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ब्लैक होल का निर्माण बिना तारों के भी हो सकता है




  • वैज्ञानिक शोध में इस नये तथ्य का खुलासा हुआ

  • तारों के अत्यंत सुक्ष्म होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं

  • ब्लैक होल दिखने के बाद हो रहा है नया नया शोध

  • महाकाश की गतिविधियों पर नजर रखे हैं वैज्ञानिक


प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः ब्लैक होल का निर्माण के लिए तारों का उसके प्रवल गुरुत्वाकर्षण में आकर सुक्ष्म होने की कोई अनिवार्य शर्त नही है।

इस नये तथ्य के बारे में अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है।

इन नये तथ्यों का खुलासा पहली बार ब्लैक होल को नये तरीके से देख पाने के बाद ही हो पा रहा है।

खगोल भौतिकी विज्ञान के शोधकर्ता इस नये नतीजे पर तब पहुंचे हैं

जब उन्होंने दो सौर मंडलों के बीच की स्थिति का गहन अध्ययन किया है।

इन्हीं अध्ययनों के आधार पर वे इस नये नतीजे पर पहुंचे हैं।

वीडियो में देखें ब्लैक होल की उत्पत्ति का विश्लेषण (अंग्रेजी में)

इस शोध के बारे में एक अंतर्राष्ट्रीय शोध प्रबंध में भी विशेष जानकारी दी गयी है।

उल्लेखनीय है कि इस शोध से दो भारत वंशी वैज्ञानिक भी जुड़े हुए हैं।

शांतनू बासु और अर्पण दास ने इसकी जानकारी दी है।

दोनों वैज्ञानिक पश्चिमी ओंटारियो विश्वविद्यालय से जुड़े हुए हैं।

इन लोगों ने बताया है कि विशाल ब्लैक होल के निर्माण के लिए किसी विशाल तारे का

विस्फोट होकर उसके अत्यंत सुक्ष्म अवस्था में पहुंचने की कोई शर्त नहीं है।

इनके शोध का निष्कर्ष यह भी है कि कुछ ब्लैक होल अत्यंत कम अवधि में ही तैयार हो जाते हैं।

विशाल आकार पा लेने के बाद अचानक ही ऐसे ब्लैक होलों का विकास रुक जाता है।

अब वैज्ञानिक इनके निर्माण के प्रारंभिक दिनों को मॉडल के तौर पर तैयार करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में वैज्ञानिकों ने नई तकनीक के इस्तेमाल से ब्लैक होल के

आस पास के तरंगों का आकलन कर इस ब्लैक होल की एक संभावित तस्वीर तैयार करने में सफलता पायी है।

जैसे जैसे वहां के आंकड़े मिल रहे हैं, इस आकृति और उसके अन्य विवरणों को

और परिष्कृत भी किया जा रहा है।

ब्लैक होल दरअसल प्रत्यक्ष विखंडन से बनते हैं




अब वैज्ञानिक इन्हीं तथ्यों के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

इन ब्लैक होलों का निर्माण प्रत्यक्ष विखंडन की वजह से होता है।

इसके लिए किसी सौर मंडल के अवशेष के चक्कर काटकर बने शून्य की आवश्यकता नहीं होती।

विशाल विस्फोट की वजह से अचानक जो प्रवल गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बनता है,

वह ब्लैक होल में तब्दील हो सकता है। उसके लिए किसी तारे का टूटना भी जरूरी नहीं है।

अलबत्ता यह तय है कि प्रवल गुरुत्वाकर्षण वाले इस क्षेत्र के बन जाने के बाद

आस पास के तारे इसमें खींचे चले आते हैं।

इस वैज्ञानिक तथ्य की पुष्टि पहले ही हो चुकी है कि इन ब्लैक होलों के अंदर का

गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि वहां से रोशनी भी वापस नहीं लौट पाती।

वैसे भौतिकी के एक प्रयोग के सफल होने के बाद वैज्ञानिक प्रकाश किरणों के टेढ़े होकर

गुजरने की प्रवृत्ति के सहारे नये सिरे से इस ब्लैक होल की संरचना का भी आकलन करना चाहते हैं।

इस शोध के बारे में तैयार मॉडल के माध्यम से यह भी दर्शाया गया है कि

कई ऐसे ब्लैक होलों का निर्माण अत्यंत कम समय में हुआ

और वे कुछ ही दिनों के बाद विकसित होने से रुक गये हैं।

उनका अब कोई और विकास नहीं हो रहा है।

लेकिन इससे जो सवाल उत्पन्न हो रहा है कि इनके अंदर जो कुछ भी टूटकर जा रहा है

वह अंदर में नये किस्म का दबाव तो पैदा कर रहा है।

कम समय में तैयार होने के ब्लैक होल के निर्माण में ठहराव आया




इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक बासु ने कहा कि कई ऐसे ब्लैक होल हैं, जो अल्पावधि में तैयार होने के बाद ठहर से गये हैं।

यानी उनके अंदर अब कोई नया विकास नहीं देखा जा रहा है।

इसलिए वैज्ञानिकों का यह नया शोध उस पूर्व वैज्ञानिक परिकल्पना से खिलाफ है,

जिसमें यह समझा गया था कि सौर मंडल के तारों के टूटने की वजह से ऐसे ब्लैक होलों का निर्माण होता है।

दोनों शोध वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इस श्रेणी के ब्लैक होल बनने के लिए तारों के टूटने और महाकाश के गैसीय अवस्था के पिंडों की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

अलबत्ता इनके बन जाने के बाद आस पास के इलाके का सारा कुछ प्रवल गुरुत्वाकर्षण की वजह से इनके अंदर अवश्य ही समा जाता है।

इस श्रेणी के अनेक ऐसे ब्लैक होल विद्यमान हैं, जो आकार में हमारे सूर्य के कई लाख गुणा बड़े हो सकते हैं।


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Rashtriya Khabar


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