देश को फिर से फालतू की बहस में उलझाने की चाल

देश को फिर से फालतू की बहस में उलझाने की चाल

देश में फिर से एक गैरजरूरी बहस को जन्म देने की साजिश रची जा रही है।



इस बार बहस के केंद्र में नवजोत सिंह सिद्धू के दो बयान है।

पहला पाकिस्तान के सेना प्रमुख को लेकर है तथा दूसरा दक्षिण भारत के मुद्दे पर है।

भाजपा की तरफ से इन दोनों बयानों पर लगातार आलोचना की बाढ़ आयी हुई है।

लेकिन यह दोनों ही बयान देश की मूल समस्याओं से कहीं भी जुड़े हुए नहीं हैं।

इससे ज्यादा गंभीर गुजरात की स्थिति है, जिसपर खुलकर बोलने का साहस दोनों ही राष्ट्रीय दलों में शायद कम है।

गुजरात से उत्तर भारत खासकर हिंदीभाषी क्षेत्र के लोगों पर हो रहे हमलों पर

अब तक कोई राष्ट्रीय बयान नहीं आया है।

वहां की हिंसा के बारे में लगातार जो सूचनाएं बाहर आ रही हैं,

उसमें साफ साफ नजर आ रहा है कि

इस नफरत की आग को और धधकाने में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही समान रुप से जिम्मेदार है।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गुजरात की स्थिति पर सफाई देते हुए वहां ऐसा कुछ भी नहीं होने की बात कह चुके हैं।

दरअसल पहले भी चुनाव करीब आने के साथ साथ हर बार गैर जरूरी मुद्दों पर देश को भटकाने की चालें चली जाती रही हैं।

देश के असली सवालों से कन्नी काटने की यह घिसी पिटी चाल है

इस बार की स्थिति कुछ और इसलिए है कि जनता बार बार अपने मूल सवालों का उत्तर पूछने लगती है।

भले ही नेताओं को इन सवालों के सीधे सीधे दो-चार नहीं होना पड़ता हो लेकिन जनता के बीच असली सवाल अब भी जस के तस है।

नवजोत सिंह सिद्धू ने पहले यह कहा कि अगर करतारपुर साहिब

(सिक्खों के एक धर्मस्थान, जो पाकिस्तान में है) के लिए पाकिस्तान की सीमा खोली जाती है

तो वह अगली बार पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष को चूम लेंगे।

इस बयान से भाजपा और अकाली दल को परेशानी हो गयी। जबकि करतारपुर साहिब जाने की मांग कोई नई बात नहीं है।

ननकाना साहिब की तरह यहां भी सिक्ख श्रद्धालु आते-जाते रहते हैं।

इसके लिए अलग से व्यवस्था होने की स्थिति में सिक्खों के लिए वहां जाना और आसान हो जाएगा।

सिद्धू की दूसरी बात यह प्रचारित की गयी कि उन्होंने दक्षिण भारत के मुकाबले पाकिस्तान जाना ज्यादा पसंद है।

इसका भी राजनीतिक अर्थ निकालते हुए सिद्धू को दक्षिण भारत का विरोधी बताया।

भाजपा की यह आलोचना तब है जबकि दक्षिण भारत में कहीं भी उसके पैर मजबूती से नहीं जमे हैं।

कर्नाटक में जो मजबूती मिली थी, उसे कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सत्ता हथियारकर कमजोर कर दिया है।

देश अपने मूल सवालों की तरफ फिर से लौट रहा था तो नये सिरे से एमजे अकबर का मामला उठ खड़ा हुआ।

यह मसला कुछ अर्थों में गंभीर होने के बाद भी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में क्यों इसे लाया जा रहा है, इसे समझने की जरूरत है।

देश के असली सवाल पर भाजपा और कांग्रेस एक तरफ खड़े

दरअसल रोटी, कपड़ा और मकान के सवाल पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक ही किनारे खड़े नजर आते हैं।

चुनाव करीब आने के दौरान इन दोनों ही दलों को शायद अपने पुराने चुनावी वादों और चुनाव घोषणा पत्र पर बहस करने से भय लगता है।

जाहिर तौर पर जिन वादों के सहारे भाजपा ने चुनावी वैतरणी पार की थी, उन वादों को याद कर भाजपा अपनी किरकिरी नहीं कराना चाहती

क्योंकि इनमें से अधिकांश वादे सिर्फ जुमला बनकर रह गये हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा हरेक के खाते में पंद्रह पंद्रह लाख देने की बात को

खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी जुमला बता चुके हैं।

लिहाजा अपने वादों पर बात कर जनता से और अधिक सवालों का

बोझ झेलना शायद इन दोनों दलों को पसंद नहीं है।

इसका नतीजा यह है कि उन मुद्दों की तरफ जनता का ध्यान आकृष्ट कराया जा रहा है

जो उनके दैनंदिन जीवन को प्रभावित नहीं करते।

देश की जनता के जो मूल सवाल है, उनके बारे में किसी भी दल ने अब तक

खुलकर अपनी नीतियों और सोच को स्पष्ट नहीं किया है।

जब चुनाव बिल्कुल करीब होगा तो चुनाव घोषणा पत्र अवश्य जारी किये जाएंगे।

देश में पिछले वादों को याद कर बैठी है जनता इस बार

लेकिन तय है कि इन घोषणा पत्रों में पूर्व में किये गये वादों पर खुलकर स्पष्टीकरण नहीं दिया जाएगा

क्योंकि उन मुद्दों को सरकार बनने के बाद ही भूला दिया गया है।

भाजपा को राहुल गांधी के मंदिर जाने पर आपत्ति है जबकि भाजपा विरोधी दल चुनाव

आते ही फिर से राममंदिर का मुद्दा उछालने की आलोचना कर रहे हैं।

इन दोनों से देश की आम जनता का क्या लेना देना, यह सवाल किसी भी राष्ट्रीय नेता को परेशान करने वाला प्रतीत होता है।

लेकिन पिछले चुनाव ने जनता को राजनीतिक तौर पर अधिक परिपक्व बना दिया है।

जिसका नतीजा है कि बार बार उलझाने की कोशिशों के बाद भी जनता घूम फिरकर अपने असली सवाल पर लौट आती है।



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