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चुनावी मौसम में कृषि कानून का समर्थन खतरनाक दांव




चुनावी मौसम के असर दिखने लगे हैं। इस चुनावी माहौल में भी भाजपा केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के समर्थन में खड़ी रहकर वह खतरा उठा रही है जो उसे सत्ता से उखाड़ फेंक सकती है।




दरअसल यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा के लिए भोंपू बने लोगों ने पेट्रोल और डीजल के दाम में कटौती को दीपावली गिफ्ट बताने की पुरजोर कोशिश की थी लेकिन दरअसल यह भाजपा का भय था जो उपचुनावों के परिणामों के बाद उपजा है।

यह भय भी कोई असहज नहीं है। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के इलाके में भाजपा की हार इसका सबसे बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ उत्तर बंगाल के जिन इलाकों में पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को अधिक सफलता मिली थी, वहां का उपचुनावी जनादेश भी भाजपा के खिलाफ जाना कई संकेत दे जाता है।

पश्चिम बंगाल को दो हिस्सों में बांटने की नई चाल भाजपा ने चली थी। अब उपचुनावों ने साफ कर दिया कि जनता इस चाल के समर्थन में नहीं है।

केंद्र में मंत्री बने निशिथ प्रामाणिक के अपनी बूथ पर भी भाजपा को बढ़त नहीं मिल पायी।

इस राज्य की सभी चार सीटों को जीतकर तृणमूल कांग्रेस ने यह जता दिया कि उनकी प्रमुख ममता बनर्जी ने वाकई भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने की तैयारी गंभीरता से कर ली है।

इसके बीच ही कृषि कानूनों का उल्लेख नहीं करते हुए भी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने केंद्र सरकार द्वारा किसान हित में उठाये गये कदमों के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया है।

इस वजह से ऐसा माना जा रहा है कि अब भी भाजपा किसानों को नाराज कर खास तौर पर उत्तरप्रदेश में बड़ा खतरा उठाने जा रही है।

चुनावी मौसम में किसानों की नाराजगी का असर तो होगा

यह दांव तभी सफल हो सकता है जबकि उत्तरप्रदेश में उसके खिलाफ कोई साझा विपक्ष नहीं खड़ा होता।

वैसे वर्तमान में उत्तरप्रदेश में किसी एक गठबंधन की कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही है।

भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रविवार को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कोविड-19 महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने, व्यवस्थित और संगठित तरीके से

एक अरब से अधिक टीके सफलतापूर्वक लगाने के लक्ष्य को हासिल करने की तारीफ करने के साथ ही राजनीतिक प्रस्ताव पारित कर यह घोषणा की गई कि पार्टी आगामी सभी विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करेगी।




मोदी ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे आम भारतीयों के बीच विश्वास का सेतु बनें और साथ ही कहा कि आम कार्यकर्ताओं को राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकारों द्वारा किए गए अच्छे कामों को उजागर करने के लिए पार्टी की सेवा की परंपरा को बनाए रखना चाहिए।

इस प्रस्ताव में और बाद में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और निर्मला सीतारमण ने संवाददाता सम्मेलन में यह स्पष्ट किया कि पार्टी, सरकार के कोविड-19 के प्रबंधन को आगामी चुनावी मौसम में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी।

हालांकि संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान राज्य सरकारों को काफी संघर्ष करना पड़ा और देश के नागरिकों को ऑक्सीजन और अस्पताल के बेड जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए काफी जूझना पड़ा था।

जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं वहां के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने अपना प्रेजेंटेशन दिया।

पार्टी ने कई चुनावों में अपनी हालिया असफलताओं का जिक्र किया जिनमें इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के साथ-साथ कई राज्यों के उपचुनाव में राज्य को मिली हार भी शामिल है

जिनमें हिमाचल प्रदेश में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली और मुख्यमंत्री ने महंगाई और ज्यादा कीमत को जिम्मेदार ठहराया।

उपचुनाव में हार के दूसरे कारण गिनाये गये हैं

सीतारमण ने कहा कि पार्टी के प्रतिनिधियों ने पश्चिम बंगाल का हवाला देते हुए प्रतिबद्धता जताई कि वे अपने कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और अत्याचार से बचाव करेंगे

जहां पार्टी तृणमूल कांग्रेस को हराने में विफल रही और कार्यकर्ताओं ने दलबदल किया। प्रधान ने कहा, हम लोकतांत्रिक तरीके से फिर से लड़ेगे, पार्टी ने यही फैसला किया है।

इससे यह भी साबित हो गया है कि अब चुनावी मौसम में भाजपा ममता बनर्जी को बहुत गंभीरता से ले रही है और उन्हें बंगाल में भी उलझाये रखना चाहती है।

इस पार पार्टी ने केवल एक ही राजनीतिक प्रस्ताव पारित किया जिसमें केंद्रीय बजट 2021-22 में स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा क्षेत्र के आवंटन से लेकर स्वच्छ भारत अभियान तक की बातें शामिल थीं।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि तीन नए कृषि कानूनों पर किसानों के साथ बातचीत करने के लिए पार्टी तैयार थी जिस पर गठबंधन के सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने साझेदारी छोडऩे का फैसला कर लिया।

हालांकि, पारित कानूनों पर पुनर्विचार कर ने जैसी बात का कोई संदर्भ नहीं दिया गया था।



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