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शरीर के रक्त के प्लाज्मा से कोरोना के ईलाज खोजने में जुटे हैं वैज्ञानिक

  • प्रारंभिक परीक्षण में मिले हैं बेहतर संकेत

  • खून की इसी खूबी से जीते हैं कोरोना का जंग

  • ठीक हो चुके रोगियों से कोरोना की दवा की तलाश

  • एक बार प्रतिरोधक आ गया तो वह आगे भी काम करेगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः शरीर के रक्त के प्लाज्मा से कोरोना वायरस का ईलाज खोजने में भी जुटे हैं

वैज्ञानिक। चीन में जब यह महामारी नियंत्रण से बाहर थी, उसी समय से इस पर ईलाज

चल रहा है। वैज्ञानिकों को इस खोज के प्रारंभिक चरण में कुछ सफलताएं भी मिली हैं।

इसी वजह से अब इसी माध्यम से उस बात को समझने की कोशिश की जा रही है कि रक्त

में कौन सा बदलाव इस कोरोना वायरस पर विजय पा रहा है। जो रोगी कोरोना से ग्रस्त

होने के बाद पूरी तरह ठीक हो चुके हैं, उनमें से अनेक ने इस अनुसंधान के लिए अपनी

तरफ से मदद की पहल भी की है।

प्लाज्मा के ईलाज को अमेरिका में आजमाया गया है

प्लाज्मा के जरिए इस चिकित्सा का पहला चरण गत 28 मार्च को आजमाया गया था।

न्यूयार्क और ह्यूस्टन के अस्पतालों में भर्ती 11 लोगों पर इसका परीक्षण किया गया था।

इन सभी मरीजों की हालत अत्यंत संकटपूर्ण धी। इस परीक्षण का लाभ तो हुआ लेकिन

इस लाभ के आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जाना संभव नहीं था। ऐसा इसलिए संभव

नहीं था क्योंकि जिन मरीजों पर इसे आजमाया गया था, उन्हें दूसरी दवाइयां भी दी गयी

थी। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि इन मरीजों को सिर्फ प्लाज्मा दिये जाने की

वजह से ही लाभ होता है। वैसे भी इस किस्म की चिकित्सा विधि को योग्य घोषित करने

के पहले उसे क्लीनिकल ट्रायल के दौर से गुजरना पड़ता है। अमेरिकी ड्रग एंड फूड

एडमिंस्ट्रेशन ने परीक्षण जारी रखने की अनुमति देने के बाद भी इसे सफल विधि मानने

से इंकार कर दिया है। साथ ही यह भी वैज्ञानिक दलील दी गयी है कि जिन मरीजों का खून

का प्लाज्मा इस्तेमाल किया गया है, उन्हें भी पहले ईलाज के दौरान दवाइयां दी गयी थी।

इसलिए खून के किस बदलाव की असली वजह क्या था और खून के प्लाज्मा का कौन सा

बदलाव कोरोना वायरस को मार रहा है, इसका व्यापक परीक्षण किये जाने की जरूरत है।

शरीर के रक्त में खुद ही तैयार होता है प्रतिरोधक

वर्तमान में इस चिकित्सा पद्धति के बारे में जो कुछ जानकारी सामने आयी है, उसे

कनवालेसंट प्लाज्मा कहा जाता है। खून के अंदर का यह तरल पदार्थ उनलोगों ने हासिल

किया गया है, जो कोरोना वायरस को मारने में सफल हो चुके हैं। पूरी दुनिया में स्वीकार्य

कोई एक चिकित्सा पद्धति अथवा दवा के अब तक सामने नहीं आने के वजह से इसे भी

तेजी से आजमाया जा रहा है और यह जांचने की कोशिश हो रही है कि दरअसल खून के

प्लाज्मा का कौन सा हिस्सा कोरोना विषाणु को मार डालने में सक्षम है। और खून के

प्लाज्मा को यह ताकत क्यों मिल रही है। प्रारंभिक परीक्षण के सफल होने के बाद इसके

क्लीनिकल ट्रायल की तैयारियां चल रही हैं। अगर यह क्लीनिकल ट्रायल में भी सफल

हुआ तो संभव है कि पहले अमेरिका और बाद में पूरी दुनिया इस चिकित्सा पद्धति को

वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर अपनी मान्यता प्रदान करें।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि कोविड 19 का वैक्सिन का परीक्षण तो चल रहा है

लेकिन उसके अंतिम परिणामों को हासिल करने में अभी काफी समय लगना तय है।

इसलिए अगले कुछ महीनों में दुनिया भर के कोरोना मरीजों के अलग अलग किस्म की

दवाई देकर उनकी जान बचाने की कोशिश हो रही है। महामारी का शक्ल अख्तियार कर

चुके इस वायरस के प्रकोप से अन्य लोगों को बचाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। एमोरी

यूनिवर्सिटी स्कूल ऑऱ मेडिसीन के पैथोलॉजिस्ट जॉन रोबैक कहते हैं कि वर्तमान में

अमेरिका में जिस दवा का कोरोना के ईलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है वह

मलेरिया की दवा है।

मलेरिया की दवा से अमेरिका में ज्यादा फायदा

दुनिया के कई अन्य हिस्सों में अलग अलग किस्म की दवा से लोगों को फायदा होने की

भी सूचना है। लेकिन कोई एक सर्वसम्मत दवा अब तक सामने नहीं आ पायी है। इसलिए

खून की प्रतिरोधक शक्ति से इसका ईलाज ज्यादा बेहतर उपाय हो सकता है। यह विज्ञान

सम्मत तथ्य है कि किसी भी विषाणु का हमला होने की स्थिति में शरीर की रक्त

कोशिकाएं सक्रिय हो उठती है। सफेद रक्त कण इन विषाणुओं को मारने के लिए

प्रतिरोधक बनाने लगते हैं। सामान्य स्थिति में प्रतिरोधक शक्ति के विजयी होने पर

वायरस का खात्म हो जाता है। दूसरी तरफ प्रतिरोधक शक्ति के हार जाने पर वायरस का

प्रकोप होता है। चूंकि जिन मरीजों का प्लाज्मा लिया गया है, उनमें यह प्रतिरोधक शक्ति

अधिक होने की वजह से ही कोरोना के वायरस मारे गये हैं। इसलिए इस प्लाज्मा के उस

खास गुण की तलाश जारी है, जिससे कोरोना के वायरस परास्त हुए हैं। एक बार उसकी

पहचान होने के बाद कोरोना के विषाणुओं से मुकाबला करने वाली दवा को बनाना बहुत

आसान हो जाएगा। साथ ही शरीर के रक्त के अंदर यह प्रतिरोधक बन जाने के बाद यह

भविष्य में भी कोरोना के हमले से इंसान की रक्षा करता रहेगा। इसकी पहचान इसलिए भी

जरूरी है कि कई ऐसे भी मरीज मिले हैं, जिनकी बीमारी ठीक होने के बाद उनपर दोबारा

भी कोरोना वायरस का हमला हुआ है।


 

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