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भाजपा का भय अब धीरे धीरे सामने आ रहा हैः बाबूलाल मरांडी







  • दूसरे दलों से नेता आयात क्यों कर रही भाजपा
  • छोटे राज्य में कम सीटें और हर दल की परेशानी
  • दिल्ली में भी आप की सफलता से सबक लेना चाहिए
  • हम चुनाव में बड़ी पार्टियों के साथ जाना नहीं चाहते
संवाददाता

रांचीः भाजपा का भय अब धीरे धीरे जनता के सामने आता जा रहा है।

य़ह विचार झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के

अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि अगर भाजपा को चुनाव का भय नहीं होता तो उसे अपने

समर्थकों और नेताओं के भरोसे चुनाव मैदान में उतरना चाहिए था। ऐसा

नहीं कर भाजपा अपनी ताकत के बल पर अन्य दलों को तोड़कर नेता

आयात कर रही है। इसी से साबित हो जाता है कि भाजपा को खुद अपनी

जीत का भरोसा नहीं है।

श्री मरांडी ने कहा कि भाजपा काफी अरसे से इस बार 65 पार का नारा लगाती

आ रही है। बीच में कई बार इस बार 70 पार का भी नारा लगाया गया है।

अगर भाजपा को इस नारे पर विश्वास था तो उसे अन्य दलों से नेता लाने

की कोई जरूरत नहीं थी। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर ही भाजपा

यह साबित कर रही है कि उसे अब भी चुनाव में अपनी सफलता पर भरोसा

नहीं है। इसी वजह से वह दूसरे दलों के नेताओं को थोक भाव में अपनी

पार्टी में शामिल कर रही है।

भाजपा का भय भाजपा की हरकतों से स्पष्ट हो रहा है

श्री मरांडी ने इसी क्रम में स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी झारखंड विकास

मोर्चा चुनाव में बड़ी पार्टियों के साथ किसी तालमेल में नहीं जाएगी।

इसके बदले वह छोटे दलों से तालमेल करेंगे और पूरे राज्य में इसी फार्मूले

पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। श्री मरांडी ने कहा कि लोकसभा चुनाव के पहले

से उन्होंने महागठबंधन बने इसके लिए काफी प्रयास किया था।

लेकिन बात नहीं बन पायी क्योंकि हरेक दल की अपनी अपनी

प्राथमिकताएं और समस्याएं थीं। इसलिए अब अकेले ही मैदान में

उतरना पार्टी की सेहत के लिए ज्यादा बेहतर होगा। वैसे भी झारखंड

छोटा राज्य है। यहां सीटें सीमित हैं और दावेदार अनेक हैं। इसलिए

किसी गठबंधन के विवाद को बढ़ाने से बेहतर है कि अकेले ही चुनाव

लड़ा जाए। श्री मरांडी ने कहा कि राजनीतिक तौर पर उनकी पार्टी नई है।

भाजपा के मुकाबले अपनी पार्टी की संभावनाओं के बारे में पूछे गये एक

प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि दिल्ली में भी नई पार्टी आम आदमी पार्टी

ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया था। उस पार्टी को मिली सफलता से

ही यह समझ लिया जाना चाहिए कि देश की आम जनता अब किस नजरिए

से चीजों का विश्लेषण कर रही है।

मुख्यमंत्री रघुवर दास के बारे में उन्होंने कहा कि अगर श्री दास

लोकप्रियता अथवा काम की वजह से इतने ही पसंद किये जाते तो

दूसरे दलों से नेता आयात करने के बदले भाजपा को अपने नेताओं

के भरोसे चुनाव मैदान में उतरना चाहिए था।



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