मंगल के नीले पत्थरों में भी पानी भी हुआ करता था

मंगल के नीले पत्थरों में भी पानी भी हुआ करता था
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  • मंगल ग्रह के मिशन पर गये यान से मिल रहे हैं नई नई जानकारी

  • ग्रह की गहराई में है जमा हुआ पानी

  • कैलसाइट नामक खनिज भी मौजूद

  • पानी आखिर कहां गया, यही है रहस्य

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः मंगल ग्रह अभी जिस अवस्था में हैं, उस अवस्था में पहले नहीं था।

गहरे लाल रंग का नजर आने के बाद भी मंगल ग्रह की सतह पर अब नीले नीले छोटे गोलाकार पत्थर नजर आ रहे हैं।

मंगल पर कैसे उतरा नासा का यान वीडियो में देखिये 

इन पत्थरों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

शायद इन पत्थरों में पहले पानी हुआ करता था।

यानी पहले मंगल पर भी पानी था।

वैसे भी इस ग्रह की गहराई में जमी हुई अवस्था में पानी होने का अनुमान पहले ही व्यक्त किया गया था।

नासा ने मंगल अभियान के लिए एक यान काफी पहले भेजा था।

वर्ष 2004 में ही यह यान मंगल ग्रह पर उतर गया था।

इस यान के रोबोटिक अंगों से मिली वैज्ञानिक जानकारियो के मुताबिक यह की सतह और गहराई में लोहे की प्रचुरता है।

बाद में वहां इस किस्म के नीले रंग के छोटे छोटे पत्थर नजर आये थे।

इन पत्थरों की स्थिति पर काफी समय से शोध किया जा रहा था।

अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे है कि इन पत्थरों में भी कभी पानी हुआ करता था।

यानी मंगल ग्रह की सतह भी पहले पानी की वजह से गीली थी।

इससे वहां जीवन की संभावनाएं तलाशने की उम्मीदें और बढ़ गयी हैं।

वैज्ञानिकों की रूचि इन पत्थरों को जानने में इसलिए भी अधिक थी क्योंकि यह दिखने में बिल्कुल पृथ्वी के पत्थरों जैसी ही नजर आती है।

मंगल के इन पत्थरों को वैज्ञानिक ब्लू बैरी कहते हैं

शोध वैज्ञानिकों ने इन पत्थरों को मंगल ग्रह के ब्लूबैरी का नाम दे रखा है।

इनकी मदद से पहले का मंगल ग्रह कैसा रहा होगा, इसकी जांच की गाड़ी आगे बढ़ायी जा रही है।

इंडियाना के पुरड्यू विश्वविद्यालय के खगोल वैज्ञानिक ब्रिओनी हार्गन के मुताबिक

इन पत्थरों और अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों से यह तो पता चलता है कि

पहले इस ग्रह पर भी जल का प्रवाह हुआ करता था।

अब इन पत्थरों के इतिहास के आधार पर ग्रह में हुए बदलाव को समझने की कोशिशें जारी हैं।

इसी क्रम में यह भी समझा गया है कि वहां कैलसाइट नामक खनिज भी मौजूद है,

जो ग्रह के उपरी सतह पर भारी मात्रा में है।

इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि इस ग्रह में लौह अयस्क की प्रचुरता है।

वैज्ञानिकों का आकलन है कि लोहे की प्रचुरता की वजह से यहां के पानी में एसिड की मात्रा

शायद धीरे धीरे अधिक हो गयी होगी।

लेकिन यह अभी सिर्फ एक आकलन भी है। इसपर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि अब तक जितने इलाके पर नजर डाली गयी है, वह इस ग्रह का एक प्रतिशत भर है।

इसलिए मात्र इतनी कम संख्या में मिले नील पत्थरों और वहां के खनिजों के आधार पर

वैज्ञानिक आनन फानन में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से बच रहे हैं।

उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में मंगल ग्रह से और आंकड़े मिलने के बाद

इस मामले को और बेहतर तरीके से समझ पाना और आसान हो जाएगा।

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