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सीएए और एनआरसी छोड़कर प्याज की बात हो जनादेश भी यही आया है

सीएए और एनआरसी राजनीतिक मुकाबले का शिकार हो चुका है। इनकी वजह से देश के

कई हिस्सों में फिर से आग लगी हुई है। पक्ष और विपक्ष दोनों इन्हीं दो सुरों पर अपने गीत

सुना रहे हैं। इधर आम आदमी प्याज की वजह से रो रहा है। जनता का ध्यान भटकाने का

यह तौर तरीका अब अधिक दिनों तक कारगर रह पायेगा, इसकी बहुत कम उम्मीद है।

सोशल मीडिया में कुछ खुराफाती दिमाग हमेशा ही जनता को उसके असली मुद्दों को याद

दिलाते रहते हैं। इसकी वजह से सीएए और एनआरसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अटकने

के बदले आम जनता फिर से प्याज और रोटी के सवाल पर लौट आती है। देश की आर्थिक

स्थिति कब और कैसे सुधरेगी, इस पर जब बहस होनी चाहिए तो देश के राजनीतिक दल

सीएए और एनआरसी पर उलझे हुए हैं। सत्ता पक्ष इसे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी

कार्रवाई बताने पर अड़ा हुआ है। दूसरी तरफ विपक्ष इसे संविधान के खिलाफ मानते हुए

आंदोलन पर उतारू है। कई बार यह संदेह होता है कि ऐसे मुद्दों पर एक दूसरे के खिलाफ

इनका विषवमन भी दरअसल मिली जुली चाल तो नहीं है। दरअसल देश के अंदर जनता

के मुद्दों पर से बहस को दूसरी तरफ ले जाने का इससे आसान तरीका कुछ भी नहीं है।

लेकिन कुछ वास्तविक तथ्यों पर भी सवाल उठाया जाना चाहिए। असम में इससे पहले

एनआरसी के नाम पर बहुत बवाल हुआ। इसे लागू करने वक्त भाजपा ने यह सीना

ठोंककर दावा किया था कि इसके जरिए बांग्लादेश के अवैध तरीके से घुस आये लोगों को

बाहर कर दिया जाएगा। अब एनआरसी का क्या कुछ नतीजा निकला है, उस बारे में

भाजपा के लोग बात करने से कतराते हैं।

सीएए और एनआरसी में पहले का दावा तो गलत निकला है

पहला दावा था कि असम में दो करोड़ अवैध घुसपैठियें हैं। इन्हें बांग्लादेश भेजा जाएगा।

इसकी वजह से असम की अस्मिता खतरे में पड़ गयी है। अब इस एनआरसी को दोबारा

जांच हुई तो दो करोड़ का आंकड़ा घटकर चालीस लाख पर आ गया। अंतिम सूची जब जारी

की गयी तो सिर्फ 19 लाख लोग इस एनआरसी में ऐसे पाये गये, जो अपनी भारतीयता

साबित नहीं कर पाये हैं। इन 19 लाख लोगों के बारे में जो आंकड़े सरकार ने जारी किये हैं,

उनमें से 13 लाख लोग हिंदू और शेष में से अधिकांश असम के आदिवासी हैं। इसलिए अब

भाजपा के लोगों को एनआरसी की उपलब्धियों पर बात करने में परेशानी हो रही है क्योंकि

उनलोगों ने इस हथियार का इस्तेमाल किसी और मकसद से किया था। असम में प्रचंड

जनसमर्थन की एक वजह यह भी थी। अब असम में ही एनआरसी के नाम पर सोलह सौ

करोड़ रुपये की बंदरबांट पर जांच की मांग हो रही है। इस काम को अंजाम देने वालों को

सुप्रीम कोर्ट ने अपने संरक्षण में दूसरे राज्य में भेज दिया है। लेकिन वहां भाजपा सहित

अन्य राजनीतिक दल इस एनआरसी के नाम पर हुई सरकारी धन की लूट की जांच की

मांग पर अब भी अड़े हुए हैं। इसलिए जो लोग इस सूची में छूट गये हैं, उन्हें भारतीय बनाये

रखने के लिए दूसरी चाल सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून की चली गयी है। इस

कानून में दूसरे देशों के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया

है। साफ तौर पर यह असम में एनआरसी की सूची से बाहर छूट गये लोगों को भारतीय

बनाये रखने की चाल भर है।

असम में 19 लाख लोग सूची से बाहर रहे उनका क्या होगा

लेकिन इस बात को समझ लेना होगा कि यह एक सच्चाई है कि अनेक लोग बांग्लादेश से

असम और पश्चिम बंगाल के अलावा भी अन्य भारतीय राज्यों में आ बसे हैं। इससे अनेक

इलाकों मे आबादी का संतुलन वाकई बिगड़ा है। लेकिन जिस तरीके से इस मुद्दे को हिंदू

और मुसलमान के बीच विवाद पैदा करने के लिए भड़काया जा रहा है, वह फिर से असली

मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश के अलावा कुछ और नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था की

गाड़ी जिस गड्डे में फंसी हुई नजर आ रही है, देश में रोजगार उपलब्ध कराने के लक्ष्य पर

सरकार की विफलता को सुधारने के तौर तरीकों पर कोई नहीं बोल रहा है। देश के किसानों

को फसल का समर्थन मूल्य देने की योजना पर आगे क्या कुछ प्रगति हुई है, इस पर भी

सभी ने मौन धारण कर रखा है। सभी की जुबान अभी सिर्फ सीएए और एनआरसी पर खुल

रही है। लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार की वजह से यह नशा अधिक दिनों तक कारगर

रह पायेगा, इसकी बहुत कम उम्मीद है। जाहिर है कि आने वाले दिनों में इसे भी चुनावी

हथियार बनाया जाएगा। इसी वजह से यह संदेह उत्पन्न होता है कि दरअसल यह पक्ष

और विपक्ष की कोई मिलीजुली साजिश तो नहीं है ताकि फिर से लोग प्याज और रोटी के

साथ साथ रोजगार के मुद्दे पर अपनी बात न रखने लगें।

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