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तितलियां अपने पंखों को पारदर्शी बनाती हैं

रोशनी उनके पंखों के आर पार हो जाती है

लाखों वर्षों से यह गुण उनके पास मौजूद है

पंखों के अति सुक्ष्म कोषों में होता है बदलाव

इंसान यह तकनीक हासिल करने को प्रयासरत

राष्ट्रीय खबर

रांचीः तितलियां अपने पंखों को कुछ इस तरीके से पारदर्शी बनाती हैं कि वे अन्य

हमलावरों की नजरों से छिपी रह सके। कई अन्य प्राणियों में भी रंग बदलने और खुद को

हमलावर से छिपाने के गुण विद्यमान है। खास तौर पर समुद्री की मछलियों और

ऑक्टोपस का यह गुण सर्वविदित है। इसी तकनीक के आधार पर वैज्ञानिक काफी अरसे

से स्टील्थ विमान (दुश्मन की आंखों से ओझल रहने वाला विमान) बनाने की तकनीक

विकसित कर रहे हैं। पहली बार इस बात पर अनुसंधान हुआ है कि आखिर तितलियां

अपने पंखों को पारदर्शी बनाकर किसी भी नजर को धोखा कैसे देती हैं। इसी शोध का

निष्कर्ष है कि आज के दौर में इंसान जिस विधि को हासिल करने की कोशिश कर रहा है,

वह विधि प्रकृति ने कई प्राणियों को पहले से ही दे रखी है। शोध दल का मानना है कि खुद

को अदृश्य रखने अथवा पारदर्शी बनाने की तकनीक उनके पास लाखों वर्षों से मौजूद है।

तितलियां जब अपने पंखों को पूरी तरह पारदर्शी बना लेती हैं तो वे किसी भी हमलावर की

नजरों से लगभग ओझल हो जाती है। आम तौर पर ऐसी तितलियां इंसान की नजरों को

भी कई बार धोखा दे जाती हैं। इसके कारण को समझने के लिए मेरिन बॉयोलॉजिकल

लैबरोटरी (एमबीएल) ने एक शोध किया है। इसमें खास तौर पर उनव तितलियां परख के

दायरे में आयी हैं, जिनके पंख पूरी तरह से पारदर्शी होते हैं। इस क्रम में मुख्य तौर पर शीशे

की तरह पंख रखने वाली तितलियां जांची गयी हैं। इस पारदर्शी पंख की वजह से उनकी

शारीरिक संरचना की सुक्ष्म जांच की गयी है ताकि यह पता चल सके कि ऐसा होता कैसे

है। रंग बिरंगे पंख वाली तितलियां पूरी तरह पारदर्शी पंख कैसे बना लेती हैं, यह सवाल

वैज्ञानिकों के लिए अचरज का विषय रहा है।

तितलियां ऐसा कैसे कर पाती है इसका शोध हुआ

गहन शोध में यह पाया गया है कि दरअसल पंखों में मौजूद अति सुक्ष्म सेलों में होने वाले

बदलाव की वजह से ऐसा होता है। रंग बिरंगे पंखों से रोशनी का छिटकना ही उन्हें आकर्षक

बनाती है। इस अवस्था से पूरी तरह पारदर्शी पंख का बन जाना अजीब स्थिति है। इस बारे

में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (बर्कले) के शोध कर्ता आरोन पोमेरांट्ज कहते हैं कि यह

सवाल सुनने में जितना आसान लगता है, उसकी प्रक्रिया उतनी ही जटिल है। इस शोध में

एमबीएल के निदेशक निपम पटेल भी सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं। यह पाया गया है कि यह

बदलाव अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव है। प्रकाश तंरगों के विभिन्न रंगों से टकराने की

वजह से ही हम तितलियों को रंग बिरंगे देख पाते हैं। दरअसल उसके पंख के अलग अलग

हिस्से से अलग अलग तरंग का परावर्तन होता है। लेकिन जब यह परावर्तन समाप्त हो

जाता है तो यह तितलियां पारदर्शी पंख वाली बन जाती हैं। रंगों का यह खेल उनके पंखों

पर बने अति सुक्ष्म कोषों की वजह से होता है। इसमें होने वाले बदलाव को समझने के

लिए कई पारदर्शी तितलियां जांच में शामिल की गयी थी। अत्याधुनिक यंत्रों और

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी की विधि से इनलोगों ने पाया कि जहां जहां यह सुक्ष्म सेल अपनी

तरंग की स्थिति को बदलकर कम करते चले जाते हैं, वहां का इलाका पारदर्शी हो जाता है।

जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो तितलियां पूरी तरह से पारदर्शी पंखों वाली बन जाती

है। इस बदलाव की वजह से जब रोशनी ऐसे पंख पर पड़ती है तो वह लौटती नहीं है और

इसी गुण की वजह से ऐसे तितलियां पारदर्शी पंखों वाली बन जाती है। रोशनी इन पंखों के

आर पार हो जाती हैं।

रोशनी को आर पार करने की क्षमता अति सुक्ष्म सेलों में

पटेल कहते हैं कि हम इंसान अब एंटी ग्लेयर कोटिंग लगातर शीशे में बदलाव को बड़ी

उपलब्धि मानते हैं जबकि यह गुण तितलियों के पास लाखों वर्ष पहले से मौजूद है। जांच

में पाया गया है कि पंख के दूसरे स्तर पर मोमयुक्त हाइड्रोकॉर्बन की एख परत होती है।

इसी वजह से वह पारदर्शी गुण पैदा कर पाता है। ऊपर की परत रोशनी की मात्रा को कम

करने में मदद करती है जबकि दूसरी परत उसे इस इलाके से आगे बढ़ा देती है। इसी वजह

से रोशनी उसके पंख के आर पार हो जाती है। प्राकृतिक तौर पर पारदर्शी होने का यह गुण

जमीन के प्राणियों में बहुत कम है। वैसे भी कई प्राणी मसलन गिरगिट भी खुद को छिपाने

अथवा हमलावर को डराने के लिए इसी विधि से अपना रंग बदल लेते हैं। पूरी तरह

पारदर्शी होने वाली तितलियां इसकी सबसे विकसित उदाहरण हैं।

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