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ब्रिटिश वैक्सिन में मुनाफे की कोई सोच शामिल नहीं

  • वैक्सिन का अगला परीक्षण 15 जून से होगा

  • गरीबों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने की कोशिश

  • पहले तीन सौ फिर छह हजार पर इसकी जांच होगी

  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दरकिनार करने की रणनीति बनायी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः ब्रिटिश वैक्सिन किसी लाभ के लिए तैयार नहीं की जा रही है। इसे स्पष्ट करते

हुए ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि इसी वजह से दवा की बहुराष्ट्रीय और बड़ी

कंपनियों को दरकिनार कर दूसरे विकल्पों के माध्यम से इस वैक्सिन को दुनिया भर में

उपलब्ध कराने की तैयारियों पर काम चल रहा है। इस रणनीति में स्पष्ट सोच यही है कि

यह मुनाफा कमाने का काम नहीं है। इसी वजह से वैक्सिन के वृहद पैमाने पर उत्पादन के

लिए भी बड़ी कंपनियों को दरकिनार किया गया है। ब्रिटिश अनुसंधान केंद्र अन्य छोटे

संस्थानों के साथ ताल मेल बैठाकर इस वैक्सिन को बहुत कम समय में पूरी दुनिया तक

पहुंचाना चाहते हैं। इसके बारे में भी स्पष्ट किया गया है कि बहुत कम लागत पर इसे

लोगों तक उपलब्ध कराया जाए। इससे करोडों लोगों की जान बचाने में कामयाबी मिलेगी।

दवा के कारोबार में अधिक मुनाफा की सोच हावी होने की वजह से ही यूके के वैज्ञानिकों ने

इस विकल्प पर काम करना प्रारंभ किया है। इस अनुसंधान के कई चरण पूरे हो चुके हंक

और वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस वैक्सिन के सफल होने के तुरंत बाद बहुत ही कम

लागत पर इसे पूरी दुनिया में उपलब्ध कराया जा सकेगा।

ब्रिटिश वैक्सिन किसी मुनाफे का कारोबार नहीं करेगी

इंपीरियल कॉलेज लंदन ने वर्तमान दवा कारोबार की मुनाफे की सोच को बदलने के लिए

यह पहल कर दी है। उसके लोग दुनिया भर में उन तमाम संस्थानों से सीधे संपर्क कर

सकते हैं जो इस वैक्सिन को बनाने की क्षमता रखते हैं। इसके जरिए दुनिया के हर हिस्से

में वैक्सिन के उत्पादन को बढ़ावा देने का प्रयास प्रारंभ किया है। इस रणनीति के तहत हर

हिस्से तक वैक्सिन पहुंचाने की परिवहन लागत भी बहुत कम होगी तथा उन्हें पहुंचाने में

समय भी बहुत कम लगेगा। इसे सिर्फ और सिर्फ दुनिया के गरीब देशों की स्थिति को

ध्यान में रखते हुए अपनाया जा रहा है ताकि आर्थिक संकट के इस वैश्विक दौर में गरीब

देशों और उनके लोगों को इस कोरोना की वजह से नई किस्म की आर्थिक परेशानियो का

सामना नहीं करना पड़े।

इस शोध से जुड़े दल के प्रमुख वैज्ञानिक रॉबिन शैट्टोक ने कहा कि मकसद सिर्फ सस्ती

वैक्सिन बनाना है। उन्हें इस बात की भी उम्मीद है कि वैक्सिन का प्रयोग सफल होने की

स्थिति में अनेक दानदाता भी खुलकर सामने आयेंगे। वैसी स्थिति में वैक्सिन की लागत

को शायद और भी कम किया जा सकेगा ताकि हर व्यक्ति की जेब के हिसाब से यह दवा

दुनिया के हर कोने में उपलब्ध हो सके। उन्होंने कहा कि यूं भी किसी दवा को तैयार करने

के पीछे होने वाले अनुसंधान और अन्य लागत की वजह से दवा महंगी हो जाती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इसमें बहुत अधिक मुनाफा भी जुड़ जाता है। इससे दवा की

कीमत कुछ ऐसी हो जाती है, जो आम आदमी के लिए बहुत बड़ा बोझ बन जाता है।

लिहाजा इस संकट से मुक्ति दिलाने का सबसे सरल मार्ग है कि दवा की कीमत को ही कम

रखा जाए।

वैक्सिन की कीमत को यथासंभव कम रखने की पूरी कोशिश

इस वैक्सिन का क्लीनिकल ट्रायल इसी माह प्रारंभ होने जा रहा है। यदि वह सफल रहा तो

अगले वर्ष के प्रारंभ से ही वैक्सिन का उत्पादन पूरी दुनिया में एक साथ प्रारंभ हो जाएगा।

वैसी स्थिति भी दुनिया के किसी भी महाद्वीप के किसी भी देश को यह वैक्सिन पाने के

लिए लाइन में नहीं लगना पड़ेगा, हर देश को अपने ही महाद्वीप में स्थापित किसी अच्छे

वैक्सिन उत्पादन केंद्र से ही यह दवा उपलब्ध होगी और यह लागत में बहुत ही सस्ती

होगी। वैज्ञानिक अनुसंधानों पर खर्च करने वाले कई प्रतिष्ठान अभी से ही इस प्रयास से

जुड़े चुके हैं।

इस ब्रिटिश वैक्सिन के क्लीनिकल ट्रायल के लिए ब्रिटेन में तीन सौ स्वयंसेवक तैयार बैठे

है। दवा का क्लीनिकल ट्रायल का दूसरा दौर 15 जून से प्रारंभ होने जा रहा है। अगर यह

दवा इस चरण में भी कारगर रहती है तो छह हजार लोगों के बीच इसका अलग परीक्षण

किया जाएगा। इस बड़े क्लीनिकल ट्रायल को अक्टूबर माह में करना निर्धारित किया गया

है। हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर है कि उस दौर तक पूरी दुनिया में कोरोना का क्या

कुछ प्रभाव रहता है।

जिस विधि से यह वैक्सिन बनायी जा रही है, उसमें खास तौर पर तैयार जेनेटिक पदार्थ

आरएनए शरीर को यह निर्देशित करता है कि वह कोरोना वायरस के आवरण के तौर पर

पाये जाने वाले स्पाइक प्रोटिन तैयार करे। यह प्रोटिन ही कोरोना के साथ आने वाले प्रोटिन

को मारने के लिए शरीर के अंदर प्रतिरोधक तैयार करेगा। इसी पद्धति पर दुनिया के कई

अन्य प्रतिष्ठान भी वैक्सिन अनुसंधान के काम में जुटे हुए हैं।


 

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