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राजधानी रांची में अनेक भवनों पर दिख रहा है टू लेट का बोर्ड

रांची : राजधानी रांची में दिन पर दिन बढ़ती आबादी से धीरे-धीरे लोगों का राह चलना भी मुश्किल हो गया है।

जिससे त्रस्त लोग दिन में अपनी दो पहिया चार पहिया वाहनों का उपयोग भी करने से कतराते है।

पर फिर भी किसी तरह ट्रैफिक नियमों को तोड़कर या निभा कर लोग अपना रास्ता बना लेते है।

हालांकि रांची को झारखंंड की राजधानी घोषित करने के बाद से अबतक कई विकास कार्य राजधानी रांची में भी देखने को मिला है।

पर काफी वक़्त से नई औद्योगिक विकास राजधानी रांची में थम सी गई है।

पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ी आबादी राँची में स्थानांतरण की है।

जो कुछ न कुछ कार्य से गुज़ारा चला रही है।

कई भवने इमारतें व्यवसाय के लिये खड़े तो हो रहे है।

पर नये किराएदार कोई व्यवसाय या कार्यालय का संचालन के लिये कथित तौर पर आ नहीं रहे।

कितने बोर्ड कार्यालय या गोदाम के लिये देय है लिखे तो रखे है।

पर इन स्थानों पर बोर्ड पर सिर्फ धूल ही जमा हो रहे है।

कई ऐसे भी भवन है जो अर्धनिर्मित हो के पड़े है।

या कोई नए किरायेदार की राह तक रहे है जिसके कारण काम का फिनिशिंग पूर्णतः नहीं किया गया है।

दरअसल बात नई सरकारी व्यवस्था की है जिससे कई इमारतों को खाली देखा जा रहा है।

उठ रहें है सवाल वर्तमान सरकार पर

सवाल ऐसा बन गया है कि क्या वर्तमान सरकार के नियमों से त्रस्त है लोग?

जो झारखंड में व्यापार या नई उद्योग को विकसित नहीं कर पा रहे है।

रांची सहित कई शहरों में देखा खाली प्लॉट व भवन अब भी कई वक्त से कार्यालय के लिए खाली पड़े हैं।

यह एक ऐसा मुद्दा है जो सरकार के नियमों के कारण या वैश्विक मंदी के कारण किसी व्यपारियों का झेलना पड़ रहा है।

जीएसटी का भय या सरकारी टैक्स का डर किसी नई व्यवस्था के रास्ते पर रोड़ा बनी हुई है।

जबकि व्यवसाय व नई उद्योग प्राणाली को विकसित करने के लिये अर्थव्यवस्था व व्यक्ति की पहुंच भी जरूरी है।

हालांकि अन्य शहरों की तुलना में रांची शहर के लोगों की जीवनशैली पर नई व्यवस्था के विकसित नही होने से खासा असर नहीं पड़ा है।

पर एक शहर में बढती आबादी को किसी न किसी रोजगार पर निर्भर होना तो निश्चित है।

जिसके लिये कोई नए रोजगार उत्पन्न नही हो रहे है।

सवालिय निगाहें प्रधानमंत्री स्टार्ट अप योजना पर भी आती है कि क्यों कोई नये स्टार्ट अप के तहत लोग कार्य विकसित नही कर पा रहे।

कहां कहां खाली पड़े है प्लॉट व कामर्शियल भवन?

बात करें रांची के मुख्य मार्गों पर स्थित कामर्शियल स्पेस की तो

रांची में सिर्फ 4-5 ऐसे स्थान है जहां पर कई इमारतें ऑफिस स्पेस के लिये खाली पड़ी है।

जिनमे मुख्यत: रांची का बिरसा चौक इलाक, मेन रोड, कडरू, हरमु बाईपास, किशोरगंज, कोकर, रातु रोड आदि है।

जहां कहीं 1000 स्क्वेयर फिट तो कहीं 1200 स्क्वेयर फिट, तो कहीं दुकान के लिये 450 स्क्वेयर फ़िट स्पेस खाली पड़े है।

जिसके टूलेट के बोर्ड कामर्शियल भवनों पर कई कई महीनों वर्षो से लटका पड़ा है।

हालांकि रहने के लिये घर खोजों तो किराएदार आसानी से मिल जाते है पर व्यवसाय खोलने के लिये स्पेस के बोर्ड बस धूल फांकते रहते है।

पुछे जाने पर कारोबारियों का कहना है कि कुछ भी नया व्यवसाय खोलना तो आसान है।

जिसके लिये सरकार की नीतियां सुविधाजनक और सहायक भी है।

पर प्रति व्यक्ति आय व गीरती अर्थव्यवस्था से बाज़ार पर भरोसा नही बन पाता है।

राजधानी रांची में परेशान है भवनों के मालिक

उल्लेखनीय है कि अगर प्रति व्यक्ति विकास रूका पड़ा है

दौर मंदी का चल रहा है तो कोई नया व्यव्साय कार्यालय शाखाएँ खोलने से कतराता जरूर है।

जिसका सिधा असर बिल्डर्स व कामर्शियल भवन के मालिको पर पड़ रहा है।

चाह कर भी अखबारो में ऐड डालकर या जगह जगह होर्डींग व पर्चे चिपकवा कर भी किरायेदार के लिये तरस रहे है।

पुछे जाने पर अपनी मंशा बताते हुए भवन मालिक कहते है कि किसी तरह लोन लेकर

व जमा पूंजी लगाकर, कोई पेंशन के पैसे लगाकर तो कोई मार्केट से पैसे उठाकर लगा तो दे रहे है

पर किरायेदार नहीं मिलने पर लोन की रकम भी चुकता करना भी मुश्कील हो गया है।

कई भवन मालिकों की यह भी स्थिती बनी पड़ी है कि सारे पैसे लगा कर भी काम पूरा नहीं हो पाया है

और ना ही भवन के किसी तल्ले में कोई रेंट लगी है और उपर से बैंक का कर्ज.

कुछ लोगों ने बताया कि पहले बैंक के ही कई शाखाएँ खुल जाती थी या एटीएम भी खुल जाता था

या टॉवर लगाने के लिये भी लोग टेलीकाम कम्पनी भवन या खाली स्पेस लीज़ पर ले लेते थे

पर अब तो देश में ऐसी स्थिती बनी हुई है बैंक हो या टेलीकाम सेक्टर सब अपनी साख बचाने में लगे हुए है।

तो ऐसी स्थिती में कोई किस सेक्टर में इंवेस्ट करें या पैसे लगाये और नया कार्यालय खोले या उद्योग स्थापित करे।

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