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कैंसर के ईलाज में चीन के वैज्ञानिकों ने की एक और प्रगति




  • कैंसर की गांठों के अंदर तक असर

  • रोशनी से गांठ के अंदर सक्रिय होती है यह विधि
  • कैंसर की गांठ के अंदर से कैंसर समाप्त करने की प्रक्रिया

  • चीन के वैज्ञानिकों ने ट्यूमर आधारित कैंसर का ईलाज खोजा


प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः  कैंसर के ईलाज के लिए दुनिया भर में अलग अलग शोध चल रहे हैं।

इसी कड़ी में चीन के वैज्ञानिकों ने ट्यूमर आधारित ईलाज की एक नई विधि विकसित करने का दावा किया है।

शोध कर्ताओं का दावा है कि चूहों पर यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा है।


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कैंसर में जहां शरीर के अंदर गांठें विकसित होती हैं, उनमें यह प्रयोग शत प्रतिशत सफल रहा है।

लेकिन यह अभी सिर्फ चूहों पर ही आजमाया गया है। इसे इंसानों पर आजमाया जाना अभी शेष है।

वैसे कैंसर की गांठों को समाप्त करने में इस सफलता के क्लीनिकल ट्रायल के

सफल होने पर कैंसर की इस परेशानी से लोगों को निश्चित तौर पर राहत मिल सकती है।

दरअसल कैंसर कोशिकाओं के लगातार बढ़ते जाने की वजह से

ही बाद में शरीर के अंदर गांठों का निर्माण होने लगता है।

यह कैंसर के काफी हद तक फैल जाने की निशानी होती है।

अगर इन गांठों को इस विधि से समाप्त किया जा सका तो कैंसर के विकसित

अवस्था में भी रोगियों को पूरी तरह ठीक किया जाना संभव हो सकेगा।

इम्युनोलॉजी पर प्रकाशित होने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में इस ईलाज के

संबंध में विस्तार से जानकारी दी गयी है। इस लेख में बताया गया है

कि दरअसल  कोशिकाओं के अनियंत्रित विकास की वजह से ही शरीर की

स्वस्थ्य कोशिकाएं उनके दबाव में मरने लगती हैं।

चीनी वैज्ञानिक अपने खोज में इन्हीं स्वस्थ कोशिकाओं और उनके द्वारा निर्मित होने वाली

रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को विकसित करने में कामयाब हुए हैं।

यह बताया गया है कि कैंसर के मरीजों में से तीस प्रतिशत को गांठ की इस समस्या से जूझना पड़ता है।

कैंसर के ईलाज में नैनो पार्टिकल विधि से रास्ता तलाशा

चीनी वैज्ञानिको ने नैनो पार्टिकल विधि से इस समस्या से निजात पाने का रास्ता तलाशा है।

यह शोध शंघाई इंस्टिट्यूट ऑफ मेटेरिया मेडिका में चल रहा है।

यह शोध चीन के एकाडमी ऑफ साइंस तथा फुडान विश्वविद्यालय के साथ मिलकर किया जा रहा है।

इस टीम का नेतृत्व वांग डांगे कर रहे हैं।

दरअसल ट्यूमर विधि से शोधकर्ताओं ने इसके विपरित काम करने वाले दवा को तैयार किया है।

यह दवा गांठों में वैसे प्रोटिन को पहुंचने से रोक देते हैं,

जो कैंसर के बढ़ने के कारण हैं।

स्वस्थ टी सेलों को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए कैंसर की कोशिकाओं को मारने की यह विधि है।

दरअसल वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि कैंसर की वजह से बनने वाली गांठों तक

पीडी 1 और पीडी 11 नहीं पहुंच पाता है।

इस वजह से उनतक दवाई का असर भी नहीं होता है।

अब चीनी वैज्ञानिकों का यह ईलाज इसी स्थिति को बदलने वाली है।

वांग की टीम ने नैनो पार्टिकल्स तैयार किये हैं।

यह नैनो पार्टिकल पीडी एल1 को ईलाज के स्थान तक पहुंचान में मददगार है।

इस विधि से दवा के निशाने पर वे एंटीबॉडी होते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने में बाधक हैं।

वैसे शोध प्रबंध में बताया गया है कि नैनो पार्टिकल की यह विधि रोशनी से संचालित होती है।

इसके लिए वैसा फोटो सेंसेटाइजर तैयार किया गया है जो इन ट्यूमरों को मारने के लिए

प्रतिक्रिया करने वाले ऑक्सीजन तैयार करते हैं।

दरअसल कैंसर कोशिकाओं में मौजूद प्रोटिन के संपर्क में आने के बाद ही यह प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

इस वजह से ये गांठ अंदर से समाप्त होने लगते हैं।

कैंसर की गांठ इंफ्रा रड किरणों की विकिरण से नष्ट किये गये




चूहों पर किये गये प्रयोग के दौरान इस विधि को वहां मौजूद एक इंफ्रा रेड विकिरण की मदद से अंजाम दिया गया था।

फोटोसेंसेटाइजर को इसी इंफ्रा रेड की मदद से सक्रिय किया जा रहा था।

साथ ही नैनो पार्टिकल में वे एंटी बॉडी शामिल थे जो कैंसर मारने के लिए अंदर तक पहुंच बना रहे थे।

इस विधि से  ट्यूमरों को अंदर से समाप्त किया जा सका।

दरअसल इस गांठों के बाहर जो आवरण दवाइयों को प्रभाव को रोक देता था,

उसे ही समाप्त कर दवा को अंदर तक पहुंचा दिया गया।

इससे  गांठ अंदर से ही समाप्त होने लगे।

प्रयोग के दौरान एक साथ इन दोनों विधियों को आजमाया गया।

यह पाया गया कि नैनो पार्टिकल विधि आजमाने की वजह से इन ट्यूमरों का विकास भी रुक गया था।

साथ ही फेफड़े तक वह सारी प्रक्रिया आसानी से प्रारंभ कर दी गयी

जो शरीर के अंदर की इन कोशिकाओं को समाप्त करने लायक तत्व पैदा कर सकते थे।

प्रयोग करीब सत्तर दिनों तक चलाया गया। इस प्रयोग में अस्सी प्रतिशत चूहों को बचाया जा सका है।

दूसरी तरफ सिर्फ पीडी एल 1 विधि के इस्तेमाल से चूहों की मौत 45 दिनों में दर्ज की गयी है।

इसलिए दोनों विधियों के एकसाथ के इस्तेमाल से कैंसर को समाप्त करने में सफलता मिली है।

अब इंसानों पर इस विधि को आजमाने की तैयारी चल रही है।


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