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युवाओं को नाराज कर बड़ी गलती कर रही है भाजपा




युवाओं की नाराजगी बढ़ रही है। इसके सिर्फ एक कारण नहीं है। देश का पढ़ा लिखा युवा

वर्ग इनदिनों सोशल मीडिया के माध्यम से अब एकतरफा जानकारी नहीं लेता। वर्ष 2014

के पहले तक यही वर्ग भाजपा के लिए सबसे बड़ा हथियार था। लेकिन अब आर्थिक

विषमता, बेरोजगारी और देश की जनता के ज्वलंत मुद्दों पर सरकार की बेरुखी से युवा वर्ग

का दिल टूट रहा है। वैसे ही जेएनयू के मुद्दे पर भाजपा ने कन्हैया कुमार के कार्यकाल में

जो कब्जा करने का काम किया था, वह अब तक अधूरा है। अब फिर से वहां हंगामा होने के

बाद उसकी गलत तस्वीर पेश करने के लिए भाजपा का साइबर सेल सक्रिय है। लेकिन इस

साइबर सेल के वेतनभोगी और मानद सैनिक भी शायद इस बात को अच्छी तरह समझ

रहे हैं कि धीरे धीरे उनके द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं का असर घटता जा रहा है क्योंकि

यह खेल अब दूसरे भी जान गये हैं। लिहाजा एकतरफा सूचनाओं का प्रवाह बंद हो चुका है।

हर तरफ से आने वाली सूचनाओं के बीच युवा खुद को तौल रहा है। यहीं से युवाओं की

नाराजगी का जन्म हो रहा है। शायद भाजपा की केंद्र सरकार अब तक इसके गंभीर

परिणामों को या तो समझ नहीं पायी है अथवा पार्टी के वर्तमान नेता आपातकाल के दौरान

इंदिरा गांधी के खिलाफ छात्रों के उठ खड़े होने की बात को भूला चुके हैं।

बार बार देश का युवा वर्ग आजादी के पहले से लेकर आज तक इस बात का प्रमाण देता

आया है कि उसकी सोच कुछ देर के लिए भ्रमित की जा सकती है लेकिन उसे स्थायी तौर

पर बरगलाया नहीं जा सकता।

युवाओं को अब पहले अपने सवालों का जवाब चाहिए

आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के मुद्दे पर जब ठोस कार्रवाई होनी चाहिए तो देश को फिर से

नागरिकता के सवाल पर उलझाने को अभी का युवा वर्ग शायद समझ चुका है। वैसे आने

वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में युवाओं का असली तेवर

और मुखर और स्पष्ट होगा। जेएनयू में जो कुछ घटित हुआ वह बिल्कुल भी अप्रत्याशित

नहीं है। इसकी नींव को कन्हैया कुमार के दौरान ही पड़ चुकी थी। तब से अब तक भाजपा

का लगातार यह प्रयास रहा है कि किसी तरह इस विश्वविद्यालय के छात्र संघ पर उसका

कब्जा हो ताकि वह यहां से युवा वर्ग के लिए एकतरफा संदेश देने का नया काम प्रारंभ कर

सके। इस बार के चुनाव में भी भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

को फिर से पराजित होना पड़ा था। इसलिए दिल्ली के विधानसभा चुनाव के पूर्व वहां नये

सिरे से हंगामा और मार-पीट की घटनाएं घटित हुई है।

सोशल मीडिया में इस घटना के लिए जिम्मेदार नकाबपोशों की पहचान भी छात्र कर चुके

हैं। लिहाजा इसके पीछे भाजपा का हाथ है, इसे नकारा नहीं जा सकता। दूसरी तरफ

भाजपा जिस सच को इंदिरा गांधी की तरह नकारना चाहती है वह है युवाओं की ताकत को

कमतर आंकना। नागरिकता के सवाल पर काफी कुछ आगे बढ़कर बोलने वाले जेएनयू से

उठ रहे इस सवाल से भी परेशान हैं कि भाजपा के दो बड़े नेताओं की शैक्षणिक डिग्री का

सच क्या है। खास तौर पर पहले मानव संसाधन विकास मंत्री रहे स्मृति ईरानी इस मुद्दे पर

हर बार मुंह चुराकर भागती नजर आयी है।

टुकड़े टुकड़े गैंग का प्रचार अब असर खो चुका है

हाल के दिनों में उनकी एक नजदीकी महिला द्वारा जेएनयू के जाली वीडियो सोशल

मीडिया में शेयर करने की बात भी प्रमाणित हो चुकी है। जिस कन्हैया को पूरी भाजपा

पानी पी पीकर देशद्रोही बताने पर तूली हुई है, वह दिनोंदिन खास तौर पर वाम राजनीति

का नया युवा चेहरा बनकर उभर रहा है। उसकी जनसभाओं में उमड़ने वाली भीड़ भी यह

साबित करती है कि अपने तर्कों से उसने निश्चित तौर पर भाजपा के तमाम प्रचारों के

लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

नागरिकता और एनआरसी के मुद्दे पर खुद नरेंद्र मोदी का बयान भी झूठा साबित हो चुका

है क्योंकि मीडिया ने तुरंत ही असम और कर्नाटक में बन रहे डिटेंशन कैंपों की सूचनाएं

सार्वजनिक भी कर दी है। अब पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों को उत्पीड़न के सवाल पर नये

सिरे से राष्ट्रप्रेम जगाने के नाम पर हिंदू प्रेम की भावना का ज्वार पैदा करने की कोशिश

की जा रही है। लेकिन असली मुद्दों पर सरकार के तेवर से नाराज हो रहे युवाओं में भी इसी

हिंदू वर्ग की जनसंख्या कोई कम नहीं है।

लिहाजा सामाजिक स्तर पर फिर से यह सवाल खड़ा हो रहा है कि विदेशों में बसे लोगों पर

इतना प्रेम दिखाने वाली सरकार देश के युवाओं के बार में क्या कुछ सोच रही है। यह

सवाल अब तक अनुत्तरित है और यह आने वाले दिनों में युवाओं की तरफ से भाजपा के

लिए बड़ी चुनौती बनने जा रही है।



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