fbpx Press "Enter" to skip to content

भाजपा शासित राज्यों पर अब पड़ेगा दिल्ली का असर

भाजपा शासित राज्यों पर भी अब दिल्ली की पराजय का असर पड़ने जा रहा है। प्रदेश

स्तर पर अधिकांश राज्यों में भाजपा के अंदर भी असंतोष है। लेकिन अब दिल्ली में पूरी

शक्ति लगाने के बाद भी बुरी तरह हार जाने की वजह से भाजपा की चुनावी राजनीति

सवालों के घेरे में आ चुकी है। जाहिर है कि अब अन्य राज्यों में भी विरोधी दल भाजपा की

सरकारों से उनके काम काज का हिसाब मांगेगे। एक-एक कर कई राज्यों के हाथ से

निकलने के बाद आखिर दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी भारतीय जनता पार्टी के लिए

पूरी ताकत झोंकने के बावजूद अच्छी खबर लेकर नहीं आ पाया। अच्छी खबर तो रही दूर

उसका सम्मानजनक हार के आंकड़े तक भी नहीं पहुंचना उसके लिए गंभीर आत्मचिन्तन

का समय आ गया है। इससे ठीक पहले ही भाजपा को झारखंड में भी पराजय का सामना

करना पड़ा है। इससे तो स्पष्ट है कि भाजपा अब भी जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहती है,

उन मुद्दों का कोई खास असर विधानसभा की चुनावों पर नहीं पड़ रहा है। जाहिर है कि अब

इन परिणामों की वजह से भाजपा के रणनीतिकारों को या तो बदलना पड़ेगा या फिर

भाजपा को अपनी रणनीति ही बदलनी पड़ेगी। दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, इसलिए

यहां हर राज्य से नेताओं और कार्यकर्ताओं का पहुंचना आसान था। ऐसी सुविधा अन्य

राज्यों में नहीं होगी और अगर दिल्ली के सवाल पूरे देश में उठ गये तो भाजपा को इन

प्रश्नों का उत्तर तो देना ही पड़ेगा। यह सबसे कठिन चुनौती दिल्ली के चुनाव ने भाजपा के

सामने खड़ी कर दी है। अब उसे भी अपने काम का हिसाब देना पड़ेगा।

भाजपा शासित राज्यों में भी काम का हिसाब देना होगा

भाजपा के मुख्यमंत्रियों की अलोकप्रियता की आंच प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर पड़ने से

रोकने के लिए सबसे पहले राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक उत्तराखंड जैसे उन राज्यों में हो

सकती है जहां पार्टी अकेले दम पर सत्ता में है।मार्च 2018 में भाजपा अपने दम पर देशभर

के 13 राज्यों में सत्ता में थी, जबकि वह अन्य दलों के साथ गठबंधन में छह अन्य राज्यों

पर शासन कर रही थी। लेकिन हाल ही में झारखंड में चुनाव हारने के बाद भाजपा अब

अपने दम पर आठ राज्यों पर शासन कर रही है, और इतने ही अन्य राज्यों में वह

सत्तारूढ़ गठबंधन के सहारे या गठनबंधन के सहयोगियों के साथ सत्ता में है। जबकि

मार्च 2018 में देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में भाजपा अकेले या

साझेदारी में सत्ता में थी जो कि घटकर 34 प्रतिशत रह गया है। भाजपा देश के कुल 16

राज्यों में से बिहार, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड और सिक्किम में सहयोगियों की

सरकार में शामिल है। देखा जाए तो वह 5 राज्यों में अपने दम पर तथा 11 में सहयोगियों

के साथ सत्ता में है। आबादी और भौगोलिक सीमा के लिहाज से देखें तो भाजपा लोकसभा

में प्रचंड बहुमत के बाद भी क्षेत्रवार सिमटती चली गयी है। भाजपा जिस कांग्रेस से भारत

के मुक्त हो जाने का नारा लगा रही थी उस कांग्रेस वह 5 राज्यों में सत्ता में आ गई है, और

इन राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब जैसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और

बड़े राज्य भी शामिल हैं।

एक एक कर कई राज्य हाथ से चले गये हैं

यहां तक कि महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की सत्ता में भी कांग्रेस साझेदार हो गई है।

अगर इसी तरह एक के बाद एक राज्य भाजपा के हाथ से खिसकता रहेगा और आगे

दिल्ली की तरह उसकी उम्मीदों पर पानी फिरता रहेगा तो मोदी युग के अवसान की बात

तो उठेगी ही साथ ही उसका राज्यसभा में अपने दम पर बहुमत जुटाने का सपना अधूरा ही

रह जाएगा। ऐसा नहीं कि भाजपा अपने तेजी से खिसकते जनाधार से बेखबर होगी।

जाहिर है कि पार्टी निश्चित रूप से उन सभी 16 राज्यों के बारे में समीक्षा करेगी जहां वह

अकेले या फिर साझे में सरकार चला रही है। चर्चा यहां तक है कि दिल्ली चुनाव के नतीजों

की मार भाजपा के वर्तमान कुछ अलोकप्रिय मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों पर पड़ने

जा रही है। इसी वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में दिल्ली में हुई लैण्डस्लाइड विक्ट्री के बावजूद

सालभर से पहले इस तरह की करारी हार के बाद भाजपा आत्ममंथन तो अवश्य ही करेगी।

भाजपा के राजनीतिक क्षरण की शुरूआत राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हार

के साथ ही शुरू हो गई थी। हालांकि भाजपा राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस से काफी

कम अंतर से पिछड़ी थी मगर छत्तीसगढ़ में उसे कांग्रेस के आगे शर्मनाक हार का सामना

करना पड़ा। दिल्ली में पूर्वांचलियों के वोट के लालच में प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए मनोज

तिवारी भी गायक के रूप में अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक मोर्चे पर नहीं भुना पाए।

मनोज तिवारी और भाजपा नेताओं तथा मुख्यमंत्रियों के बेतुके तथा उग्र बयानों का

खामियाजा भी इस चुनाव में भाजपा को झेलना पड़ा।

चुनावी रणनीति बदलेगी या रणनीतिकार बदलेंगे

वर्तमान में अकेला बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भाजपा के हाथ में है और कर्नाटक में बड़ी

मुश्किल से सत्ता वापस लौटी है। हरियाणा में सत्ता बचाने के लिए चौटाला की बैसाखी

का सहारा लेना पड़ा है। कई अन्य राज्यों में दूसरे दलों के मुख्यमंत्रियों की छत्रछाया में

भाजपा की राजनीति चल रही है, इसलिए आने वाला समय भाजपा के लिए काफी

चुनौतियों भरा हो सकता है। आने वाले समय में असम, पश्चिम बंगाल और बिहार

विधानसभाओं के चुनाव होने हैं

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

3 Comments

Leave a Reply

error: Content is protected !!