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अपना वोट बैंक भी खोती जा रही है भाजपा

अपना वोट बैंक भाजपा का बहुत बड़ा था। पिछले लोकसभा चुनाव में इसी वोट बैंक की

बदौलत भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी। लेकिन उसके बाद के घटनाक्रम कुछ ऐसे रहे

कि अपना वोट बैंक भाजपा संभाल नहीं पा रही है। मध्यप्रदेश और कर्नाटक में विधायक

खरीदने के खेल ने भी उसका अपना वोट बैंक कमजोर किया है। दरअसल वहां भाजपा के

पक्ष में जनादेश देने वालों ने विधायकों की इस खरीद फरोख्त को अच्छी नजरों से नहीं

देखा है। अब पांच अन्य राज्यों में आज हो रहे मतदान का जनादेश भी यह तय करेगा कि

अपना वोट बैंक भाजपा बचा पायी है अथवा अनेक मतदाताओं ने अब उससे किनारा कर

लिया है। दरअसल कोरोना संकट और उसके बाद के घटनाक्रमों ने आम जनता की सोच

को बदलकर रख दिया है। जब सब कुछ सामान्य था तो लोगों को अपनी जरूरतों पर पड़ने

वाले राजनीतिक फैसलों का प्रभाव समझ में नहीं आता था। अब पेट्रोल और गैस के दाम

बढ़ने के बाद यह सवाल स्वाभाविक तौर पर अपना वोट बैंक ही पूछ रहा है कि जिन मुद्दों

पर भाजपा पहले कांग्रेस की आलोचना करती थी, अपनी बारी में वह उन्हें क्यों जनता के

पक्ष में नहीं कर पा रही है। दूसरी तरफ पूरे भारत में तैयार होते भाजपा के कार्यालय भी

उसका अपना वोट बैंक खिसका रही हैं। लोगों के जेहन में यह बात है कि इस तरीके से

कार्यालय बनाने का धन किसी सही माध्यम से तो नहीं आया होगा। जिस पारदर्शिता की

बात भाजपा सत्ता में आने से पहले किया करती थी, वह आज बीते दिनों की बात होने की

वजह से उसका अपना वोट बैंक ही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

अपना वोट बैंक ही अब भरोसा नहीं कर पा रहा

अभी बंगाल और असम में तीसरे चरण का मतदान हो रहा है। साथ ही तमिलनाडु, केरल

और पुदुच्चेरी में विधानसभा चुनाव का आगाज मंगलवार से होने जा रहा है असम की 40

विधानसभा सीट और पश्चिम बंगाल की 31 सीट के लिए भी 6 अप्रैल को मतदान हो रहा

है। ये सभी चुनाव भाजपा और गैर-भाजपा विपक्षी दलों के बीच सत्ता संतुलन में संभवत:

निर्णायक बदलाव के लिए अहम हैं। केरल भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यहां

भाजपा को एलडीएफ सरकार की कल्याणकारी राजनीति, बेरोजगारी के संकट और

महामारी से निपटने के बेहतर कदमों की काट खोजनी पड़ेगी। तमिलनाडु में भाजपा

अन्नाद्रमुक के भरोसे है जबकि द्रमुक का चुनावी गठजोड़ कांग्रेस के साथ है। यह राज्य का

पहला चुनाव है जिसमें द्रमुक की पूरी कमान स्टालिन के हाथों में हैं। पुदुच्चेरी में भाजपा

की कोई उपस्थिति नहीं है, ऐसे में उसे पूर्व कांग्रेसी नेताओं की बदौलत ही यहां अपनी

मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करनी होगी। जहां तक अपने कैडर की बात है तो पश्चिम

बंगाल में अपना वोट बैंक और अपने कैडर को दरकिनार कर अब भाजपा तृणमूल और

माकपा से आयातित नेताओं और समर्थकों के भरोसा है। यह भी अपना वोट बैंक

खिसकाने जैसा ही फैसला है। जिसमें पार्टी की नीतिओं और आदर्शों पर भरोसा कर उसके

झंडा ढोने वाले अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इसके अलग भाजपा को अपना

वोट बैंक गंवाने के साथ साथ अल्पसंख्यकों के मतों के ध्रुवीकरण की वजह से भी अनेक

इलाकों में अप्रत्याशित चुनौती मिल रही है। असम और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों

में इसे साफ तौर पर समझा जा सकता है।

अल्पसंख्यकों की चर्चा सिर्फ हिंदू वोट ध्रुवीकरण के लिए

वैसे अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में होता है क्योंकि उसके उलट हिंदू

वोटों का भी ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो जाता है। यह पहला अवसर है कि इस

ध्रुवीकरण पर आम जनता के मुद्दे भारी पड़ रहे हैं। देश में भाजपा द्वारा चलाया जाने वाला

नारा कि हिंदू खतरे में है, अब अपनी धार खो रहा है। उसके बदले लोग गैस और पेट्रोल के

दाम के साथ साथ रोजगार पर अधिक सवाल कर रहे हैं। चर्चा के लिहाज से देखें तो

पश्चिम बंगाल ही भाजपा की लड़ाई का मुख्य केंद्र है। भाजपा ने ममता बनर्जी को पहले

नंदीग्राम में उलझाने की कोशिश की थी। वहां मतदान हो चुका है और दोनों ही पक्ष अपनी

अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। असली फैसला ईवीएम में कैद है। लेकिन इस पूरी लड़ाई

में भाजपा अपने वोट बैंक पर वह ध्यान नहीं दे पायी, जो दूसरे राज्यों में हैं। तमिलनाडू,

केरल भी कोई छोटा राज्य नहीं है और कई बार वहां के घटनाक्रम भी भारतीय राजनीति

को प्रभावित करने की स्थिति में होते हैं। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा का अपना वोट बैंक

पहले की तुलना में कितना मजबूत या कमजोर हुआ है, उसकी परीक्षा की तिथि आज है।

इसके बाद भाजपा अपना वोट बैंक कितना बचा पायी है, उसकी असली अग्निपरीक्षा

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में होने जा रही है।

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