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नौकरी और रोजगार के बीच उलझी चुनावी राजनीति




नौकरी और रोजगार का मुद्दा बिहार के विधानसभा चुनाव का प्रमुख मसला है। नौकरी देने

का वादा कर निश्चित तौर पर तेजस्वी यादव ने अपने विरोधियों पर बड़ी बढ़त बनायी है।

वह बार बार यह कह रहे हैं कि उन्होंने सारे आंकड़ों को देख समझ लेने के बाद ही दस लाख

युवाओं को नौकरी देने की बात कही है। इसमें से साढ़े चार लाख की रिक्तियां तो बिहार

सरकार के विभिन्न विभागों में ही खाली है। राजद नेता यह कहकर भी अपने समर्थकों में

उत्साह भर रहे हैं कि आगामी नौ को लालू प्रसाद की रिहाई और दस को नीतीश जी की

विदाई है। बिहार में पहले चरण का मतदान हो चुका है। इस दौर में चुनाव में किस्मत

आजमाने वाले प्रत्याशियों की किस्मत भी ईवीएम में कैद हो चुका है। सिर्फ इस एक चरण

की बात करें तो नौकरी का वादा निश्चित तौर पर मतदाताओं के एक बड़े वर्ग पर अपनी

छाप छोड़ने में कामयाब रहा है। लेकिन इससे अलग हटकर सोचे तो एक और बड़ा सवाल

यह खड़ा होता है कि क्या सरकारी नौकरी हमारी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त तो नहीं करती

जा रही है। जब इस पर ध्यान जाता है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति का दोष और गुण दोनों

समझ में आते हैं। दरअसल देश में अपनी जरूरत और सामाजिक प्राथमिकताओं के

हिसाब से लोगों को शिक्षित करने पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। इसी वजह से पढ़ाई

पूरी करने के बाद अधिसंख्य लोग सरकारी नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं। यह दरअसल

दूसरे किस्म की पलायनवादी सोच भी है। सामान्य तौर पर नौकरी से अलग हटकर किया

जाने वाला कोई दूसरा प्रयास अधिक परिश्रम खोजता है। व्यापार भी कोई आसान काम

नहीं है और सरकारी नौकरी से हटकर किया जाने वाला कोई भी प्रयास चौबीस घंटे की

मेहनत भी खोजता है।

नौकरी और रोजगार में कहीं शिक्षा व्यवस्था तो दोषी नहीं

कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें डरपोक तो नहीं बनाती है। इस बात को समझने के लिए

अपने आस पास किसी आदिवासी को बैठे हुए देखिये। यह खास तौर पर झारखंड में

अक्सर ग्रामीण इलाकों में दिख जाता है। कोई आदिवासी अगर चुपचाप बैठा हो तो आस

पास की चीजों को उठाकर भी वह कुछ न कुछ गढ़ देता है। घर के बच्चों के लिए बाजार से

खिलौना लाने की आर्थिक हैसियत उसकी नहीं होती तो वह अपनी बुद्धि से बच्चे के लिए

खिलौना बना देता है। भले ही वह खिलौना पत्तों को गूंथकर क्यों न बनाया गया हो। यह

सृजनशीलता उसके डीएनए में प्राचीन काल से क्रमवार तरीके से विकसित हुई है। दूसरी

तरफ लगातार गुलामी के दायरे में रहने वाली शहरी आबादी के डीएनए में इस किस्म की

प्राकृतिक और मौलिक सोच का अभाव हो चुका है। मैकाले की शिक्षा पद्धति इसी बीमारी

को लगातार बढ़ाती गयी है क्योंकि अंग्रेज शासकों को एपीजे अब्दुल कलाम नहीं अपने

आफिस के लिए क्लर्क चाहिए था। इसलिए शायद सरकारी नौकरी की सुविधाओं को देखते

हुए अन्य रोजगार अथवा व्यापार के कठिन रास्ते पर चलने के मुकाबले इस रास्त पर

चलना ज्यादा आसान है। लेकिन इससे सबसे बड़ा सवाल जो पैदा हो रहा है वह यह है कि

क्या इससे जनता को फायदा हो रहा है। उदाहरण के लिए हम दिल्ली को छोड़कर अन्य

राज्यों के सरकारी स्कूलों का हाल देख रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी जिला प्रशासन

के अलिखित गुलाम है। किसी भी काम में उन्हें कभी भी बैल की तरह जोता जा सकता है।

स्कूल और कॉलेजों से पढ़कर जो छात्र निकल रहे हैं उनमें से अधिकांश अपनी मातृभाषा में

ही शुद्ध नहीं लिख सकते। ऐसे नकारा लोगों को पता है कि वास्तविक ज्ञान की परीक्षा में वे

कहीं टिक नहीं पायेंगे।

साक्षर अनेक हैं लेकिन क्या उन्हें असली ज्ञान है

लेकिन अगर सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ने के साथ साथ जनता का काम आसान हो

और इससे सरकारी राजस्व में बढ़ोत्तरी हो तो यह सही फैसला माना जा सकता है।

दुर्भाग्य से जितनी नौकरियां बढ़ी हैं, उसी अनुपात में सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार भी

बढ़ा है। यानी जो लोग सरकारी नौकरी में आये हैं, वे सरकार अथवा जनता की सेवा करने

नहीं बल्कि अपनी जेब भरने आये हैं। इसी वजह से सरकारी बजट में गैर योजना मद का

गैर उत्पादक खर्च बढ़ता जा रहा है और आम जनता को इसका कोई फायदा भी नहीं मिल

रहा है। कोरोना संकट के बाद इस पूरी व्यवस्था पर नये सिरे से समीक्षा की जरूरत है। इस

बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकारी विभागों में संविदा नियुक्तियों के बदले

स्थायी रोजगार होना चाहिए। लेकिन उससे अधिक जरूरी यह देखना भी है कि इन

नौकरियों से उन लोगों का काम आसान हो, जिनके पैसे से सरकारें चल रही हैं। सिर्फ

जनता के शोषण के पैटर्न पर अगर सरकारें चलती रही तो कोरोना संकट से उत्पन्न

परिस्थितियों की वजह से कुछ दिनों बाद सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने

लायक पैसा भी नहीं होगा।

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