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कार्बन डॉईऑक्साइड को साफ हवा में बदल देगी यह तकनीक

  • बिजली उत्पादन संयंत्रों में बेहतर काम करेगी
  • कम बिजली और कम खर्च के लिहाज से बेहतर
  • व्यापारिक उत्पादन की जिम्मेदारी दूसरी कंपनी को
  • एमआइटी के वैज्ञानिकों ने फिर से कर दिखाया नया कारनामा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कार्बन डॉईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की वजह से ही पृथ्वी का

पर्यावरण तेजी से बिगड़ता जा रहा है। पर्यावरण संबंधी जितनी भी परेशानियां

जमीन, हवा और पानी में बढ़ रही हैं, उसके अन्यतम मुख्य कारणों में यह

घना कार्बन डॉईऑक्साइड है। अब पर्यावरण ने इससे निजात पाने की सफल

तकनीक तैयार कर ली है। मजेदार बात यह है कि यह तकनीक सिर्फ उसी स्थान

पर कारगर तरीके से साफ और स्वच्छ हवा पैदा कर पा रही है, जहां घने कार्बन

डॉईऑक्साइड का मात्रा हो। कम घनत्व वाले इलाके में यह काम नहीं कर

पा रही है।

जहां गैस अधिक होगी वहीं करेगा बेहतर काम

मैसाच्युट्स इंस्टिटियूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने यह कारनामा कर

दिखाया है। परीक्षण में इसके कारगर साबित होने के बाद खास तौर पर इसे

ताप विद्युत केंद्रों के लिए बहुत बेहतर उपाय समझा गया है।

इन ताप विद्युत केंद्रों में ही घने अवस्था में कार्बन डॉईऑक्साइड की हवा में

घुलने का काम सबसे ज्यादा होता है। इसलिए इस तकनीक को वहां स्थापित

करने से सबसे बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक उत्प्रेरक तकनीक को विकसित किया है।

इसके तहत यह संयंत्र किसी भी ऐसी परिस्थिति में बेहतर तरीके से काम

कर पा रही है, जहां हवा के साथ कार्बन डॉईऑक्साइड की मात्रा घने

अवस्था में आ रही हो।

खर्च कम होने की वजह से बेहतर इस्तेमाल

इस विधि को तैयार करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया है कि इसके संचालन में

कम बिजली और पैसे लगते हैं। दूसरे तरीकों की तुलना में यह उपाय इस

लिहाज से भी किफायती और ज्यादा कारगर साबित हो सकता है।

इसकी विशेषताओं की वजह से यह खास तौर पर वहां ज्यादा बेहतर परिणाम

देता है, जहां ईंधन के जलने से गैस के तौर पर कार्बन डॉईऑक्साइड का

उत्सर्जन बहुत ज्यादा होता हो।

इस वजह से यह तकनीक ताप विद्युत केंद्रों के लिए सबसे बेहतर साबित

हो सकता है।

कार्बन डॉईऑक्साइड साफ करने की विधि बैटरी के इंजन जैसी

वैज्ञानिकों ने इसकी विधि के बारे में भी जानकारी दी है। जिसमें बताया गया है

कि दरअसल यह पूरी विधि एक बैटरी के अंदर के जैसा ही काम करती है।

यह अपने अंदर बनी संरचना की वजह से कार्बन डॉईक्साइड को सोख लेती है।

उसके सांस लेने के क्रम में जो गैस अंदर आती है, उससे यह कार्बन डॉईऑक्साइड

सोख लिया जाता है। इसके अंदर लगे इलेक्ट्रॉड विद्युतीय चार्ज पाकर सक्रिय

हो उठते हैं और वे सक्रिय होने के बाद कार्बन डॉईऑक्साइड को साफ करने

में जुट जाते हैं।

व्यापारिक उत्पादन की जिम्मेदारी बेरोडेक्स कंपनी को

इसके दूसरे चरण में सोखे गये कार्बन डॉईऑक्साइड को स्वच्छ हवा में बदलने

की तकनीक पर काम होता है। इस दौर में कार्बन डॉईऑक्साइड अपने अंदर से

टूटता है और कार्बन दूसरे स्वरुप में बदलने के बाद उसमें बचा ऑक्सीजन

फिर से हवा में इस्तेमाल के लायक बन जाता है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि सबसे अधिक गर्मी पैदा करने वाले कार्बन डॉईऑक्साइड

को इस विधि से पर्यावरण सुधार के काम में लगाया जा सकता है।

चूंकि यह विधि दूसरी विधियों के मुकाबले किफायती है, इसलिए पृथ्वी के

वातावरण में बन रहे कार्बन डॉईऑक्साइड की मात्रा को यह कम करने में

एक कारगर पद्धति साबित होगी। वैज्ञानिकों ने इस विधि को आजमाने के

बाद उसके व्यापारिक उत्पादन के लिए एक कंपनी को इसकी जिम्मेदारी

सौंप दी है। वेरोडेक्स नामक कंपनी इसका व्यापारिक उत्पादन करेगी।

यह कंपनी पहले से ही सॉफ्ट डिंक्स की बोटलिंग और प्लांट फूड के निर्माण

के क्षेत्र में सक्रिय है।

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