उत्तरप्रदेश का कठिन चुनावी मैदान में हल जोतने की नई तैयारी

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  • इस बार कट सकते हैं 57 सांसदों के टिकट

  • अमेरिकी फर्म ने किया था सर्वेक्षण

  • योजनाओं से जनता को जोड़ नहीं पाये

  • सारा काम पीएम और सीएम के जिम्मे छोड़ा

रासबिहारी

नईदिल्लीः उत्तरप्रदेश में भाजपा की चुनावी राह कठिन हो गयी है।

इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए भाजपा नेतृत्व ने इस मैदान को

फतह करने की नई रणनीति बनाने का काम प्रारंभ कर दिया है।

इसी तैयारी से जो संकेत छनकर निकले हैं, उसके मुताबिक पार्टी

अपने वर्तमान सांसदों में से 57 को दोबारा चुनाव में उतारना नहीं चाहती है।

पार्टी की तरफ से कराये गये सर्वेक्षण के नतीजों के आधार पर इन 57 लोगों के टिकट काटे जा सकते हैं।

सर्वेक्षण में यह बताया गया है कि चुनाव जीतने के बाद भी

इनलोगों का अपने इलाके के लोगों से नियमित संपर्क नहीं के बराबर रहा है।

लिहाजा इस बार इनके जीतने की उम्मीद भी नहीं के बराबर है।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच चुनावी तालमेल होने के बाद भाजपा को नये सिरे से सारी रणनीति बनानी पड़ रही है।

सपा और बसपा ने कांग्रेस को दरकिनार कर अपने सांझा बलबूते पर लोकसभा का चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है।

इस एकतरफ एलान के बाद मजबूरी में कांग्रेस को सभी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करनी पड़ी है।

सपा और बसपा से मिलने वाली चुनौती को भांपते हुए ही भाजपा नये सिरे से चुनावी बिसात पर अपनी गोटियां बिछाने जा रही है।

पार्टी को इस बात की भनक है कि भाजपा के कई सांसद वर्तमान में सपा अध्यक्ष अखिलेख यादव से नजदीकी रिश्ता बनाकर चल रहे हैं।

ऐसे लोग मौका मिलने पर भाजपा के बदले सपा की टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए दोनों सक्रिय और शक्तिशाली दलों के एकजुट होने की वजह से

भाजपा की राह पिछली बार की तरह आसान नहीं रह गयी है ।

इसी लिए नये चेहरों को चुनाव में आजमाने की तैयारी चल रही है।

उत्तरप्रदेश के बारे में अमित शाह ने दिये थे संकेत

सूत्रों की मानें तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गत 9 जनवरी को आयोजित एक बैठक में

पार्टी के सांसदों को इसका स्पष्ट संकेत भी दे दिया है।

भाजपा ने चुनावी संभावना को तलाशने के लिए एक अमेरिकी कंपनी को सर्वेक्षण का काम सौंपा था।

इस कंपनी ने पूरे राज्य के आठ सौ प्रखंडों का जायजा लेने के बाद अपनी रिपोर्ट पार्टी को सौंप दी है।

चर्चा है कि इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के करीब 97 हजार गांवों के लोगों को राय ली गयी थी।

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि भाजपा के अधिकांश सांसद चुनाव जीतने के बाद

अपने क्षेत्र में नियमित संपर्क बनाये रखने में पूरी तरह विफल रहे हैं।

सरकार द्वारा चलायी जाने वाली तमाम योजनाओं के क्रियान्वयन का काम

पूरी तरह सरकारी मशीनरी पर छोड़ देने की वजह से

जिनलोगों को इन योजनाओं का लाभ मिला, वे भी पार्टी से जुड़े नहीं रह पाये।

खास तौर पर राज्य का दलित समुदाय भाजपा के काफी दूरी बना चुका है।

वैसे उसका प्रमाण तो पिछले कई उपचुनावों में भी देखने को मिल चुका है।

सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि पार्टी के सांसदों ने सारा काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिम्मे छोड़कर

अपनी जिम्मेदारियों के कन्नी काट ली थी।

लिहाजा अब दोबारा जनता उन्हें वोट देने के पक्ष में भी नहीं है।

इसी वजह से भाजपा नेतृत्व अब उत्तर प्रदेश के अधिकांश सीटों पर नये चेहरों को आजमाने की रणनीति पर काम कर रही है।

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