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धरती पर 66 मिलियन वर्ष पूर्व गिरे उल्कापिंडों का क्या प्रभाव पड़ा था




  • पक्षी उस दौर में कैसे बचे जब डायनासोर विलुप्त हो गये

  • दिमाग के सामने का हिस्सा थोड़ा बड़ा होता है उनका

  • दिमागी संरचना ने बचाव का रास्ता दिखाया था

  • इसी वजह से मौसम के बदलाव को भी झेल गये

राष्ट्रीय खबर

रांचीः धरती पर 66 मिलियन वर्ष पूर्व गिरे दो उल्कापिडों की वजह से ही उस दौर के सबसे खतरनाक प्राणी डायनासोर पूरी तरह विलुप्त हो गये। लेकिन उस दौर में जो पक्षी थे, वे किसी तरह बच गये थे।




ऐसा कैसे हुआ था, यह सवाल काफी पहले से वैज्ञानिकों के जेहन में था। उनकी सोच थी कि उस महाविनाश के दौर में ऐसा कैसे हो पाया था।

यह वैज्ञानिक तौर पर पहले ही प्रमाणित हो चुका है कि उल्कापिंड गिरने से ही उस दौर के डायनासोरों की अधिकांश प्रजातियां महाविनाश की चपेट में आ गयी थी।

लेकिन जो बचे थे, वे मौसम के बदलाव की वजह से खुद को नहीं बचा पाये और यह पूरी प्रजाति ही दुनिया से गायब हो गयी। लेकिन उस दौर में पक्षी भी थे जो बाद में भी बच गये।

ऐसा क्यों हुआ यह एक बड़ा सवाल था। वैज्ञानिकों ने पाया है कि उल्कापिंड गिरने के पृथ्वी पर जो जोरदार झटका लगा था, उसकी वजह से एक साथ कई चीजें हुई थी।

पहला तो उल्कापिंड का आकार बढ़ा होने की वजह से बहुत बड़े इलाके में जोरदार आग की लपटें फैल गयी थी। साथ ही इस टक्कर की वजह से बहुत बड़ा भूकंप आया था।

लेकिन महाविनाश के दौर में सिर्फ इतना ही नहीं हुआ था। इसी झटके की वजह से पृथ्वी के अनेक इलाकों में ज्वालामुखी विस्फोट प्रारंभ हो गया था।

यह भी बता दें कि पृथ्वी पर गिरने वाले उल्कापिंड का आकार करीब छह मील चौड़ा था। इसकी वजह से धरती पर परमाणु बम से एक सौ मिलियन गुणा अधिक बड़ा विस्फोट हुआ था।

इस विस्फोट की वजह से करीब 330 फीट ऊंची सूनामी की लहर ने भी अनेक इलाकों को तबाह कर दिया था।

धरती पर इस उल्कापिंड से तबाही आ गयी थी

धरती पर 66 मिलियन वर्ष पूर्व इसी एक घटना की वजह से आसमान में बने शीशे के छोटे छोटे कणों ने पानी में रहने वाली अनेक प्रजातियों को मार डाला था क्योंकि यह कण मछली जैसी प्राणियों के गलफड़े में जाकर फंस गया था और वे दम घुटने से मर गये थे।

साथ ही मैक्सिको के यूकाटान इलाके में गिरने वाले उल्कापिंड की वजह से एसिड की वर्षा होने लगी थी। इसके बाद भी पक्षी कैसे बचे यह सवाल अब जाकर सुलझ पाया है।




दरअसल उस वक्त धुआं, राख और छोटे कणों से बादलों ने पृथ्वी पर सूर्य की रोशनी को भी रोक दिया था, जिससे शीतकाल की शुरुआत हो गयी।

ओहायो यूनिवर्सिटी के हेरिटेज कॉलेज ऑफ ऑस्टोपैथिक मेडिसिन के शोध कर्ता क्रिस्टोफर टोरेस ने इस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

इस रिपोर्ट को गत 2 नवंबर के अंक में साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

इसमें कहा गया है कि महाविनाश के उस दौर में पक्षियों को अपने दिमाग की वजह से इस हादसे से बच निकलने में कामयाबी मिली।

वैसे पक्षियों के भी कई प्रजाति इसमें विलुप्त हो गये लेकिन उढ़ने की क्षमता के साथ साथ उनके दिमाग ने उन्हें बचने का रास्ता दिखाया था।

पक्षियों ने जरूरत के मुताबिक खुद में बदलाव किये है

उस दौर की अनेक पक्षी प्रजातियों के दिमाग का सामने का हिस्सा, जिसे सेरेब्रूम कहा जाता है वह आकार में बड़ा था। इसलिए वे जल्द ही समझ गये कि कोई संकट आ रहा है।

इसी दिमाग ने उन्हें बचने का रास्ता दिखाया। साथ ही इस दिमाग में लचीलापन होने की वजह से उनकी शारीरिक प्रतिक्रियाएं भी प्रभावित हुई जबकि जिन प्राणियों के दिमाग में यह लचीलापन नहीं था वे बदलाव को झेल नहीं पाये।

पुराने फॉसिल और वर्तमान प्रजातियों के पक्षियों के दिमाग के अध्ययन से यह भी पता चला है कि इस दौर के बाद पक्षियों के दिमागी संरचना में भी तब्दीली आयी है।

इसी दिमागी संरचना की वजह से पक्षियों ने मौसम के बदलाव को भी झेल लिया लेकिन बदलाव की वजह से उनकी अलग अलग प्रजातियां भी बनती चली गयी।

वर्तमान प्रजाति के पक्षियों से तुलनात्मक अध्ययन से भी इस बात की पुष्टि हो जाती है कि धरती पर 66 मिलियन वर्ष पूर्व गिरे उल्कापिंड और उसके बाद के घटनाक्रमों को अपने स्वाभाविक गुणों की वजह से झेलकर आज के दौर तक जीवित रहे हैं।



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