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कमंडल पर अचानक भारी पड़ता दिख रहा है मंडल का पॉलिटिक्स




चुनावी चकल्लस

  • हिंदू वोट ध्रुवीकरण का प्रयास इसका शिकार हो गया
  • काफी परिश्रम से तैयार हुआ था यह जनाधार
  • हिंदुओं में ओबीसी का हिस्सा पचास फीसदी है
  • अकेले मोदी ही मजबूत विकल्प बचे हुए हैं
राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः कमंडल पर मंडल की राजनीति भारी पड़ती नजर आ रही है। चुनावी सर्वेक्षमों में भाजपा का पलड़ा पहले से ज्यादा भारी दिखने केबाद भी अंततः उत्तरप्रदेश का ओबीसी पॉलिटिक्स भाजपा की तैयारियों पर पानी भी फेर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ओबीसी वर्ग के कद्दावर नेता लगातार भाजपा से त्यागपत्र दे रहे हैं।




सभी की शिकायत है कि भाजपा के पांच साल के राज में ओबीसी के हितों की अनदेखी हुई है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के खेमे के मंत्रियों और विधायकों के इस्तीफे का सिलसिला कल भी जारी रहा। भाजपा के लिए इतने बड़े पैमाने पर नेताओं का पलायन ही सिर्फ चिंता का कारण नहीं है।

उन्हें इस बात का भी डर है कि जिस हिंदू वोट बैंक को उसने 1990 के दशक से ईंट दर ईंट तैयार की थी, उसमें आक्रमक तरीके से दरार पड़ गई है। भाजपा की चिंता राज्य अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के गुरुवार को किए गए ट्वीट में स्पष्ट रूप से दिखी।

जाहिर है कि भाजपा के नेता भी इस बड़े जनाधार का बड़ा हिस्सा अचानक खिसक जाने से परेशान हैं क्योंकि इससे चुनावी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। पार्टी छोड़कर जाने वालों के बारे में भाजपा के नेता यह दलील दे रहे हैं कि उन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिलना था, इसी वजह से वे पार्टी छोड़कर चले गये हैं।

लेकिन इन घटनाक्रमों में उत्तरप्रदेश के चुनावी मुद्दों को अचानक से बदल दिया है। पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की जाति और कद ने बीजेपी नेताओं को झकझोर कर रख दिया है। यूपी में चुनावी चर्चा अचानक एक सर्वव्यापी हिंदुत्व से पिछड़ी जातियों और दलितों की उपेक्षा में बदल गया है।

कमंडल पर मंडल की आंच से भाजपा की रणनीति को झटका

चुनाव आयोग की ओर से जारी अधिसूचना के बाद बीजेपी से समाजवादी पार्टी में आए विधायकों में से नौ गैर-यादव जातियों के हैं। उनमें से तीन योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली निवर्तमान कैबिनेट में मंत्री थे। माना जाता है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली हैं।




अब माना जा रहा है कि अखिलेश ओबीसी के नेता के रूप में उभर रहे हैं। जब लोगों को लगा कि वह निष्क्रिय हैं, तो वह गठजोड़ सिल रहे थे और पिछड़े हुए अंतिम नेताओं को रिझा रहे थे। अब उन्हें टिकट से सभी जाति समूहों को संतुष्ट करने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

1990 के दशक की शुरुआत में था जब भाजपा नेतृत्व को पार्टी के चेहरे और चरित्र को बदलने की आवश्यकता का एहसास हुआ, जिसे आरएसएस के पूर्व प्रचारक और भाजपा नेता के एन गोविंदाचार्य द्वारा “चेहरा, चोल और चरित्र” के रूप में गढ़ा गया था। राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था।

राम मंदिर से अब तक की कोशिशों में पानी फिरता दिख रहा

पार्टी ने आंदोलन के लिए एक ओबीसी-चेहरे का समर्थन करने का फैसला किया। लोध जाति से आने वाले कल्याण सिंह को चेहरा बनाया गया। राष्ट्रीय स्तर पर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अशोक सिंघल (विहिप) ने आंदोलन का नेतृत्व किया।

उत्तर प्रदेश में ओबीसी की आबादी करीब 50% है। अगर बीजेपी छोड़ने वाले ये नेता अपने समाज को रिझाने में सफल होते हैं तो इसे हिंदू वोट बैंक में दरार के रूप में देखा जा सकता है। आपको बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में कहा था कि यूपी का यह चुनाव 80 प्रतिशत (हिंदुओं) और 20 फीसदी (मुसलमानों) के बीच होगा।

ऐसे में भाजपा के पास सिर्फ नरेंद्र मोदी का चेहरा ही है, जिनकी लोकप्रियता अब भी शिखर पर है, ऐसा भाजपा का मानना है। लेकिन अगर ओबीसी का जनाधार खिसक गया तो मोदी भी इसमें कितने कारगर हो पायेंगे, इस पर संदेह की पूरी गुंजाइश है। राज्य में ब्राह्मण आदित्यनाथ की आक्रामक राजपूत राजनीति से परेशान हैं? जातिगत पहचान की लड़ाई में कुछ नेता जो भाजपा में चले गए थे, वे पीछे हट सकते हैं।



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