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दिमाग भी वैज्ञानिकों के दिमाग को अशांत रखता है

  • शिकागो विश्वविद्यालय में किया गया प्रयोग

  • दिमाग की बीमारियों को दूर करने की कोशिश

  • कृत्रिम न्यूरॉन बनाने का पहला कदम सफल हुआ

  • कंप्यूटर की मदद से दिमाग को पढ़ने की कवायद

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दिमाग खुद अपने आप में काफी लंबे समय से वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए

एक बहुत बड़ी पहेली बना हुआ है। कंप्यूटर के जगत में लगातार हो रही तरक्की के बीच

आज तक हम दिमाग को सही तरीके से पढ़ने की कोई तकनीक ईजाद नहीं कर पाये हैं।

वैज्ञानिक मानते हैं कि इसकी जटिल संरचना और गतिविधियों को समझ पाने में अभी

बहुत वक्त लगना शेष है। इसी वजह से अब कंप्यूटर तकनीक का प्रयोग कर इसी गुत्थी

को सुलझाने की पहली कोशिश कामयाब हुई है। दरअसल दिमाग के अंदर किस तरीके से

यह पूरी जैविक प्रक्रिया काम करती है, उसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों के दिमाग

को पढ़ने का काम किया है। इस पूरे अनुसंधान का मकसद दो आयामी है। पहले तो इसकी

मदद से दिमाग की बीमारियों को ठीक करने की विधि को विकसित करना है। दूसरी तरफ

इससे दिमाग के अंदर होने वाली हलचल से शरीर के अंदर जेनेटिक तौर पर क्या कुछ

बदलाव होते रहते हैं, उसे भी समझना है। दिमागी बीमारी से पीड़ित अनेक लोगों को इस

प्रयोग की सफलता से अंततः लाभ हो सकता है। हम पहले से ही इन बातों को जानते हैं कि

दिमाग अपने आप में एक जटिल कंप्यूटर की तरह काम करता है। इसके तहत दिमाग में

रासायनिक और वैज्ञानिक संकेत जारी होते हैं, जिसके आधार पर पूरा शरीर सक्रिय होता

है। इसके तहत कई किस्म के जेनेटिक संकेत भी जारी होते हैं और उन्हीं संकेतों के आधार

पर शरीर के भीतर सुक्ष्म प्रोटिन संरचना की स्थितियों में भी बदलाव होता रहता है। चूहों

पर हुए प्रयोग से वैज्ञानिक इसके एक हिस्से को समझना चाहते थे।

दिमाग की नकल कर कई समस्या सुलझाना आसान होगा

शब्दों में कहें तो दिमाग की नकल करते हुए उसके एक हिस्से को पढ़ना ही इस शोध

का मुख्य विषय था। मॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग से जुड़े शोधकर्ताओँ के लिए यह काफी

पुरानी सवाल है, जो आज तक पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। दरअसल किसी सोच के साथ

साथ दिमाग के अंदर से जारी होने वाले विद्युतीय संकतों को भी समझना इस शोध का

एक हिस्सा था। इसी की बदौलत शरीर की सक्रियता बनी रहती है और कोई भी प्राणी

अपने दिमाग से प्राप्त होने वाले संकेतों के आधार पर ही आचरण करता है। यूनिवर्सिटी

ऑफ शिकागो के प्रिट्जर स्कूल ऑफ मॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग के वैज्ञानिकों ने इसके

लिए चूहों पर शोध किया है।

अनुसंधान के तहत चूहों से मिलने वाले संकेतों और सूचनाओं के आधार पर कई किस्म के

धातुओं के ऑक्साइड पर भी प्रयोग किये गये हैं। यह पाया गया है कि इन अलग अलग

किस्म के धातुओं के ऑक्साइड पर इलेक्ट्रानिक प्रभाव भी अलग अलग पड़ता है, जो

दरअसल दिमाग की आंतरिक संरचना के जैसा ही है। दिमाग के अंदर भी दिखने में एक

जैसा होने के बाद भी अति सुक्ष्म हिस्सों में काफी अंतर होता है। किसी भी संकेत के आधार

पर दिमाग के यह अलग अलग हिस्से अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। इन्हीं

प्रतिक्रियाओं की बदौलत जारी होने वाले संकेतों के आधार पर शरीर भी हरकत करता है।

क्वांटम भौतिकी के सिद्धांत पर बहुत फायदा होगा

इस शोध के बारे में वहां के प्रोफसर गियुलिया गैली ने कहा कि इसकी बदौलत क्वांटम

मैकानिकल गणनाओँ में भी भविष्य में मदद मिलेगी। यह बात समझ में आ रही है कि

अति सुक्ष्म परमाणुओँ के स्तर पर किस तरीके से प्रतिक्रियाएं होती हैं। यह पाया गया है

कि अलग अलग किस्म के धातुओं की ऑक्साइड की परत पर खास किस्म के बिजली को

आगे बढ़ने की इजाजत नहीं होती जबकि किसी खास किस्म का तरंग उसमें से आगे बढ़

सकता है। यह लगभग दिमाग जैसी ही स्थिति है। जिसमें एक हिस्से के बहुत छोटे छोटे

हिस्से अलग अलग तरीके से काम करते हैं। वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे है कि यह सारी

भिन्नता ऊर्जा की अलग अलग मात्रा पर निर्भर होती है। इंसान अथवा किसी अन्य प्राणी

के दिमाग के अंदर भी कुछ ऐसा ही होता रहता है। अब इस प्रारंभिक प्रयोग के सफल होने

के बाद वैज्ञानिक दिमाग के लिए अन्य किस्म का कृत्रिम न्यूरॉन बनाने की संभावनाओं

का पता लगा रहे हैं। इनके बन जाने से किसी भी इंसान के दिमाग को इन कृत्रिम न्यूरॉनों

की मदद से संचालित किया जा सकेगा। इससे कई किस्म की दिमागी बीमारियों को खत्म

किया जा सकेगा अथवा उनपर नियंत्रण पाना संभव होगा


 

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