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बुंदेलखंड के गांव जखनी का कायाकल्प हो गया निजी प्रयास से

  • पानी की कमी की वजह से पलायन ही नियति थी इस क्षेत्र की

  • हर खेत पर मेढ़ और हर मेढ़ पर पेड़ से बदली तस्वीर

  • सर्वोदयी कार्यकर्ता उमाशंकर पांडे ने की थी पहल

  • पहले इस गांव में कुछ भी सुविधां नहीं होती थी

  • आज देश का जलग्राम के तौर पर ख्यातिप्राप्त है

झांसीः बुंदेलखंड के गांव जखनी की तस्वीर आज बदल चुकी है। वरना बुंदेलखंड का नाम

आते ही आंखों के सामने सूखे से बदहाल इलाके की तस्वीर अनायास ही आ जाती है। आज

से 34 साल पहले चित्रकूट मंडल में बांदा जिले का जखनी गांव भी अपनी बदहाली पर खून

के आंसू रो रहा था लेकिन इसी गांव के निवासी सर्वोदयी कार्यकर्ता उमाशंकर पांडे ने

ग्रामीणों को प्रेरित कर ऐसी पहल की कि बिना किसी सरकारी मदद के जखनी न केवल

पानीदार बना बल्कि यह बुंदेलखंड के अन्य इलाकों और देश के दूसरे सूखाग्रस्त क्षेत्रों के

लिए भी आशा की किरण के रूप में उभरा। उन्होंने बताया कि गांव की बदहाली से त्रस्त

मेरी माताजी ने मुझे अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करने को प्रेरित किया। अपनी मां और

भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोवा भावे से मिली सर्वोदयी सोच को मूर्तरूप देने के

लिए मैंने हमउम्र लोगों को प्रेरित करना शुरू किया। उस समय अधिकतर लोग गांव से

पलायन कर चुके थे लेकिन रघुराई सिंह, निर्भय सिंह, अशोक अवस्थी, अली मोहम्मद,

राजा भैया वर्मा, शिवबरण राजपूत,मंगल सिंह, रजा मोहम्मद और लखन पांडे के साथ

तत्कालीन ग्रामप्रधान रक्षपाल सिंह और इनके बाद रहमान तथा रज्जू खॉ आदि ने मुझे

जबरदस्त समर्थन दिया। इसी बीच पक्षाघात के कारण उनके शरीर के दाहिने हिस्से में

गंभीर खामियां पैदा हो गयी लेकिन साथियों और लोगों से मिली हिम्मत के बल पर गांव

में सड़क बनाने का काम शुरू किया और सबके सम्मिलित प्रयास से गांव में सड़क बनकर

तैयार हुई। काफी कुछ कर लेने के बाद गांव के पुनरोद्धार में लगे हर व्यक्ति को समझ आ

गया कि गांव को पानीदार बनाये बिना समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

बुंदेलखंड के गांव को देखकर अब जलसंकट का पता नहीं चलता

उन्होंने बताया कि बिना किसी आधुनिक यंत्र या विधि के मात्र परंपरागत जलसंरक्षण के

तरीके ‘‘ हर खेत पर मेढ़ और हर मेढ़ पर पेड़’’ के सिद्धांत पर हमने काम किया। बस फिर

क्या था सभी गांव वाले फावड़ा कुदाल लेकर खेत में मेढ़बंदी के काम में जुट गये। मेढ पर

पेड़ लगाये गये । खेतों से नालियां बनायी और अतिरिक्त पानी के संचय के लिए तालाब

खोदे । मेढ़ पर लगे पेड़ वर्षाकाल में मानों बादलों को बरसात के लिए खींचते करते थे और

जब बारिश होती तो खेतों में गिरने वाले पानी को यूं ही बह जाने से पेड़ रोकते और खेत की

प्यास बुझने के बाद अतिरिक्त पानी तालाबों में जाता। इस तरह न केवल वर्षाकाल में

जलसंचय हुआ बल्कि सूखे महीनों में खेती के लिए पर्याप्त जल की व्यवस्था भी हो गयी।

ऐसे जलसंचय से जखनी के आसपास के इलाकों में भी जलस्तर ऊपर आने लगा। जिन

कुंओं में पानी 100 फुट नीचे चला गया था उनमें मई जून की भीषण गर्मी में पानी दस से

पंद्रह फुट पर आ गया और जो हैंडपंप सूख गये थे उनमें फिर से जलधारा बहने लगी। अब

गांव में जबरदस्त किसानी शुरू हो गयी और जो गांव भूख प्यास से त्रस्त था उसी गांव से

बुंदेलखंड में सबसे पहले बासमती की खेती 2006 में शुरू की गयी और आज 25 हजार

कुंतल बासमती केवल जखनी के किसान पैदा कर रहे हैं जबकि सूखे बुंदेलखंड के अन्य

जिलों में लगभग 14 लाख कुंतल बासमती पैदा किया जा रहा है।


 

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