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पुकारो मुझे फिर पुकारो गाली दो लेकिन पुकारते तो रहो




पुकारो मुझे फिर पुकारो। गाली देना है तो देते रहो लेकिन मेरे नाम की चर्चा हो रही है तो मेरी कोशिश कामयाब है। जी हां मैं पद्मश्री कंगना राणावत की बात कर रहा हूं। मैडम ने पद्मश्री पाते ही अपनी जिम्मेदारी फिर से निभायी है।




उनका कहना उनके हिसाब से सही है कि भारत को असली आजादी 2014 में तब मिली जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं। एक चर्चित शेर है बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा। यही फार्मूला है चर्चा में बने रहने का।

अब गालियां देते रहिए लेकिन नाम तो लेना पड़ेगा। जिस मकसद से यह कहा है वह तो सही साबित हो गया। पहले से ही ऐसे बयानों से चर्चा के केंद्र में रही कंगना मैडम ने फिर से खुद को सही साबित कर दिया है।

वैसे इनदिनों सोशल मीडिया में एक और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के खिलाड़ी की बातें सोशल मीडिया में वायरल हो गयी हैं।

जिसमें भाजपा के प्रवक्ता के तौर पर एक परिचर्चा में भाग लेती हुई एक युवती यह कहती है कि दरअसल यह आजादी सिर्फ 99 साल की लीज पर मिली है। धन्य हो पढ़े लिखे लोगों।

बेचारे वरुण गांधी क्या करें। मां और बेटा दोनों को तो ठिकाने लगा दिया है अमित शाह ने। अब बयान देकर ही चर्चा में बने रहना चाहते हैं तो उनका भी अंदाज है कि पुकारो मुझे फिर पुकारो।

अब पता नहीं कितने लोगों को यह हाय लगी हुई है कि वे मन ही मन सोचते रहते हैं कि कोई तो उनका नाम लेकर पुकारे। लेकिन कोई याद ही नहीं करता।

चुनाव के मौसम में नाम की चर्चा नहीं हो तो राजनीति कैसे चलेगी। इसलिए अच्छा हो या बुरा लेकिन पुकारो मुझे फिर पुकारो, भारतीय राजनीति का एक प्रचलित और सफल फार्मूला है।

भारतीय राजनीति का चर्चित और कारगर फार्मूला है

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है। इस फिल्म की खास बात यह थी कि इसमें अपनी अदाकारी से विलेन के तौर पर स्थापित हो चुके शत्रुध्न सिन्हा ने हीरो का रोल निभाया था।




फिल्म का नाम था बुनियाद। इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।

इस गीत को अपना स्वर दिया था किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
पुकारो मुझे फिर पुकारो पुकारो मुझे फिर पुकारो
मेरे दिल के आईने में ज़ुल्फ़ें आज सँवारो
पुकारो मुझे फिर पुकारो पुकारो मुझे फिर पुकारो
मेरी ज़ुल्फ़ों के साए में आज की रात गुज़ारो
पुकारो मुझे फिर …
गुलशन में ऐसी छाँव ऐसी धूप नहीं
कलियों में ऐसा रंग ऐसा रूप नहीं
जो भी मेरे यार सा फूल कोई ले के आओ बहारो
पुकारो मुझे फिर …
चाँदनी की इस अँधेरे में ज़रूरत नहीं
कुछ सोचें कुछ देखें हमको फ़ुरसत नहीं
जाओ कहीं जा के छुप जाओ आज की रात सितारो
पुकारो मुझे फिर …
अपने ख़्वाबों की जो दुनिया बसाएँगे हम
आसमानों से भी आगे निकल जाएँगे हम
साथ हमारे तुम चलना ऐ रंगीन नज़ारो

पुकारो मुझे फिर …

अब पांच राज्यों का चुनाव करीब आ रहा है और इस बार का चुनाव शायद एकतरफा नहीं हो इसी भय से खुद को चर्चा में बनाये रखने के लिए यह कारगर चाल चली जा रही है।

बस पुकारो मुझे फिर पुकारो। लगातार नाम लेकर पुकारते रहोगे तो कमसे कम राजनीति की गाड़ी तो आगे बढ़ती रहेगी। तारीफ नहीं कर सकते तो गालियां ही दे लो लेकिन पुकारो।

इसे जिस गीत की चर्चा की है, उसके हीरो यानी सतरू भइया भी इनदिनों यही रट लगाये हुए हैं। भाजपा में थे तो लगातार चर्चा में बने रहते थे।

यशवंत चचा के साथ मिलकर मोदी का विरोध करने के बाद से किनारे लग गये हैं और वह भी इस कोशिश में लगे रहते हैं कि उनके नाम की चर्चा होती रहे।

मुझे तो इस बात पर कंफ्यूजन बहुत है कि कहीं अमित शाह भी इसी बीमारी से पीड़ित तो नही हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले तक तो पार्टी में एक पत्ता भी उनकी इजाजत के बिना नहीं हिलता था।

लेकिन दीदी ने अइसा धोबिया पाट मारा है कि बोलती बंद हो गयी है। बेचारे ने किसी तरह इधर की मिट्टी और उधर का रोड़ा जोड़कर भानुमति का कुनबा बनाया था, उसके पत्थर एक एक कर खिसकते जा रहे हैं।

कभी चाणक्य कहे जाते थे और अब लोग पूछ भी नहीं रहे हैं। यह तो बहुत नाइंसाफी है। दरअसल अमित भइया से भी गलती यह हो गयी कि वह किसानों से पंगा ले बैठे और उन्हें भी धमका दिया। अब वह क्या जानें कि किसानों की ताकत क्या होती है।



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