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फिर से भटक रही है केंद्र सरकार की प्राथमिकताएं

फिर से केंद्र सरकार अब उत्तर प्रदेश की राजनीति पर अधिक ध्यान दे रही है। ऐसा तब है

जबकि समय की मांग है कि हर किस्म के राजनीतिक यथास्थितिवाद को कायम रखते

हुए सबसे पहले देश के लोगों के लिए टीका का इंतजाम किया जाए। हम देख रहे हैं कि इस

पर निरंतर प्रयास के बदले अब प्रधानमंत्री आने वाले दिनों में होने वाले विधानसभा

चुनावों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इससे विरोधियों के उस आरोप को दम मिलता है कि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेश् चुनाव मोड में ही रहता है। बाकी कामों में उनका अधिक

ध्यान नहीं होता है। कल ही प्रधानमंत्री के साथ भाजपा के शीर्ष नेताओं की एक बैठक हुई

है। यह बैठक उस समय हो रही है जब आरएसएस दिल्ली में अलग से मंथन कर रहा है

और उत्तरप्रदेश भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं होने के लगातार संकेत मिल रहे हैं। बता दें

कि अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में चुनाव होने हैं।

इसके साथ ही साल के आखिर में गुजरात में भी विधानसभा के चुनाव होंगे। इन राज्यों में

होने वाले चुनावों को लेकर भी प्रधानमंत्री की बैठक में चर्चा हुई। खुद श्री मोदी ने चुनाव में

पराजय से सीख लेने की बात कही है। यानी बंगाल का सबक भाजपा को नये सिरे से सतर्क

होने पर मजबूर कर गया है। तो यह माना जाना चाहिए कि बीजेपी ने बंगाल चुनाव से

सीख लेते हुए आने वाले चुनावों के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने आवास पर पार्टी महासचिवों से मुलाकात की।

फिर से कोरोना छोड़ चुनावी तैयारी में जुटे हैं मोदी

मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री ने पार्टी महासचिवों को इस साल हुए चुनावों में हार से सबक

लेने को कहा। जानकारी के मुताबिक यह बैठक करीब पांच घंटे तक चली। श्री मोदी ने कहा

कि पार्टी को अपने प्रदर्शन की गहन समीक्षा करनी चाहिए फिर चाहें नतीजा यह हार हो

जीत। प्रधानमंत्री ने बंगाल में हार के बाद टीएमसी से भी सीख लेने को कहा है कि किस

तरह 2019 लोकसभा में राज्य में 18 सीटें जीती थीं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने क्षेत्रीय

भाषाओं में भी सोशल मीडिया के उपयोग को बढ़ाने की सलाह दी। प्रधानमंत्री केरल और

तमिलनाडु में प्रदर्शन को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि केरल में पार्टी को

गैर हिंदू समुदायों के साथ गठबंधन करने की दिशा में काम करना चाहिए। जैसे इसाई

समुदाय, जिसे बीजेपी के साथ हाथ मिलाने में ज्यादा दिक्कत नहीं है। मीटिंग के दौरान

प्रधानमंत्री ने कोरोना काल के दौरान चलाए गए सेवा ही संगठन कार्यक्रम की भी समीक्षा

की। बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष, शिव प्रकाश, अरुण सिंह, सीटी

रवि, डी पुरंदेश्वरी, दिलीप सैकिया, तरुण चुग, दुष्यंत गौतम, कैलाश विजयवर्गीय और

भूपेंद्र यादव मौजूद थे। लेकिन इस महामारी के वैश्विक संकट के मुद्दे पर इस बैठक में कोई

चर्चा नहीं होना पार्टी और केंद्र सरकार की असली प्राथमिकताओं को रास्ते से फिर भटक

जाने का संकेत देते हैं। अभी तो देश की जरूरत कोरोना जांच को बनाये रखने और

अधिकाधिक लोगों को जल्द से जल्द टीका देने का है। आम जनता की इन जरूरतों को

भाजपा के जमीन से जुड़े नेता भी अच्छी तरह समझ रहे होंगे। यह अलग बात है कि

वर्तमान भाजपा में मतभिन्नता को स्वीकार नहीं किया जाता है।

बंगाल चुनाव की नाव डूबाने वाले अब भी संगठन पर हावी

लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम ने संगठन पर हावी उस गुट को ही सवालों के घेरे

में ला दिया है, जिनकी वजह से चुनाव के परिणामों की घोषणा से खुद प्रधानमंत्री की साख

पहली बार गिरती हुई दिखने लगी है। यह अलग बात है कि कोरोना के कुप्रबंधन और अभी

के टीकाकरण की फेंकाफेंकी से भी जनता नाराज है। फिर भटक जाने की बात को भाजपा

के अन्य लोग भी इसे समझ रहे हैं। इधर उत्तर प्रदेश में भाजपा के अंदर जो कुछ हो रहा

है, वह दरअसल क्या है, उसे समझने के लिए वक्त लिया जाना चाहिए। लेकिन यह याद

दिला देना प्रासंगिक होगा कि जब इस राज्य में मुख्यमंत्री पद का चयन हो रहा था तो

जम्मू कश्मीर के वर्तमान राज्यपाल मनोज सिन्हा का नाम सबसे ऊपर चल रहा था।

बताया गया था कि वह खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद है। लेकिन चंद घंटों में ही सारे

समीकरण बदल गये थे और योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया

गया था। इसलिए उत्तर प्रदेश को हल्के में लेना संभव नहीं है। ऊपर से हाल के पंचायत

चुनावों में किसान आंदोलन की वजह से भाजपा का जो हाल हुआ है, उससे भी नेता अच्छी

तरह वाकिफ है। इसलिए फिर भटक रही सरकार को चाहिए कि वह सरकारी कामकाज की

प्राथमिकताओं के आधार पर अपना काम करे और कोरोना जांच के साथ साथ टीकों का

इंतजाम करने पर अपना सबसे ज्यादा ध्यान दे।

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