्य

और आकांक्षाओं पर असर पड़ रहा है।

डॉ. सिंह ने कहा कि मैं वित्त मंत्री के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं करना

चाहूंगा, लेकिन मैं केवल यह बता सकता हूं कि अर्थव्यवस्था को ठीक

करने के लिए बीमारियों और उनके कारणों का सही निदान करने की

आवश्यकता होगी। भारतीय अर्थव्यवस्था पर चिंता जाहिर करते हुए

डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि आर्थिक मंदी की वजह से महाराष्ट्र पर

काफी असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र भर में कारोबारी धारणा

काफी कमजोर, कई इकाइयां बंद हुईं हैं।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा सरकार

लोगों के अनुकूल नीतियां नहीं अपनाना चाहती है, जिसका असर

आज देखा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि निवेश आकर्षित करने में महाराष्ट्र पहले नंबर पर

था। आज, यह किसान आत्महत्याओं में अग्रणी है।

कृषि आय दोगुनी करने के वादे के बावजूद, महाराष्ट्र के ग्रामीण

इलाकों में संकट कम होने के आसार नहीं हैं। पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि

पानी की कमी वाली स्थिति का अगर जल्द ही समाधान नहीं किया

जाता है, तो स्थिति बदतर हो जाएगी।

महाराष्ट्र में पानी का संकट भी ध्यान योग्य विषय

महाराष्ट्र के लोग पहले से ही पीने के साफ पानी की कम उपलब्धता

से जूझ रहे हैं और सूखी नदी के तल खोदने का सहारा ले रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सार्वजनिक क्षेत्र

के बैंकों की हालत के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और रिजर्व

बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के दौर को जिम्मेदार ठहाराया था।

उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह और राजन का कार्यकाल सरकारी

बैंकों के लिए सबसे बुरा दौर था। साथ ही कहा था कि सभी सार्वजनिक

बैंकों को नया जीवन देना आज मेरा पहला कर्तव्य है।

लेकिन पंजाब एंड महाराष्ट्र को-आपरेटिव बैंक के सवाल पर

श्रीमती सीतारमण फिर से रिजर्व बैंक पर जिम्मेदारी डाल गयी थी।

लिहाजा आर्थिक मोर्चे पर सिर्फ बयानबाजी और दूसरों पर जिम्मेदारी

डालने के बदले वर्तमान सरकार को अपने स्तर पर भी ठोस

सकारात्मक कदम उठाना चाहिए ताकि स्थिति को और

अधिक बिगड़ने से रोका जा सके।



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