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वैश्य समाज की नाराजगी से उलझे नजर आ रहे समीकरण

  • दीपक भुवनिया को उतारने की कोशिश

  • बाजार में हुई है समाज के लोगों की बैठक

  • समाज के कई लोग टिकट के लिए प्रयासरत

  • अलग प्रत्याशी खड़ा हुआ तो बिगड़ेंगे सारे समीकरण

ब्यूरो प्रमुख

भागलपुरः वैश्य समाज इस बार के विधानसभा चुनाव में सारे समीकरणों का उलटफेर कर

सकता है। दरअसल इस समाज के किसी व्यक्ति को टिकट नहीं दिये जाने की वजह से

ऐसी परिस्थिति बनी है।

देखे इस विषय की वीडियो रिपोर्ट

अंदरखाने से मिल रही सूचनाओं के मुताबिक वैश्य समाज और भागलपुर के व्यापारियों ने

इस मुद्दे पर एक बैठक की है। इस बैठक में भागलपुर पूर्व से दीपक कुमार भुवानिया को

निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़ा करने का लोगों ने मन बनाया है। इस बैठक में इस बात

पर भी चर्चा हुई है कि सभी दलों ने वैश्व समाज को ठगा है। ऐसे में समाज में अच्छी खासी

जनसंख्या होने के बाद भी उनके किसी भी प्रतिनिधि को टिकट नहीं दिये जाने का

प्रतिकार किया जाना चाहिए। मिली सूचनाओं के मुताबिक व्यापारियों की यह बैठक

बाजार में हुई है। जिनके नाम पर सहमति बनी है वह भागलपुर के पूर्व महापौर हैं। वैसे

सूत्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि खुद श्री भुवानिया ने अभी इस पर अपनी सहमति नहीं दी है।

इस बीच देर रात खुद श्री भुवानिया ने अपने सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव लड़ने का औपचारिक एलान कर दिया है। उन्होंने अपनी सूचना में यह बताया है कि वह जदयू में हैं और पार्टी के साथ बने रहेंगे। लेकिन इस बार माटी का कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी बनने का फैसला कर दिया है। 

वैश्य समाज का एक फैसला राजनीति बदल देगा

वैश्य समाज के इस फैसले से राजनीतिक दलों के लिए परेशानी की स्थिति आ सकती है।

यहां का व्यापारी वर्ग मतदाताओं के लिहाज से प्रभावशाली स्थिति में हैं। दूसरी तरफ

व्यापारिक गतिविधियों की वजह से वे अधिकाधिक लोगों के दैनिक संपर्क में भी होते हैं।

ऐसे में अगर वाकई वैश्व समाज का वोट किसी दूसरी तरफ चला गया तो अन्य दलों के

बीच वोटों का अंतर इतना कम हो जाएगा कि सारे पूर्व समीकरण बिगड़ सकते हैं। इस

गोपनीय बैठक में भाजपा, जदयू और कांग्रेस सहित अन्य दलों की तरफ से व्यापारियों को

नजरअंदाज किये जाने पर नाराजगी जतायी गयी है। दरअसल यह नाराजगी भी इसलिए

है क्योंकि इस वैश्य समाज के कई लोग लगातार अपने अपने राजनीतिक दलों से टिकट

के लिए प्रयासरत थे। अंततः दलों ने उन्हें टिकट नहीं दिया है। उसके बाद से यह वैकल्पिक

राजनीति जन्म ले चुकी है।

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