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बिल्ली और लामा से बढ़ी है वैज्ञानिकों को उम्मीद

  • प्राणियों में कोरोना वायरस रोकने के प्राकृतिक गुण

  • दोनों प्राणियों में प्राकृतिक तौर पर है प्रतिरोधक

  • जीसी 373 नामक गुण की पहचान भी हो चुकी है

  • इसे इंसानों के लायक बनाने का परीक्षण जारी है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बिल्ली और लामा के अध्ययन से कोरोना की कोई काट निकल सकती है।

वैज्ञानिक एक तरफ तो कोरोना के जानलेवा वायरस हमले से बचाव के लिए वैक्सिन

बनाने में जुटे हैं तो दूसरी तरफ दवा पर भी शोध चल रहा है। इन दोनों से अलग वैज्ञानिकों

का एक बड़ा दल इस धरती पर मौजूद अन्य प्राणियों की संरचना पर शोध कर रहा है, जो

कोरोना को खुद ही मात दे सकते हैं। इनमें से लामा (अंग्रेजी शब्द इलामा) के बारे में पहले

ही जानकारी मिल चुकी है कि उसमें कोरोना वायरस को रोक देने की प्राकृतिक क्षमता है।

दरअसल दो अलग अलग प्रजाति के वायरस के इस कोविड 19 में अंश होने की वजह से

यह मामला अधिक पेचिदा हो गया है। इस कोविड 19 के मूल अंश चमगादड़ों से आया है।

चमगादड़ों के बारे में यह भी स्पष्ट हो चुका है कि वुहान के वायरोलॉजी अनुसंधान में

पिछले सात वर्षों से इस पर शोध चल रहा था। लेकिन वायरस का दूसरा हिस्सा पैंगोलीन

का है, यह वह स्पाईक प्रोटिन का हिस्सा है, जो वर्तमान में इंसानों के शरीर के अंदर जाने

के बाद अपनी वंशवृद्धि करता है जबकि दवाइयों के प्रभाव से वायरस को बचाता रहता है।

बिल्ली और लामा की आंतरिक संरचनाओं को देखा गया

वैज्ञानिक लामा और बिल्लियों की आंतरिक संरचना में इसके बचाव के रास्तो को देख

चुके हैं। अब इसी रास्ते का उपयोग इंसानों के लिए कैसे किया जाए, इस पर शोध चल रहा

है। अलबर्टा विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने इसी माह हुई एक ऑनलाइन बैठक में

उनलोगों ने इस बारे में बंदरों और बिल्लियों के जेनेटिक हिस्सों को कृत्रिम तरीके से

विकसित कर इसका प्रयोग किया है। बंदरों के फेफड़ों के हिस्सों को प्रयोगशाला में

जेनेटिक तौर पर तैयार किया गया था। इनमें सार्स कोव 2 वायरस के हिस्से डाले गये थे।

जब बिल्ली के जेनेटिक्स से हासिल एक अंश से यह साबित हुआ कि वह इस वायरस को

आगे बढ़ने से रोक रहा है। इस शोध से जुड़े बॉयोकेमिस्ट जोआने लेमियूक्स ने बताया कि

एक एंटीवायरस यौगिक जीसी 373 इसे रोक रहा है। उन्होंने इस बारे में जटिल वैज्ञानिक

विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है।

यह पाया गया है कि इस जीसी 373 का बिल्लियों पर कोई गलत प्रभाव नहीं होता है। इसे

और भी बेहतर ढंग से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया का एक थ्री डी

कंप्यूटर मॉडल भी तैयार किया था। इसे ऑनलाइन बैठक के दौरान वैज्ञानिकों के समक्ष

प्रस्तुत भी किया गया था। सब कुछ देखने समझने के बाद कैलिफोर्निया की एक कंपनी

एनिवाइव ने इसके क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति भी मांगी है। वैसे यह कंपनी जानवरों

के लिए दवा बनाने का काम करती आयी है। अभी तक के शोध के मुताबिक यह जीसी373

सैद्धांतिक तौर पर वर्तमान अवस्था में इंसानों पर भी उतना ही कारगर है यानी कोरोना

वायरस से निरंतर बचाव देने में सक्षम है। फिर भी इंसानी शरीर पर इसके अन्य संभावित

प्रतिक्रियाओं को वैज्ञानिक अच्छी तरह से परख लेना चाहते हैं।

इस्तेमाल से पहले और परख लेना चाहते हैं वैज्ञानिक

आम समझ की भाषा में इसे बताया गया है कि कोरोना वायरस का स्पाइक प्रोटिन इंसानी

शरीर के उस दरवाजे को खोल देता है, जो अंदर की तरफ खुलता है। इससे वायरस अंदर

आने के बाद वंशवृद्धि करने लगता है। लेकिन अगर इस दरवाजे के ऊपर एक जाली लगा

दिया जाए, जैसा कि आम तौर पर घरों में मच्छर या कीट पतंगों को आने से रोकने के लिए

लगाया जाता है तो वायरस बाहर ही रह जाता है। बिल्ली और लामा में यही गुण प्राकृतिक

तौर पर मौजूद होते हैं।

वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह दरअसल लाखों अणुओं के आपसी मिश्रण का

खेल है। इसमें सभी को मिश्रण के बाद उत्पन्न होने वाली ऊर्जा पर नजर रखना जरूरी है।

साथ ही सब कुछ शांत हो जाए तो कौन सा अणु अपने किस गुण के साथ किस हालत में

विद्यमान है, उसे भी देखना पड़ता है। बिल्ली और लामा जैसे प्राणी अपने स्वाभाविक

जेनेटिक गुण की वजह से ऐसे किसी भी हमले को प्रारंभिक अवस्था में ही रोकने की

क्षमता रखते हैं। उसी क्षमता का उपयोग इंसानों के लिए किया जाना है। लेकिन यह काम

जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता क्योंकि जेनेटिक संशोधन के दूरगामी परिणामों को

जांचना परखना पड़ता है।

डाक्टरों द्वार क्लोरोक्वीन के असर को नकार दिये जाने के बाद भी वैज्ञानिक इस

क्लोरोक्वीन के प्रभाव को दरकिनार करने के पक्ष में नहीं हैं। उनके मुताबिक यह स्पाइक

एसीई2 के आगे बढ़ने को रोकने की क्षमता रखता है। इसलिए अभी इसकी जांच आगे

जारी रहेगी। शोध में जब तक इन अति सुक्ष्म अणुओं के व्यवस्थित होने तक के परिणामों

की पूरी जांच नहीं हो जाती, इस बारे में कोई निष्कर्ष जारी नहीं किया जाएगा, ऐसी

जानकारी वैज्ञानिकों ने दी है।


 

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