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मंगल ग्रह में सांस लेने लायक ऑक्सीजन का प्रयोग सफल

  • नासा के प्रिसरवेंस रोवर की तकनीक वहां सफल साबित

  • कॉर्बन डॉईऑक्साइज के इलाके में बड़ी उपलब्धि

  • भावी अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी बड़ी बात

  • नौ बार अलग अलग परीक्षण किया जाएगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मंगल ग्रह में सांस लेने लायक ऑक्सीजन पैदा करना अपने आप में एक बहुत बड़ी

उपलब्धि है। अंतरिक्ष विज्ञान में इसे एक बहुत बड़ा कदम माना जा रहा है। खास कर

मंगल ग्रह के माहौल में, जहां 96 प्रतिशत कॉर्बन डॉईऑक्साइड है, में ऐसा कर पाना किसी

चमत्कार से कम नहीं है। वहां नासा का हेलीकॉप्टर अपना चक्कर लगा रहा है। इसके बीच

ही सोने के रंग का एक टोस्टर के जैसा यंत्र वहां ऑक्सीजन पैदा करने के प्रयोग को

सफलतापूर्वक अंजाम दे रहा है। वैसे भी ऑक्सीजन का मसला खास तौर पर भारत के

लिए अभी अत्यधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। कोरोना की दूसरी लहर के बीच सभी

स्तरों पर ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच यह राजनीतिक उठापटक तक का विषय बन

गया है। खैर अंतरिक्ष विज्ञान की बात करें तो इस एक काम को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि

के तौर पर देखा जा रहा है। इस काम के लिए वहां एक खास यंत्र तैयार कर भेजा गया था।

इसे वैज्ञानिकों ने मॉक्सी का नाम दिया है। इसी छोटे से यंत्र ने वहां के माहौल में व्याप्त

कॉर्बन डॉईऑक्साइड के कणों को तोड़कर ऑक्सीजन पैदा करने का प्रयोग सफल कर

दिखाया है। वहां प्रयोग होने के बाद नियंत्रण कक्ष तक जब इसके आंकड़े प्राप्त हुए तो उन

आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि यंत्र का प्रयोग वाकई सफल रहा

है और घने कॉर्बन डॉईऑक्साइड के वातावरण से यह यंत्र ऑक्सीजन पैदा कर पाने में

कामयाब हुआ है। अंतरिक्ष अभियानों में हर बार सांस लेने लायक ऑक्सीजन की कमी भी

एक चिंता का विषय हुआ करता है।

मंगल ग्रह में सांस लेने लायक ऑक्सीजन बनाना बहुत बड़ी बात

अंतरिक्ष में पृथ्वी के जैसा सांस लेने लायक ऑक्सीजन की मौजूदगी बहुत कम है और अब

तक किसी दूसरे ऐसे नजदीकी इलाके की पहचान भी नहीं हो पायी है, जहां का वातावरण

पृथ्वी के जैसा ही हो। यानी जहां पृथ्वी के जैसा ही जीवन का विकास सिर्फ इस वजह से हो

सके क्योंकि वहां सांस लेने लायक ऑक्सीजन मौजूद है। नासा के प्रिजरवेंस रोवर में लगा

यह यंत्र ऑक्सीजन के अणुओँ को हासिल करने में सफल हुआ है। इस बारे में नासा के

स्पेस टेक्नोलॉजी मिशन निदेशालय के सहायक प्रशासक जिम रॉयटर ने कहा कि भावी

अंतरिक्ष अभियानों के लिहाज से यह बहुत बड़ा कदम है। इस यंत्र यानी मॉक्सी के जिम्मे

दूसरे महत्वपूर्ण काम भी है। लेकिन इस एक प्रयोग से यह कहा जा सकता है कि भविष्य

में एक दिन हम मंगल ग्रह पर इंसानों को देख पायेंगे क्योंकि वहां इंसानों को सांस लेने

लायक ऑक्सीजन मिल जाएगा। इसके अलावा इस ऑक्सीजन के अंतरिक्ष में उपलब्ध

होने का दूसरा फायदा भावी अंतरिक्ष अभियानों को ईंधन मिलना भी होगा। मॉक्सी के

प्रयोग के बारे में बताया गया है कि उस यंत्र ने पांच ग्राम ऑक्सीजन को दस मिनट सांस

लेने लायक ऑक्सीजन में तब्दील कर दिया है। यह यंत्र प्रति घंटे दस ग्राम ऑक्सीजन

तैयार करने के लिए डिजाइन किया गया है।

सफल तकनीक से उत्पादन बढ़ाया जा सकेगा

भले ही यह बहुत अल्प मात्रा का ऑक्सीजन उत्पादन हो लेकिन प्रयोग से यह भी तय हो

गया है कि इसी तकनीक के आधार पर भविष्य में कई टन ऑक्सीजन भी आसानी से ऐसे

माहौल में पैदा किये जा सकेंगे। इससे जीवन की नई नींव भी पड़ सकती है। नासा की

योजना के मुताबिक इस मॉक्सी से अभी नौ बार और ऑक्सीजन पैदा करने का प्रयोग

कराया जाएगा। अपने दो साल की यात्रा के दौरान यह रोवर अन्य काम भी करेंगे और

नियंत्रण कक्ष को आंकड़े भेजेगा। इस यंत्र के मुख्य निदेशक मिशेल हेच्ट ने कहा कि वे

अलग अलग माहौल में इसका अलग अलग परीक्षण करेंगे ताकि किस माहौल में मॉक्सी

क्या काम कर पाता है, उसकी भी जांच हो जाएगी। जैसे जैसे नये प्रयोग के आंकड़े मिलते

जाएंगे मॉक्सी की संरचना में भविष्य में क्या कुछ सुधार किया जा सकता है, वह भी

स्पष्ट होता चला जाएगा।

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2 Comments

  1. […] मंगल ग्रह में सांस लेने लायक ऑक्सीजन क… नासा के प्रिसरवेंस रोवर की तकनीक वहां सफल साबित कॉर्बन डॉईऑक्साइज के इलाके में बड़ी उपलब्धि भावी … […]

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