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विधानसभा के चुनाव में आंतरिक चुनौतियों से जूझती भाजपा




चुनावी चकल्लस

अब शाह ही इतना पार वाला नारा नहीं लगा रहे
दो राज्यो में पहले ही दावा हो चुका है फेल
यूपी में बहुत विचित्र हो रहे समीकरण

पंकज श्रीवास्तव

गुजरात विधानसभा के चुनाव 2017में हुए थे। भाजपा ने जोर शोर से नारा लगाया था,अबकी बार-डेढ़ सौ पार।प.बंगाल विधानसभा के चुनाव अप्रैल,2021 में हुए थे। भाजपा ने जोर-शोर से नारा लगाया था,अबकी बार-200 पार।भाजपा को दोनों जगह में कहीं भी उसके दावे के अनुरूप सीटें नहीं मिल पाई थी।




उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में हाल-हाल तक भाजपा का दावा था-अबकी बार-350 पार। लेकिन,अब भाजपा ने अपने दावा को संशोधित किया है और अब अमित शाह कह रहे हैं-अबकी बार,तीन सौ पार। 2019के आमचुनाव के बाद जहां भी विधानसभा चुनाव हुए,भाजपा के वोटों में जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई है।

2017 में भाजपा के वोटों में जबरदस्त उछाल आया और वह 39.67% पर पहुंच गया।भाजपा के वोटों में यह जबरदस्त उछाल की वजह राष्ट्रीय राजनीतिमें मोदी जी का प्रवेश था।

भाजपा के लिए सबसे पहला अंदरूनी संकट अपने पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस से है। आरएसएस घोषित तौर एक गैर- राजनीतिक स्वयंसेवी संगठन है,जिसकी स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी।यह खुद को धार्मिक, साम्प्रदायिक संगठन भी नहीं मानता।

लेकिन,पिछले 96 साल का इसका इतिहास असफलता की जिम्मेदारी और जिम्मेवारी लिए बिना सफलता का श्रेय लूटने का इतिहास रहा है।इसके इस सांगठनिक चरित्र की सबसे बड़ी मिसाल 6दिसंबर,1992को अयोध्या में विवादित ढांचा को गिराया जाना है।

वर्षों से लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता इस विवादित ढांचे को हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते रहे थे। 6दिसंबर,1992को कारसेवकों को जुटाने का अभियान इन लोगों ने चलाया।6दिसंबर,1992को कारसेवकों ने वह विवादित ढांचा ढाह दिया।1992के बाद हर 6दिसंबर को आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन इस निमित्त शौर्य दिवस मनाते हैं।

6 दिसंबर को आरएसएस शौर्य दिवस मनाता है

लेकिन,जब मामला अदालत में गया,तो लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता ने भी स्वयं को इस मामले में निर्दोष बताया और पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में ये सभी बाइज्जत बरी भी हो गए। मोदीजी 2014में प्रधानमंत्री बने और 2024तक वह प्रधानमंत्री रहेंगे।




आरएसएस मोदी का विकल्प ढूंढ़ने में लगा हुआ है।योगी आदित्यनाथ में उसे मोदी की श्रृंखला की अगली कड़ी दिखी थी।योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर भाजपा ने उत्तरप्रदेश विधानसभा का 2017 का चुनाव नहीं लड़ा था,योगी ने विधानसभा चुनाव,2017 लड़ा भी नहीं था, मुख्यमंत्री पद के लिए वह मोदी-शाह की पसंद भी नहीं थे।लेकिन,आरएसएस ने मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम पर अपना वीटो लगा दिया।

भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध जुमला है,दिल्ली में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक की राह लखनऊ होकर गुजरती है। चौधरी चरण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बनने के पहले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे, जवाहरलाल नेहरू,लालबहादुर शास्त्री,इंदिरा गांधी,राजीव गांधी,चन्द्रशेखर,अटलबिहारी बाजपेयी सीधे प्रधानमंत्री जरूर बने,लेकिन वह उत्तरप्रदेशकी प्रादेशिक राजनीति को अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जानते-समझते थे।

विधानसभा के चुनाव खुद मोदी के लिए महत्वपूर्ण

सो योगी आदित्यनाथ में भी प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा जागी,और वह ‘मोदी के बाद योगी’ अभियान में जुट गए। मोदी ने योगी आदित्यनाथ को एक चुनौती के लिए रूप में लिया और वह योगी आदित्यनाथ के पर कतरने में जुटे हुए हैं। मोदी बनाम योगी के इस द्वंद्व में आरएसएस की सांगठनिक प्रतिष्ठा दांव पर है।

भाजपा के चुनावी संभावनाओं को एक गंभीर चुनौती स्वयं मोदी पेश कर रहे हैं। मोदी की तात्कालिक राजनैतिक विवशता है कि वह योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव मैदान में जाएं।वह भाजपा की सत्ता में वापसी तो चाहते हैं,लेकिन योगी आदित्यनाथ की सत्ता में वापसी नहीं चाहते,जो प्रधानमंत्री और पार्टी सुप्रीमो के रूप में उनकी सत्ता को चुनौती पेश करे।

मोदी जानते हैं कि अगर योगी आदित्यनाथ की सत्ता में वापसी होती है,तो 2024तक प्रधानमंत्री बने रहना उनके लिए निरापद नहीं रह जाएगा।योगी आदित्यनाथ उनको प्रधानमंत्री पद से बेदखल करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगे।

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव,2022 में भाजपा की संभावना के लिए एक गंभीर चुनौती केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं।अमित शाह पिछले दो-ढाई दशकों से मोदीजी के सबसे विश्वस्त प्रबंधक की भूमिका में रहे हैं। वह यह मानकर चल रहे हैं कि मोदी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी उन्हें तोहफे के तौर पर मिल जाएगी।

लेकिन,योगी आदित्यनाथ ने ‘मोदी के बाद योगी’अभियान चलाकर उनकी महत्वाकांक्षा पर मानो ब्रेक लगाने की धृष्टता की है। अमित शाह यही चाहते हैं कि उत्तरप्रदेश में भाजपा सत्ता में तो लौटे, लेकिन योगी आदित्यनाथ नहीं। इतनी सारी आंतरिक चुनौतियों से जूझती भाजपा शायद ही सत्ता में वापसी कर पाएगी।



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