सीबीआइ अब अपने अफसरों पर प्राथमिकी को लेकर सवालों के घेरे में

सीबीआइ की इस दुर्गति की जिम्मेदार राजनीति

सीबीआइ यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो खुद ही अब सवालों के घेरे में है।



इससे पहले ही जब इस जांच एजेंसी के दो प्रमुख अधिकारियों का विवाद सामने आया था

तो समझा गया था कि एजेंसी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

दूसरी तरफ इस विवाद पर सत्तारूढ़ दल के लोग भी कुछ बोलने से इसलिए कतरा रहे थे

क्योंकि ये दोनों ही अधिकारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चयन थे।

दोनों ही गुजरात कैडर के आइपीएस अधिकारी है।

अब चूंकि एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ घूसखोरी का मामला दर्ज हो चुका है।

इसलिए यह सवाल लाजिमी है कि अब सीबीआइ में दरअसल चल क्या रहा है।

भाजपा सरकार पर पिछले कुछ समय से अनेक राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन

इस जांच एजेंसी के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाते आ रहे हैं।

सीबीआइ पर राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप पुराने हैं

अब दो अधिकारियों के बीच की लड़ाई ने इस बात को साबित कर दिया है कि

सीबीआइ भी राजनीति से मुक्त नहीं है और वहां जांच के नाम पर कुछ और ही खेल चल रहा है।

राष्ट्रीय खबर में कुछ अरसा पहले जब सीवीसी तक राकेश अस्थाना के शिकायत की बात प्रकाशित हुई थी

तभी दिल्ली में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि यह लड़ाई सरकार के लिए भी फजीहत का कारण बनेगी।

इस अनुमान का नतीजा अब सामने है। जहां एजेंसी के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना पर

3 करोड़ रुपए घूस लेने के आरोप लगने के बाद अब अस्थाना ने अपनी ही संस्था के निदेशक

आलोक वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) से शिकायत की है।

वैसे श्री अस्थाना पहले ही निदेशक के खिलाफ सीवीसी में यह शिकायत दर्ज करा चुके हैं कि

कुछ मामलों की जांच के क्रम में निदेशक द्वारा बाधा उत्पन्न किया जा रहा है।

अब अस्थाना का आरोप है कि वर्मा ने खुद 2 करोड़ रुपए रिश्वत ली,

इसलिए अपने को बचाने के लिए उनके खिलाफ आरोप लगाए जा रहे हैं।

सीबीआई ने अस्थाना के आरोप को झूठ और बेबुनियाद बताया है।

सीबीआइ निदेशक पर अस्थाना ने लगाये हैं घूसखोरी के आरोप

यानी एजेंसी फिलहाल अपने निदेशक के साथ खड़ी है और इस लड़ाई में एजेंसी की जो फजीहत हो रही है,

उसकी चिंता सरकार को परेशान कर रही है।

अस्थाना ने लिखा है कि सतीश साना के खिलाफ एक मामले को निपटाने के लिए

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने 2 करोड़ रुपए की रिश्वत ली।

साना ने एजेंसी को दी गई अपनी एक शिकायत में कहा है कि मनोज प्रसाद और उसके भाई सोमेश प्रसाद ने राकेश अस्थाना की मदद से उसका एक मामला निपटाया और इसके एवज में 3 करोड़ रुपए रिश्वत ली गई।

अस्थाना ने अपने पत्र में कहा है कि मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच रुकवाने के लिए सतीश साना ने आलोक वर्मा को 2 करोड़ रुपए दिए।

पत्र में अस्थाना ने यह भी कहा है कि जनवरी में पूछताछ के दौरान सतीश साना ने यह बात कबूल की थी कि

कुरैशी का मामला रफा-दफा करने के लिए उसने तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद सीएम रमेश से सिफारिश की थी,

जो बाद में सीबीआई निदेशक से भी मिले थे।

कैबिनेट सचिव को इस मामले की दी गयी थी जानकारी

पत्र के मुताबिक, ‘सतीश साना की ओर से आलोक वर्मा को दी गई रिश्वत की जानकारी कैबिनेट सचिव को

24। अगस्त 2018 को दे गई थी।

इसके बाद सीवीसी ने कार्रवाई करते हुए संबंधित फाइलें अपने सुपुर्द करने का आदेश दिया था।

अस्थाना ने निदेशक आलोक वर्मा के पास साना की गिरफ्तारी का प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया

लेकिन चार दिन बाद इससे संबंधित फाइल अभियोजन निदेशक को भेज दी गई।

अस्थाना ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि सतीश साना 25 सतंबर 2018 को हैदराबाद एयरपोर्ट के रास्ते

दुबई भागने की फिराक में था लेकिन उसकी कोशिश नाकाम हो गई क्योंकि उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) जारी हो चुका है।

इस पर सीबीआई ने कहा है कि ‘साना के खिलाफ जारी एलओसी की जानकारी निदेशक वर्मा को नहीं है,

यह कहना गलत है क्योंकि सीबीआई निदेशक ने देखा और उसे पुष्टि भी की है।’

सीबीआइ के अपने दावों की बात करें तो राकेश अस्थाना का विदेश में भी कारोबार है।

जिसे प्राथमिकी में दर्ज मनोज प्रसाद का भाई सोमेश देखा करता है।

सीबीआइ के दो वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लग रहे इस किस्म के आरोप में

रॉ के वरीय अधिकारियों तक का नाम आना ही यह साबित कर देता है कि

इन सभी एजेंसियों को भ्रष्टाचार के दीमक ने अंदर से खोखला कर दिया है।

अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख का दावा करने वाली नरेंद्र मोदी की सरकार

अपने दो चहेतों के बीच जारी आरोप प्रत्यारोप पर न्यायपूर्वक क्या कार्रवाई करेगी

इसकी तरफ पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।

वैसे आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद इन तमाम आरोपों का सामाजिक अंकेक्षण भी किया जाना चाहिए।



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