बकोरिया कांड से गरमायेगी झारखंड की व्यूरोक्रेसी की राजनीति

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  • डीके पांडेय और अनुराग गुप्ता फिर से निशाने पर

  • आइएएस अधिकारियों की भी रूचि बढ़ी

  • कई अधिकारी बोलने से बच रहे हैं

  • कनीय अधिकारियों को नौकरी का खतरा

संवाददाता

रांची: बकोरिया कांड पर उच्च न्यायालय का निर्देश राज्य की अफसरशाही पर असर डालने वाला है।

इससे साफ हो गया है कि सीबीआइ की जांच में वे सारे तथ्य सामने आयेंगे, जिसे छिपाने और गलत बताने का झारखंड पुलिस ने भरसक प्रयास किया है।

जाहिर है कि इस आग में अगर किसी के हाथ जलेंगे तो वह राज्य के डीजीपी डीके पांडेय ही हैं।

उनके साथ इस मामले में अनुराग गुप्ता भी लपेटे में आ सकते हैं

क्योंकि इन्हीं दो लोगों से राज्य के दो अन्य एडीजी रैंक के अधिकारियों क्रमश: रेजी डुंगडुंग और एमवी राव का सीधा विवाद हुआ था।

सूत्रों की मानें तो एमवी राव इन दोनों पर भारी पड़ गये थे।

जिसकी वजह से सीआरपी के पूर्व डीजी विजय कुमार के दरवाजे तक पैरवी के बाद मामला श्री राव के तबादल से सुलझ पाया था।

औपचारिक तौर पर इस बारे में पुलिस अथवा प्रशासनिक महकमा मुंह खोलने से बच रहा है।

लेकिन समझा जा रहा है कि अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री के चहेते

इन दो अधिकारियों पर मंडराते संकट से अंदर ही अंदर प्रसन्न है।

समझा जाता है कि सीबीआइ को जांच में इन अधिकारियों की भी परोक्ष मदद का पूरा फायदा होने वाला है।

बकोरिया के पीछे पीछे लटका है दिग्दर्शन सरेंडर का भी मामला

बकोरिया कांड की गाड़ी आगे बढ़ने के बाद अब दिग्दर्शन मामले की तरफ भी लोग टकटकी लगाकर देखने लगे हैं।

फर्जी नक्सलियों के सरेंडर के नाम पर इस मामले में भी करोड़ों रुपयों की बंदरबांट होने का आरोप है।

कई स्तरों पर जांच की अनुशंसा होने के बाद भी मुख्यमंत्री की वजह से जांच की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पायी है।

लिहाजा यह माना जा रहा है कि अब मामला आगे बढ़ाने के लिए लोग उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।

दोनों ही मामलों के अलावा राज्यसभा चुनाव का मामला पहले से ही सरकार के गले में हड्डी बनी हुई है।

इस मामले में प्राथमिकी दर्ज तो कर लिया गया है लेकिन पूर्व विधायक योगेंद्र साव द्वारा लगाये गये

आरोपों की वजह से जांच की गाड़ी सही दिशा में नहीं बढ़ पा रही है।

जांच से जुड़े कनीय अधिकारी भी इसे गरम मामला मानते हैं।

उन्हें इस बात का एहसास है कि फाइल में अपने आप को फंसाने का खतरा उनकी नौकरी पर भी आफत ला सकता है।

लिहाजा अब पुलिस और प्रशासन में शह और मात की खेल रोचक दौर तक पहुंच चुका है।

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