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सूर्य के आकार के तारा को निगल गया ब्लैक होल

  • यूरोपीय शोध केंद्र के दूरबीन से देखा गया

  • टूटने के दौरान गैसों का गुबार चारों तरफ फैला

  • एक चपटे डिस्क की भांति हो गया था यह बड़ा तारा

  • अब तक नजरों से ओझल रहे खगोलीय नजारा पहली बार

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सूर्य के आकार से समझ सकते हैं कि यह दरअसल कितना बड़ा तारा रहा होगा।

लेकिन एक ब्लैक होल इतने बड़े तारे को भी बड़ी आसानी से निगल गया। हम तो पहले से

ही यह जानते हैं कि कोई भी ब्लैक होल अपने करीब आने वाले किसी भी तारा अथवा ग्रह

को निकल लेता है। दरअसल यह वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित सत्य है कि ब्लैक होल के

गुरुत्वाकर्षण का वजह से उसके अंदर से रोशनी तक लौटकर नहीं आती है। लेकिन इससे

पहले काफी अरसे तक तो अपने गहरे काले रंग और प्रचंड गुरुत्वाकर्षण की वजह से ऐसे

ब्लैक होल दरअसल कहां हैं, उसका पता भी नहीं चलता था। अब तकनीक विकसित हुई है

तो ब्लैक होल के आस पास के घटनाक्रमों को देखकर यह समझा जा रहा है कि दरअसल

ब्लैक होल कहां है। एक ऐसे ही ब्लैक होल में घटित होने वाला घटनाक्रम पहली बार

वैज्ञानिकों को नजर आया है। दरअसल जहां यह विशाल तारा ब्लैक होल में समा रहा है,

वहां के आस पास के  घटनाक्रमों को भी खगोल वैज्ञानिकों ने देखा है।

अत्याधुनिक टेलीस्कोप और तकनीक की मदद मिली

अत्याधुनिक टेलीस्कोप और तकनीक की मदद से एक खास इलाके में घटित होने वाली

हर छोटी बड़ी घटना को देखते हुए वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच पाये हैं कि वहां

दरअसल एक विशाल तारा को एक ब्लैक होल निगल रहा है। आम तौर पर ब्लैक होल के

करीब खींचे चले आने के बाद ऐसे सारे तारा अथवा खगोलीय पिंड अपना गुरुत्वाकर्षण खो

देते हैं। इससे वे विखंडित होने लगते हैं। ब्लैक होल के अंदर इस पूरे पिंड के समा जाने के

क्रम में वहां से बच निकलने वाले गैस के गुबार को देखा जा सकता है। सिर्फ अंदर सोखने

के कुछ क्षण पहले वहां जो प्रकाश बिखर जाता है, उससे समझा जा सकता है कि तारा

अथवा पिंड अंततः पूरी तरह अत्यंत छोटे टुकड़ों में बंटकर ब्लैक होल के अंदर समा रहा है।

सूर्य के आकार का तारा सुक्ष्म टुकड़ों में बंट गया था

इस  बारे में एक शोध प्रबंध भी प्रकाशित किया गया है। इस शोध प्रबंध के अन्यतम

लेखकर सामांथा ओटन ने कहा कि जब ऐसी घटना घटित होती है तो तारा अथवा किसी

अन्य खगोलीय पिंड के अंदर जो गैस मौजूद होते हैं, उनका विस्फोट होता है। इस गैस के

विस्फोट की वजह से ही वहां तेज रोशनी फैलने की वजह से ऐसा समझा जा सकता है कि

दरअसल ब्लैक होल कहां है। इस मामले में भी सब कुछ वैसी ही हुआ है।

यूरोपियन साउथन ऑबजरभेटरी के वैरी लार्ज टेलीस्कोप की मदद से इसे देखा गया है।

जहां पर यह घटना घटित हुई है वह पृथ्वी से करीब 2150 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।

इस घटनाक्रम को टीडीई एक टी2019 क्यूआईजेड का नाम दिया गया है। इसे पहली बार

शोध प्रबंध के मुख्य लेखक मैटर निकोल ने खोजा था। वह बर्मिघम विश्वविद्यालय के

वैज्ञानिक हैं तथा रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी से जुड़े हुए हैं। इस घटनाक्रम के दौरान

वहां जिस किस्म की लहरें उत्पन्न हुई है, उसे भी वैज्ञानिकों ने देखा समझा है। हावर्ड

स्मिथसोनियम सेंटर के एडो बर्जर ने कहा कि सूर्य के आकार का तारा इस ब्लैक होल के

गुरुत्वाकर्षण के दबाव में पूरी तरह विखंडित हो गया।

सिर्फ गैसों का गुबार चारों तरफ बिखर गया

इसलिए यह माना जा सकता है कि ब्लैक होल में प्रवेश करते वक्त वह अत्यंत सुक्ष्म कणों

का एक डिस्क सरीखा बन गया था जो गोलाकार चक्कर खाता हुआ गहरे काले अंधेरे

इलाके में गुम हो गया है। वैज्ञानिकों ने इसके साथ ही यह अनुमान भी लगाने में कामयाबी

हासिल की है कि सूर्य के आकार के तारे को निगल लेने वाला यह ब्लैक होल भी आकार में

उससे करीब दस लाख गुणा बड़ा है। अब वहां से घटनाक्रम से मिले तमाम आंकड़ों की जांच

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइनस्टाइन के उस सिद्धांत पर हो रही है, जो उन्होंने प्रकाश

पूंजों पर गुरुत्वाकर्षण के प्रभावों के बारे में लिखा था।


 

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