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कृत्रिम जेलीफिश समुद्र में तीन गुणा तेजी से तैर सकती है

  • शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में सफल परीक्षण किया

  • एक खास उपकरण से तेज तैरती है यह प्राणी

  • समुद्र की गहराई में निरंतर नजर रखा जाएगा

  • उपकरण निकालने के बाद भी जीवित रहेंगे सभी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कृत्रिम जेलीफिश तैयार करने में वैज्ञानिकों को सफलता

मिली है। अच्छी बात यह है कि इस समुद्री मछली को तैयार करने के

बाद यह पाया गया है कि पानी के भीतर इसके तैरनी की गति काफी

तेज है। प्राकृतिक जेलीफिश के मुकाबले यह कृत्रिम प्राणी तीन गुणा

अधिक गति से तैर सकती है। सुनने में यह भले ही किसी विज्ञान

रोमांच फिल्म जैसी कहानी लगती है लेकिन वास्तव में ऐसा हो चुका

है। शोधकर्ताओं ने इसे तैयार करने के लिए माइक्रो इलेक्ट्रानिक्स का

उपयोग किया है। अब तैयार होने के बाद इन्हीं जेलीफिशों के माध्यम

से वे समुद्र के अंदर की गहराई के बारे में और अधिक अनुसंधान करते

हुए जानकारी हासिल करना चाहते हैं। इन्हें तैयार करने के बाद उन्हें

और अत्याधुनिक बनाने की दिशा में काम प्रारंभ हो चुका है। इसके

तहत उनमें अत्यंत छोटे आकार के सेंसर लगाया जाना है। इन सेंसरों

की मदद से समुद्र के अंदर की गतिविधियों के बारे में वैज्ञानिकों को

जानकारी मिलती रहेगी। आम जेलीफिश की शारीरिक संरचना को

देखते हुए सिर्फ इस कृत्रिम जेलीफिश में एक छोटा सा उपकरण

लगाया गया है। इसी एक उपकरण की वजह से उसके तैरने की गति

तीन गुणा अधिक हो चुकी है। अच्छी बात यह है कि उसके तेज गति से

तैरने की वजह से समुद्र के अन्य प्राणियों को भी कोई परेशानी नहीं

होती है। समुद्र के इस प्राणी को इसलिए इस काम के लिए चुना गया

था क्योंकि इस प्राणी की प्राकृतिक संरचना में कोई दिमाग अथवा दर्द

महसूस करने वाली ग्रंथियां नहीं होती हैं। अब उनमें अत्यंत छोटे

आकार के कैमरे लगाकर समुद्र के अंदर का हाल भी जीवंत अवस्था में

देखा जा सकता है।

कृत्रिम जेलीफिश समुद्र के अंदर का हाल बतायेंगे

सेंसर लगे होने की वजह से समुद्र के अंदर का तापमान वहां के पानी में

मौजूद एसिड की स्थिति में बदलाव जैसे सारे आंकड़े वैज्ञानिकों को

प्राप्त हो सकते हैं। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के जैव वैज्ञानिक निकोले

जू ने इस बारे में कहा कि इन कृत्रिम प्राणियों को समुद्र के विभिन्न

इलाकों में भेजकर अंदर की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इस

बारे में साइंस एडवांसेज पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया गया है।

इसमें बताया गया है कि इस प्रयोग का प्रारंभिक लक्ष्य काफी गहराई

की स्थिति का निरंतर अध्ययन करना है। वर्तमान में यह काम

लगातार नहीं हो पाता है। कैलिफोर्निया इंस्टिटियूट ऑफ टेक्नोलॉजी

के प्रोफसर जॉन डाबिरी ने कहा कि इससे समुद्र की गहराई में लगातार

नजर रखने की सुविधा हासिल होगी। वर्तमान में यह एक बड़ी कमी है,

जिसकी वजह से अंदर की हलचल अथवा उथल पुथल के बारे में काफी

देर से जानकारी मिल पाती है। अगले चरण में इसके निर्माण से जुड़े

वैज्ञानिक ऐसे बॉयोनिक जेलीफिश के समुद्र की सतह पर छोड़ना

चाहते हैं। उसे छोड़ने के बाद यह देखा जाएगा कि यह अपनी बलबूते

पर कितनी गहराई तक जा सकता है। बाद में उसे फिर से सतह पर

वापस लाने का इंतजाम इसमें किया गया है। जिस बॉयोनिक

जेलीफिश को प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, वह आकार में भी

सामान्य जेलीफिश के जितना ही यानी 10-20 सेंटीमीटर व्यास वाला

है।

अपनी मांसपेशियों में खिंचाव पैदा कर तैरता है यह प्राणी

समुद्र में पाये जाने वाले जेलीफिश अपनी मांसपेशियों में खिंचाव पैदा

कर समुद्र के अंदर तैरते हैं। कृत्रिम जेलीफिश में इस स्थिति को बनाने

के लिए एक प्रोस्टेटिक लगाया गया है। यह उपकरण ही मांसपेशियों

का यह खिंचाव पैदा करता है। इस उपकरण में एक छोटी सी बैटरी और

इलेक्ट्रोड हैं। जो मांसपेशियों में यह स्थिति पैदा करते हैं। कृत्रिम

उपकरण होने की वजह से ही यह प्रक्रिया सामान्य जेलीफिश के

मुकाबले अधिक तेजी से होती है। इसी वजह से इसके तैरने की गति

भी तीन गुणा अधिक है। आम समझ की भाषा में यह एक नन्हा सा

पेसमेकर जैसा उपकरण है जो इंसान के दिल की धड़कन को बनाये

रखता है। जिन प्राणियों में यह जैविक सुधार किया गया है, उसकी

खास बात यह भी है कि जब यह उपकरण निकाल लिये जाते हैं तो यह

समुद्री प्राणी अपने स्वभाव के मुताबिक सामान्य तरीके से तैर भी

सकता है। वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया है कि इस बात का पूरा ख्याल

रखा गया है कि जेलीफिश को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचे।

दरअसल सैटेलाइटों से समुद्र पर लगातार नजर रखने के बाद भी

उसके अंदर क्या कुछ चल रहा है, उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं

मिल पाती है। अब जेलीफिशों के माध्यम से समुद्र की गहराई का यह

काम पूरा किया जा सकेगा। जेलीफिश को ही इस काम के लिए चुनने

के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह समुद्री प्राणी पृथ्वी पर पिछले

पांच सौ मिलियन वर्षों से बना हुआ है। इस दौरान उसकी संरचना भी

एक जैसी ही रही है। इस लिहाज से उसे समुद्र और पृथ्वी का अन्यतम

प्राचीन प्राणी माना जा सकता है। ऐसे प्राचीन प्राणी के माध्यम से ही

समुद्र की गहराई की जानकारी ज्यादा अच्छे ढंग से मिल पायेगी

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