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केबल से सीधे चांद तक संपर्क जोड़ने की तकनीक पर होने लगा विचार




  • अंतरिक्ष अभियान के प्रदूषण को कम करने की चुनौती
  • धीरे धीरे इस अभियान का खर्च भी कम होता चला जाएगा
  • अब चांद तक लगातार यात्रा के लिए नई विधि सुझा रहे हैं वैज्ञानिक
  • सौर ऊर्जा से संचालन की वजह से ऊर्जा का व्यय भी शून्य होगा
प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः केबल से सीधे चांद को जोड़ने की नई विधि अब चंद्र अभियान के लिए सुझायी गयी है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके इस्तेमाल से चांद तक पहुंचना काफी आसान हो जाएगा।

दरअसल दोनों को गुरुत्वाकर्षण के बीच की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही इस उपाय को आजमाने की बात कही गयी है।

इसके पहले जापान भी चांद तक स्वचालित सीढ़ी तैयार करने की अपनी परियोजना पर काम कर रहा है।

केबल से सीधे चांद को जोड़ने का सुझाव देने वालों का मानना है कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर

जाने के बाद यह गतिविधि अत्यंत सुगम हो जाएगी।

इससे धीरे धीरे आम लोगों को भी चांद पर भेजा जा सकेगा।

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वैसे इस विधि को आजमाने का सुझाव देने वाले यह भी मानते हैं कि प्रारंभिक दौर में इस विधि से

चांद पर जाना काफी खर्चीला होगा।

बाद में धीरे धीरे इस खर्च में कमी आती चली जाएगी।

दरअसल इन सभी विकल्पों पर विचार इसलिए भी किया जा रहा है ताकि अंतरिक्ष अभियान के खर्च में

कटौती की जा सके।

दूसरी तरफ अंतरिक्ष अभियान की वजह से अंतरिक्ष में एकत्रित होने वाला कचड़ा भी अब भावी अभियानों के लिए खतरा बनता जा रहा है।

इसलिए बिना इस किस्म के कचड़ा को एकत्रित किये सीधे केबल से चांद को पृथ्वी के साथ जोड़ने की बात हो रही है।

चांद तक इस जरिए पहुंचने की बात कहने वाले यह मान रहे हैं कि आम तौर पर हिल स्टेशनों

तथा अन्य पर्यटन केंद्रों पर भी इस तरीके से केबल के माध्यम से लोगों को ले जाने की व्यवस्था होती है।

इससे लोग पैदल चढ़ाई करने से बच जाते हैं। बहुत कम समय में वे ऊंचाई तक की लंबी दूरी तय कर लेते हैं।

अब यही तरीका चांद के लिए भी आजमाया जाना चाहिए।

केबल से सीधे चांद तक पहुंचने के तार बनाने की तकनीक है

इस विधि से चांद तक पहुंचने में जो खर्च आने वाला है, उसे कम करने की दिशा में भी कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता काम कर रहे हैं।

उनका प्रयास इस खर्च को कम कर सुलभ बनाना ही है।

वैज्ञानिक पत्रिका ऑरजिव (एआरएक्सआइवी) में इसके बारे में द स्पेसलाइन, ए प्रैक्टिकल स्पेस एलिवेटर ऑल्टरनेटिव एचिवमेंट विथ करेंट शीर्षक से इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।

इसमें खास तौर पर यह बताया गया है कि चांद की गहराई में मजबूती से केबल स्थापित करने के बाद

सिर्फ इस केबल से बंधे यात्री कक्ष को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर ले जाना ही कठिन चुनौती होगी।

एक बार इस गुरुत्वाकर्षण से बाहर चले जाने के बाद चांद तक पहुंचना आसान हो जाएगा।

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अलबत्ता अंतरिक्ष के शून्य और तापमान को नियंत्रित करने का इंतजाम इस यान कक्षा में करना होगा

लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं होगी।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक यह मानते हैं कि वर्तमान तकनीक और उपकरणों की मदद से चांद तक की दूरी तय करने वाले केबल को तैयार कर पाना संभव है।

चांद पर इसे मजबूती से स्थापित करना भी कोई कठिन काम नहीं होगा।

अलबत्ता अंतरिक्ष के अन्य दबावों को झेलने लायक बनाने के लिए इस केबल में कुछ फेरबदल करने पड़ेंगे क्योंकि पृथ्वी और अंतरिक्ष की स्थिति में काफी कुछ अंतर होता है।

लेकिन इसके तैयार हो जाने के बाद बार बार अंतरिक्ष तक जो रॉकेट भेजना पड़ता है, वह काम बंद किया जा सकेगा।

इसका फायदा यह होगा कि भावी अंतरिक्ष अभियानो को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर से ही प्रारंभ किया जा सकेगा।

इसमें काम आने वाले यान सौर ऊर्जा से संचालित होंगे




इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि चांद तक जाने वाले यान को सौर ऊर्जा से संचालित किया जा सकता है।

इससे उसे आगे बढ़ने अथवा चांद से लौटने के लिए किसी अतिरिक्त ऊर्जा संसाधन की आवश्यकता भी नहीं होगी।

अलबत्ता इस विधि के खतरों का आकलन भी वैज्ञानिकों ने किया है।

वह मानते हैं कि अंतरिक्ष में टंगे तार से वहां मंडराता कचड़ा अथवा उल्कापिंड के टुकड़े

अगर टकराये तो केबल क्षतिग्रस्त हो सकता है।

लेकिन एक के बदले कई केबल से इसे जोड़े जाने पर इस किस्म की वस्तुओं के टकराने से

कोई एक केबल क्षतिग्रस्त होगा।

जिसे बाद में सुधारा भी जा सकेगा और यात्रा में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी।


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