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भाजपा को फायदा या नुकसान इस पर विचार का समय




भाजपा को फायदा अथवा नुकसान हो रहा है, यह राष्ट्रीय कसौटी पर तौलना आवश्यक हो




गया है। पश्चिम बंगाल में हो रहे विधानसभा चुनाव के सर्वेक्षण यही बताते हैं कि शायद

ममता बनर्जी ही फिर से चुनाव जीतने जा रही हैं। लेकिन भाजपा को फायदा इस बात का

है कि उसका वोट प्रतिशत पहले के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ने जा रहा है । फिर भी

भाजपा को नुकसान की बात करें तो पूरी ताकत लगा देने के बाद भी अगर भाजपा यहां से

ममता बनर्जी को उखाड़ नहीं पाती है तो यह उसकी रणनीतिक भूल है। दरअसल कैडर

आधारित चुनावी माहौल में दूसरों के घर से लिये गये उधार के कार्यकर्ताओं से भाजपा

अपनी विश्वसनीयता शायद बंगाल के मतदाताओं के बीच कायम नहीं कर पायेगी। वैसे

यह अभी के लिहाज से सिर्फ आकलन है और ऐसे आकलन पहले भी गलत साबित हुए हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। 27 मार्च को पहले चरण की वोटिंग हो चुकी

है। पश्चिम बंगाल में इस बार किसकी सरकार बनेगी, इसको लेकर कई ओपिनियल पोल

सामने आये है। पहले चरण के मतदान से पहले कराए गए इस पोल में बंगाल में एक बार

फिर ममता बनर्जी की सरकार बनती दिख रही है पर उसे पिछले चुनावों की तुलना में कई

सीटों का नुकसान भी हो रहा है। इसके अलावा उसके वोट शेयर में भी 2.8 प्रतिशत की

गिरावट आने की बात कही जा रही है।

भाजपा को फायदा का संकेत सर्वेक्षण तो नहीं देते

ओपनियन पोल में कुल 294 विधानसभा सीटों में से टीएमसी को 160 सीटें मिलने का

अनुमान है। 5 साल पहले हुए चुनाव के मुकाबले टीएमसी को 51 सीटों का नुकसान नजर

आ रहा है। टीएमसी को 2016 के चुनाव में यहां 211 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। वहीं,

2016 के विधानसभा चुनाव में महज तीन सीटों पर जीत हासिल करने वाली बीजेपी को

इस चुनाव में 112 सीटें मिलने का अनुमान है। उसे 109 सीटों का लाभ मिलता नजर आ

रहा है। पोल के अनुसार, टीएमसी के वोट शेयर में 2.8 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान

है। 2016 के चुनाव में यह 44.9 फीसदी था, जो 2021 के चुनाव में 42.1 प्रतिशत होने का

अनुमान है। वहीं, बीजेपी के वोट शेयर में 27.2 फीसदी की बड़ी बढ़त का अनुमान है। 2016

में जहां यहां 10.2 फीसदी था, वहीं 2021 में यह 37.4 फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन




पश्चिम बंगाल में इतनी अधिक ताकत झोंक देने से शायद भाजपा को असम में नुकसान

उठाना पड़ सकता है क्योंकि वहां भाजपा के नेताओं के कम समय देने की वजह से कांग्रेस

के नेतृत्व में बने महागठबंधन को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल गया है।

वैसे भी असम में बोड़ो पीपुल्स फ्रंट के राजग से अलग हो जाने की वजह से एक दर्जन

विधानसभा सीटों पर भाजपा की उम्मीदें पहले ही कम हो गयी थी। दूसरी तरफ मौलाना

बदरुद्दीन अजमल के प्रभाव क्षेत्र में समीकरण भाजपा के पक्ष में नहीं रहेंगे, यह सर्वविदित

सत्य है। लेकिन इन दोनों राज्यों से अलग हटकर राष्ट्रीय परिदृश्य पर गौर करें तो किसान

आंदोलन ही भाजपा के लिए नुकसान का सबसे बड़ा सौदा साबित होने जा रहा है। यह

स्थिति तब है जबकि यूपी में पंचायत चुनाव की अधिसूचना आज हो गई है।

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव मे अग्नि परीक्षा होगी

चुनाव आयोग ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि चार चरण में मतदान होंगे। पहले

चरण की वोटिंग 15 अप्रैल, दूसरे चरण का मतदान 19 अप्रैल, तीसरे चरण के लिए 26

अप्रैल और चौथे चरण में 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। मतगणना 2 मई को होगी।

नामांकन 3 अप्रैल से होंगे। हर चरण में नामांकन के लिए दो दिन रखे गए हैं। दूसरे चरण

का नामांकन 7-8 अप्रैल को होगा। तीसरे चरण का नामांकन 13 और 15 अप्रैल को होगा।

चतुर्थ चरण का नामांकन 17-18 अप्रैल को होगा। इस चुनाव के पहले ही चरण में वैसे

इलाके भी शामिल हैं, जहां किसानों का राजनीतिक वर्चस्व इतना है कि भाजपा के नेता

अभी गांवों में जा नहीं पा रहे हैं। इससे पूर्व पंजाब के नगर निकाय चुनावों में भाजपा का

क्या हाल हुआ है, यह सभी देख चुके हैं। ऐसे में दिल्ली में चुनी हुई सरकार के अधिकार

छीनकर उपराज्यपाल को देने का फैसला भी राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र पसंद मतदाताओं

को नागवार गुजरना लाजिमी है। भाजपा ने खुद कभी इसी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा

देने की वकालत की थी। अब वह अपनी बातों से यू टर्न ले चुकी है। इसलिए पांच राज्यों के

विधानसभा चुनावो में भले ही अपने सरकारों की संख्या भाजपा बढ़ाने में कामयाब हो

जाए। फिर भी भाजपा को फायदा या नुकसान हो रहा है, यह आम लोगों के साथ साथ

भाजपा नेतृत्व के लिए विचारणीय प्रश्न बनकर उभरा है



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