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झारखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस दोनों एक ही राह पर

झारखंड की राजनीति में अभी तक भाजपा चुनावी हार के बाद अब

तक पस्त पड़ी है। दूसरी तरफ सरकार में शामिल होते ही कांग्रेस मस्त

है। लेकिन इस परस्परविरोधी स्थिति के बाद भी दोनों ही दलों के अंदर

एक जैसी राजनीतिक उथलपुथल की स्थिति है। भाजपा में नेतृत्व

किसके हाथ में हो, यह तय नहीं हो पा रहा है दूसरी तरफ कांग्रेस अपने

प्रदेश अध्यक्ष को मंत्री बनाने के बाद भी नया प्रदेश अध्यक्ष तय नहीं

करना चाहती है। दरअसल दोनों दलों की एक जैसी मजबूरी का असली

कारण रांची नहीं दिल्ली में छिपा है। दोनों राष्ट्रीय दल अब भी राज्य

नेतृत्व को मजबूत नहीं होने देना चाहते हैं। इसी वजह से प्रदेश संगठन

को कुछ इस तरीके से संतुलन में रखने की हमेशा कोशिश होती

रहती है ताकि दिल्ली का डंडा हमेशा चलता रहे। झारखंड के प्रथम

मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने साफ तौर पर कहा है कि वह भाजपा में

शामिल नहीं होने जा रहे हैं। उनकी इस बात क पिछले चार साल से

हमेशा ही अनसुना किया जा रहा है। मजेदार बात यह है कि जो लोग

उनके भाजपा में जाने की बात कहते हैं, वे कभी भी औपचारिक तौर पर

इस बारे में कोई बयान नहीं देते। इसलिए श्री मरांडी का यह कथन भी

सही है कि जो लोग उनके (श्री मरांडी के) भाजपा में जाने की सूचनाएं

दे रहे हैं, इसके आगे की पुष्टि भी वे ही कर दें। लेकिन श्री मरांडी के

भाजपा में जाने की अटकलबाजी आखिर क्यों हैं, इस विषय को यूं

ही नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। झारखंड विधानसभा के

चुनाव में यह स्पष्ट हो गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अन्य

सारे बड़े नेताओं को दरकिनार कर अपने स्तर पर सारे फैसले लिये थे।

लिहाजा अब कोई बड़ा नेता उनके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

झारखंड की राजनीति में मजबूत नेता पसंद नहीं

मुखर वक्ता अथवा बड़े जनाधार वाले नेता सभी उनसे कन्नी काटकर

चल रहे हैं। इनमें से अनेक लोग ऐसे भी होंगे, जो सरयू राय प्रकरण पर

पार्टी के स्टैंड से अंदर से इत्तेफाक नहीं रखते। लेकिन इतना कुछ होने

के बाद भी आखिर कार सरयू राय की बातों को अनसुना क्यों किया

गया, यह असली मुद्दा है। सिर्फ इसी एक कारण से झारखंड की

राजनीति में भाजपा और कांग्रेस की एक जैसी स्थिति होने में भाजपा

की आंतरिक स्थिति का पता चल जाता है। स्पष्ट शब्दों में यह कहा

जाए तो केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा को पिछले पांच वर्षों से दरकिनार

करने की पूरी कोशिश हुई थी। इसके बारे में उनके और वर्तमान

अध्यक्ष सह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच की खटपट को

जिम्मेदार माना जाता है। अब विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के

जो विधायक जीतकर आये हैं, उनमें फिर से अर्जुन मुंडा समर्थकों की

संख्या पिछली बार की तरह ही अधिक है। श्री दास के पक्ष में जो लोग

बैटिंग कर सकते हैं, उनमें से पार्टी में हाल में शामिल होकर जीतने

वालों के अलावा चंद मंत्री हो सकते हैं। ऐसे में अगर अर्जुन मुंडा अथवा

रविंद्र राय सरीखे नेताओं को फिर से आगे बढ़ने की छूट मिली तो

दिल्ली का जो समीकरण झारखंड भाजपा के अंदर बना हुआ है, वह

फिर से ध्वस्त हो जाएगा। यही भाजपा की असलियत है। दूसरी तरफ

कांग्रेस की तरफ झांके तो साफ होता जा रहा है कि कांग्रेस ने अपने

पिछले अनुभवों से कोई सबक नहीं सीखा है।

कांग्रेस उसी राह पर जिससे वह बर्बाद हुई थी

कांग्रेस ने या तो पूर्व अनुभव से कुछ नहीं सीखा या यह उसकी आदत है

वे फिर से उन्हीं गलतियों को दोहराने की पूरी कोशिश कर रहे हैं जो

गठबंधन को तोड़ने के मुख्य कारण बन सकते हैं। इतने दिनों तक

सत्ता से दूर रहने वाली पार्टी एक बार सत्ता में आते ही अपना पुराना

चेहरा दिखाकर जनता के बीच कितनी अलोकप्रिय हो रही है, इसका

एहसास शायद दिल्ली दरबार और वहां की गणेश परिक्रमा करने वाले

नेताओं को है। इसके बाद भी वे निजी हित को छोड़ नहीं पा रहे हैं।

विधानसभा चुनाव के दौरान दिल्ली के कई नेताओं की क्या कुछ

भूमिका रही और उनलोगों ने पार्टी प्रत्याशियों की जीत के लिए क्या

कुछ किया, यह जगजाहिर बात है। ऐसे में फिर से सरकार को अपनी

मुठ्ठी में करने की कोशिशों के पीछे भी दिल्ली के नेताओं का स्वार्थ

छिपा है। इस स्वार्थ को वे छोड़ नहीं पा रहे हैं। दूसरी तरफ उन्हें जिन

तत्वों ने घेर रखा है, वे भी सरकार का हिस्सा होने की मलाई खाने के

लिए जीभ लपलपा रहे हैं। इससे पूरी कैबिनेट के गठन के पहले ही

जनता के मन में इस सरकार के भविष्य को लेकर शंकाएं उत्पन्न हो

चुकी है। इसी दिल्ली की पकड़ के नाम पर भाजपा और कांग्रेस दोनों

की एक जैसी स्थिति बनती नजर आ रही है, जहां स्थानीय नेतृत्व को

मजबूत करने के बदले अपनी दुकानदारी को जारी रखने की प्रवृत्ति

अधिक हावी हो रही है।

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